Saturday, March 14, 2026
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नगरायुक्त आखिर आ ही गए शासन के निशाने पर

  • अवैध रूप से टेंडर के विपरीत डंपर खरीद का मामला
  • एक सप्ताह में मांगा जवाब, नगर निगम में मचा हड़कंप

जनवाणी संवाददाता |

मेरठ: नगर निगम भ्रष्टाचार के मामले में सरकारी विभागों में टॉप पर हैं। भ्रष्टाचार में चार निगम कर्मी जेल जा चुके हैं। फिर भी निगम के कुछ अफसर ईमानदारी के दिखावे का चौला औढे हैं। भ्रष्टाचार के कई मामले शर्मसार और निगम अफसरों को कलंकित कर रहे हैं, लेकिन फिर भी ऐसी बेशर्मी नहीं देखी। जनता के खून पसीने की गाढ़ी कमाई को अपने कमीशन के लिए लूटने वाले नगर निगम के निरंकुश अफसर आखिर शासन के निशाने पर आ ही गए।

अशोक लीलैंड के आॅर्डर के विपरीत महेंद्रा कंपनी के डंपर खरीदने और फिर उनको चोरी छिपे अपने ज्वाइंट डिपो में खड़ा करने के मामले में शासन ने टेढी नजरें कर दी हैं। इस मामले में सीधे नगर आयुक्त से ही जवाब तलब किया गया है। क्योंकि मुखिया की अगुवाई में ही महज कमीशन के लालच में इतने बडेÞ घोटाले को अंजाम दिया गया है। प्रमुख सचिव ने नगर आयुक्त से इस खरीद से संबंधित तमाम पत्रावलियों के साथ एक सप्ताह में जवाब तलब किया है। शासन के इतने सख्त कदम से नगर निगम के अधिकारियों में हड़कम्प मच गया है।

नगर आयुक्त का बचाव करने के लिए नगर निगम के घोटालेबाज अफसर जुट गये हैं तथा कागजी किलेबंदी अब की जा रही हैं। ये सब नगर आयुक्त को बचाने की कवायद की जा रही हैं, लेकिन नगरायुक्त नगर निगम के मुखिया हैं। भ्रष्टाचार हुआ है। फाइल पर उनके हस्ताक्षर हैं। फिर कैसे वाहनों की खरीद-फरोख्त में भ्रष्टाचार हो गया। अब शासन के सीधे निशाने पर नगरायुक्त आ गए हैं।

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लूट का इससे बेहतरीन सबूत और कुछ नहीं मिल सकता है कि वर्क आॅर्डर किस गाड़ी के जारी किये जाते हैं और फिर अंदर खाने मिलीभगत करके कौन सी गाड़ी की सप्लाई ले ली जाती है, लेकिन जब मामला लाख-दो लाख का नहीं, बल्कि एक ही गाड़ी पर पूरे 10 लाख रुपये जेब में आ रहे हों और साथ ही गाड़ियों की खरीद में कमीशन अलग से मिल रहा हो तो बड़े-बड़ों का ईमान डगमगा जाता है। कुछ ऐसा ही कारनामा इन दिनों नगर निगम के स्वास्थ्य अनुभाग में अंजाम दिया गया है। वर्क आॅर्डर तो अशोक लीलेण्ड डंफर का जारी किया गया, जबकि सप्लाई कर दिये गये महेन्द्रा के डंपर।

अब जब पोल खुली तो इन सभी ट्रकों को ज्वाइंट डिपो में हटाकर भेज दिया गया है। पिछले पांच महीने से करोड़ों की खरीद के यह डंपर धूल फांक रहे हैं। इन ट्रकों की हिफाजत के लिए बाकायदा नगर निगम के दो-दो कर्मचारियों की ड्यूटियां भी लगाई गई हैं। सबसे आश्चर्य की बात तो यह है कि करोड़ों रुपये जनता के विकास के लिए इस खरीद में खर्च करने के बाद भी जनता को उसका लाभ नहीं मिल पा रहा है। अधिकारियों को अपने मुनाफे और कमीशन से मतलब था।

लिहाजा मुनाफा और कमीशन लेने के बाद वह भी चुप्पी साधकर बैठ गये हैं। नगर निगम के स्वास्थ्य अनुभाग ने शहर में सफाई व्यवस्था दुरुस्त करने के लिए साढ़े चार करोड़ रुपये से 10 डंपर ट्रकों की खरीद के लिए आॅर्डर बनाया। नगर निगम ने विषय विशेषज्ञों से सलाह मश्वरा करने के बाद तय किया कि अशोक लीलैंड कंपनी के डंपर ट्रक खरीदे जायेंगे। नगर निगम के स्वास्थ्य अनुभाग ने विषय व तकनीकी विशेषज्ञों से सलाह मश्वरा करने के बाद गत वर्ष 7 अक्टूबर 2023 को वर्क आॅर्डर जारी किया।

