कहते हैं कि जल में रहकर मगरमच्छ से बैर नहीं करना चाहिए। परंतु आज के समय में लगता है कि बिना बैर किए जीवन अधूरा है। विरोध न हो तो आदमी को नींद नहीं आती, और यदि नींद आ भी गई तो सपना जरूर ऐसा आता है कि कोई मंच पर खड़ा होकर ताली बजा-बजा कर नारे लगा रहा है—‘हम विरोध करते हैं!’ समय था जब ‘निर्विरोध निर्वाचित’ होना समाज में प्रतिष्ठा की बात मानी जाती थी। गाँव का सरपंच हो या नगर निगम का पार्षद—यदि बिना विरोध के चुन लिया जाए तो यह माना जाता था कि जनसमूह को उन पर पूर्ण भरोसा है। परंतु अब हालात उलट गए हैं। अब निर्विरोध को लोग ‘संदिग्ध’ मानते हैं। जैसे कोई कहे—‘भाई साहब, फलां जी निर्विरोध चुने गए।’ तो कानाफूसी शुरू—‘लगता है कुछ सेटिंग-वेटिंग हुई है…वरना आजकल कौन इतना लोकप्रिय है कि कोई विरोध न करे!’
चुनाव आयोग जब कहता है—‘विशेष गहन पुनरीक्षण होगा।’ तो जनता सोचती है कि अब कुछ नाम कटेंगे, कुछ जुड़ेंगे। लेकिन उम्मीदवारों की सोच कुछ और होती है—‘देखो, यह पुनरीक्षण भी किसी न किसी का वोट काटने के लिए है, हम विरोध करते हैं।’ और यदि पुनरीक्षण न हो तो भी विरोध—‘देखो, लोकतंत्र का अपमान हो रहा है, हम विरोध करते हैं।’ विरोध की यह परंपरा चुनावों में अद्भुत रंग दिखाती है। पोस्टर लगे नहीं कि उधर से विरोध की गूंज उठती है—‘पोस्टर जरा ऊंचा क्यों लगाया? यह अन्याय है।’ अगर चुनावी सभा में चाय मिले तो विरोध—‘यह तो वोटरों को रिझाने का षड्यंत्र है।’ और अगर चाय न मिले तो भी विरोध—‘जनता की बुनियादी जरूरतों की अनदेखी हुई है।’ यानी चाय का प्याला भी लोकतंत्र की परीक्षा का प्रश्नपत्र बन गया है। विरोध करना ही राजनीति हो गया है।
कहा जाता है, ‘जो दिखता है वही बिकता है।’ पर आज की राजनीति में कहावत है—‘जो विरोध करता है वही दिखता है।’ यदि आपने विरोध नहीं किया तो आप अस्तित्वहीन हैं। एक नए नेता को विरोध करना ही पड़ता है, ताकि अखबार में उसका नाम आ जाए। विरोध का फायदा यह है कि आपको अलग से विज्ञापन देने की आवश्यकता नहीं। बस किसी कार्यक्रम में जाकर नारा लगा दीजिए—‘हमें यह मंजूर नहीं!’ और अगले दिन आप ‘नवोदित जननेता’ घोषित।
और शायद आने वाले समय में चुनाव भी विरोध के आधार पर ही होंगे। उम्मीदवार का प्रचार नारा कुछ ऐसा होगा—‘आप हमें वोट दीजिए, हम हर चीज का विरोध करेंगे। चाहे आपको पसंद आए या न आए, हम विरोध सुनिश्चित करेंगे।’ विरोध अब केवल असहमति का प्रतीक नहीं, बल्कि जीवन जीने की अनिवार्य शर्त बन चुका है। बिना विरोध के अब कोई काम ‘ढंग का’ नहीं माना जाता। यह अलग बात है कि विरोध से समाधान मिलता है या नहीं। परंतु पब्लिसिटी तो पक्की है, और आजकल पब्लिसिटी ही राजनीति की आॅक्सीजन है।