यह वर्क आॅर्डर बैक्सी लिमिटेड कंपनी के नाम जारी किया गया था। कंपनी को हिदायत दी गई थी कि अशोक लीलैंड कंपनी के डंपर ट्रक सप्लाई करके उनकी चेसिस व अन्य पत्रावलियां जैम पोर्टल पर भी डाउनलोड की जायें। वर्क आॅर्डर जारी कराने के बाद फाइलों की कागजी खानापूर्ति तो बंद कर दी गई, लेकिन इसके बाद नगर निगम के स्वास्थ्य अनुभाग के अधिकारियों ने खेल शुरू कर दिया। बैक्सी लिमिटेड कंपनी के अधिकारियों के साथ मिलीभगत करके अशोक लीलैंड के स्थान पर महेंद्रा ब्लेजो डंपर ट्रकों की सप्लाई मंगवा ली गई।

यह सभी नये डंपर नगर निगम के दिल्ली रोड वाहन डिपो पहुंचे तथा इन्हें यहीं पर खड़ा भी करा दिया गया। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि उक्त निविदा में प्रतिभागी समस्त फर्मों द्वारा अपलोड किये गये प्रपत्र आॅनलाइन जैम पोर्टल पर संरक्षित है, जिनका अवलोकन जैम पोर्टल पर भी किया जा सकता है,

लेकिन आपूर्ति के महेंद्रा ब्लेजो डंपर जब सामने खड़े रहे और अधिकारियों की छिछालेदर होती रही तो इन डंपरों को चोरी छिपे नगर निगम के दिल्ली रोड वाहन डिपो के सरस्वती लोक में बनाये गये नये ज्वाइंट वाहन डिपो में भेज दिया गया। तब से पिछले पांच महीने से यह ट्रक सरस्वती लोक के ज्वाइंट डिपो में खड़े धूल फांक रहे हैं।

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‘जनवाणी’ ने अपने गत आठ मार्च के अंक में नगर निगम में नगर आयुक्त की शह पर हुए इस महाघोटाले का पूरा खुलासा किया। ‘जनवाणी’ में खबर छपने के चौथे दिन चोरी छिपे इनके साथ खरीदे गये दूसरे ट्रकों को ज्वाइंट डिपो से हटाया जाने लगा। इस बीच ज्वाइंट डिपो में सभी दरवाजे भी बंद कर दिये गये तथा अलग से दो कर्मचारियों की सुरक्षा में ड्यूटियां भी लगा दी गर्इं। इस मामले की शिकायत मिलने के बाद मुख्यमंत्री के प्रमुख सचिव संजय प्रसाद ने नगर आयुक्त को नोटिस जारी किया है।

इसमें नगर आयुक्त से शिकायत संदर्भ संख्या-12138240042235 के बारे में पूछा गया है कि वाहनों की आर्डर के विपरीत खरीद क्यों की गई है तथा इसमें वर्तमान में क्या स्थिति है? नगर आयुक्त को आदेश दिया गया है कि उक्त खेल की जांचोपरान्त तत्काल आख्या दी जाये। मुख्यमंत्री के प्रमुख सचिव के सीधे नगर आयुक्त से जवाब तलब करने से नगर निगम मे अधिकारियों में हड़कम्प मच गया है। नगर निगम में घोटाले करने में माहिर अधिकारियों की पूरी फौज अपने आका को बचाने की कोशिशों में जुट गई है।

मुखिया के चोरी छिपे किये गये इस घोटाले को साफ सुथरा बनाने का खेल शुरू हो गया है। छोटे स्तर के अधिकारियों को बलि का बकरा बनाने की कोशिश शुरू हो गई है, लेकिन नगरायुक्त अपनी जवाबदेही से कैसे भाग सकते हैं। भ्रष्टाचार की उंगली तो उनकी तरफ ही उठ रही हैं। जब फाइल पर फाइनल हस्ताक्षर उनके हुए हैं। इसके बाद ही वाहन खरीदे गए। हरी झंडी मिलने के बाद ही ये भ्रष्टाचार का खेल चला हैं।

ममता पर भी आ सकती है जांच की आंच

नगर निगम में फर्जी तरीके से भर्ती हुए 23 कर्मचारियों की जांच अपर नगरायुक्त ममता मालवीय को दी गई थी। एक वर्ष के लंबे समय में भी वह 23 कर्मियों की फर्जी नियुक्ती के मामले की जांच पूरी नहीं कर पाई। पूरी फाइल पर कुंडली मारकर बैठी रही। फाइलों को लेकर भ्रष्टाचार होने की अंगुली भी उठी, क्योंकि तभी तो फाइलों को इतने लंबे समय तक दबाया गया। कई और भी मामले है, जिसमें ममता मालवीय पर जांच के नाम पर फाइल को पेडिंग में डालने की शिकायत होती रहती हैं।

एक एनजीओ ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से उनकी निजी सम्पत्ति की जांच की मांग की हैं, जिसमें उनकी आय से अधिक सम्पत्ति खरीदने की शिकायत हुई हैं। इसकी जांच में भी अपर नगरायुक्त ममता मालवीय फंस सकती हैं। क्योंकि 23 कर्मचारियों की फर्जी नियुक्त की जांच की आंच ममता मालवीय पर भी आ सकती हैं। आखिर उन्होंने एक वर्ष तक फाइल को क्यों लटकाया। जो जांच 15 दिन या फिर तीस दिन में होनी चाहिए थी, उसमें एक वर्ष से ज्यादा कैसे लग गया?

हालांकि फर्जी नियुक्ती के मामले में अपर आयुक्त महेंद्र प्रसाद ने एक पत्र नगर निगम नगर आयुक्त अमित पाल शर्मा को लिखा था, जिसमें कहा गया है कि नगर निगम में आॅडिटर (एमएनपी) एवं लेखाधिकारी द्वारा प्रस्तर आपत्ती आख्या अनुसार अवैध नियम विरुद्ध नियुक्ति की खुली जांच के मामले में भेजा हैं। इसी पत्र में फर्जी नियुक्ती पाने वाले कर्मचारियों की वेतन की वसूली करने के आदेश दिये गए थे।

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भ्रष्टाचार की कालिख से दागदार निगम

15वें वित्त आयोग के पैसे के जरिये नगर निगम में भ्रष्टाचार हुआ और उसे भ्रष्टाचार का मामला दबा भी दिया। यही वजह है कि नगर निगम में खुला भ्रष्टाचार चल रहा हैं। कभी सड़क का तो कभी हाउस टेक्स का। सांसद राजेन्द्र अग्रवाल ने भी इस मामले का संज्ञान लेते हुए शासन को पत्र लिखा था, मगर कार्रवाई इसके बाद भी नहीं हुई। ये बड़ा भ्रष्टाचार का मामला था, जो फाइलों में जांच के नाम पर फिर दबा दिया गया।

तब कहा गया था कि संबंधित इंजीनियरों के खिलाफ जांच रिपोर्ट राज्य सरकार तक पहुंचाई गई थी। फिर भी इसमें कोई कार्रवाई नहीं हुई। चुनाव में भी ये भ्रष्टाचार का मुद्दा उठ सकता हैं। सड़कों में भ्रष्टाचार के एक-दो नहीं, बल्कि कई मामले सामने आ चुके हैं। वर्तमान नगरायुक्त अमित शर्मा के कार्यकाल में भ्रष्टाचार व्यापक स्तर पर सामने आ रहा हैं। इतना भ्रष्टाचार नगर निगम के इतिहास में कभी नहीं हुआ। चार कर्मचारी भ्रष्टाचार के मामलों में एंटी करप्शन ने छापा मारकर गिरफ्तार कर चुके हैं। ये तमाम भ्रष्टाचार नगर निगम अफसरों के मुंह पर कालिख पोत रहे हैं,

लेकिन इसके बाद भी भ्रष्टाचार के हमाम में नंगा हो चुके अफसर शर्ट को सफेद बता रहे हैं। सड़कों के घोटाले हो या फिर हाउस टैक्स में भ्रष्टाचार के मामले, अब इनका संज्ञान शासन ने ले लिया हैं, जिसमें अफसरों की गर्दन नप सकती हैं। भले ही उत्तर प्रदेश की योगी सरकार भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने के लिए अनेक प्रयास करने और सख्त से सख्त एक्शन के दावे कर रही हो, लेकिन भ्रष्टाचारी नए-नए तरीके से सरकारी धन से अपनी जेबें भरने से बाज नहीं आ रहे।

दरअसल 15वें वित्त आयोग के तहत टीपी नगर स्थित गुप्ता कॉलोनी में 295 मीटर सड़क निर्माण होना था, लेकिन टेंडर 295 के बजाय 600 मीटर का जारी किया गया। इतना ही नहीं पीडब्ल्यूडी और नगर निगम के कुछ कर्मचारियों ने मिलकर सड़क का बजट भी डेढ़ करोड़ से ज्यादा का बना दिया।

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