
अठारहवीं लोकसभा के पहले सत्र ने दो बातें पूरी तरह साफ कर दी हैं। पहली यह कि विपक्ष का वह आत्मविश्वास उसके पास लौट आया है, 2014 के लोकसभा चुनाव में उसने जिसे गंवाया तो 2019 में भी वापस नहीं पा सका था। इस आत्मविश्वासवापसी का ही नतीजा है कि कभी संवैधानिक मूल्यों की बिना पर सत्तापक्ष को ललकारने तक में असमर्थ हो चुका वह अपने हाथों को उसके गिरेबान तक पहुंचाने के फेर में रहने लगा है। उसके ‘जय संविधान’ के नारे ने इस लोकसभा सत्र में न सिर्फ नये सांसदों के शपथ-ग्रहण के वक्त से ही धूम मचाये रखी, बल्कि लोकसभाध्यक्ष के चुनाव, राष्ट्रपति के अभिभाषण, उसके लिए धन्यवाद के प्रस्ताव पर चर्चा और प्रधानमंत्री के जवाब के वक्त भी सत्तापक्ष को सांसत में डाले रखा। लोकसभा में ही नहीं, राज्यसभा में भी।
लोकसभा में इसकी परिणति इस रूप में भी दिखी कि विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने लोकसभा में अपने पहले भाषण में यह दावा कर डाला कि ‘इंडिया’ भाजपा को, और तो और, उसके गढ़ गुजरात के आगामी विधानसभा चुनाव में भी हरा देगा। उन्होंने इस दावे में जानबूझकर ‘कांगे्रस’ के बजाय ‘इंडिया’ कहा, जिससे पता चलता है कि विपक्ष के नेता के रूप में ‘इंडिया’ में एकता व सौमनस्य को लेकर वे कितने सतर्क हंै-प्रधानमंत्री द्वारा उसे लेकर कांगे्रस को परजीवी करार देने के बावजूद। जो दूसरी बात साफ हुई है, वह यह कि ‘नई’ सरकार फिलहाल, कोई नई रीति-नीति अपनाने नहीं जा रही। साफ कहें तो राष्ट्रपति के अभिभाषण पर चर्चा में लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी द्वारा उठाये गये मुद्दों को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा अपने जवाब में जिस तरह ‘बालबुद्धि का प्रलाप’ करार दिया, वह इसी का संकेत है। यानी तीसरे कार्यकाल में भी विपक्ष के प्रति उनका रवैया अपरिवर्तित ही रहने वाला है।
ऐसे में सवाल है कि क्या महज विपक्ष का बढ़ा हुआ आत्मविश्वास उसको उसकी मंजिल तक पहुंचा देगा? फिलहाल इसका ‘हां’ में जवाब देना मुश्किल है। क्योंकि सत्तापक्ष कहें या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उसे इतनी भी सहूलियत नहीं देने वाले कि चौबीस घंटों में ज्यादा नहीं तो कुछ पल को ही चुनाव मोड में न रहें। जो स्थितियां हैं, उनमें विपक्ष का इस भरोसे बैठे रहना भी गलत होगा कि भाजपा की घटी हुई शक्ति के कारण वह मोदी सरकार को संसद में लगातार घेरे रखकर जल्दी ही इतनी कमजोर कर देगा कि वह अपने सहयोगियों, विपक्ष के शब्दों में बैसाखियों का बोझ उठाती-उठाती ही ढह जाएगी या कोई ऐसा ‘ब्लंडर’ कर डालेगी, जिससे ऐसा जनरोष भड़क जाएगा कि उसके लिए उससे पार पाना संभव नहीं रह जाएगी। बीता हुआ दशक गवाह है कि विपक्ष, खासकर कांगे्रस, द्वारा 2014 से ही किया जा रहा ऐसे ब्लंडर का इंतजार अभी तक खत्म नहीं हो पाया है।
विपक्ष के लिए इसका एकमात्र सबक यही है कि उसकी संभावनाएं ऐसे इंतजार में समय गंवाने से नहीं, माहौल बदलने में हासिल हुई सफलता को जमीनी हकीकत का बदलाव बनाने में लगने से उज्ज्वल होंगी। वह ‘फिर चुनाव आएगा तो देखेंगे’ के चक्कर में पड़ा तो क्या पता कि कब मध्यावधि चुनाव सामने आ खड़ा हो और उसके हाथों के तोते उड़ा दे! ऐसे में बेहतर होगा कि वह अपने सारे सांसदों को बिना देर किए अपने-अपने चुनाव क्षेत्रों में जाने और मतदाताओं को धन्यवाद ज्ञापित कर उनकी चिन्ताओं व समस्याओं से जुडे रहने को कहे। न सिर्फ उन मतदाताओं की समस्याओं व चिंताओं से, जिन्होंने उन्हें वोट दिए, बल्कि उनकी समस्याओं व चिंताओं से भी, जिन्होंने किसी कारण वोट नहीं किया। ऐसा करने से इन सांसदों और उनकी पार्टी दोनों की स्वीकार्यता बढ़ेगी, संभावनाएं उज्ज्वल होंगी व बनी रहेंगी।
जिन चुनाव क्षेत्रों में विपक्ष को विजय नहीं मिली है, उसके वहां के उम्मीदवारों को भी मतदाताओं के बीच बने रहने और पराजय के कारण तलाशकर उन्हें दूर करने में लगने की जरूरत है-सबसे ज्यादा बिहार में है, जहां उर्वर व अनुकूल भूमि होने के बावजूद उसके उसे ज्यादा सफलता नहीं मिली। सीटों के बंटवारे में अपनी जिद पर अड़े रहकर इंडिया को टूट के कगार तक पहुंचा देने वाला राष्ट्रीय जनता दल भी कोई करिश्मा नहीं कर पाया।
विपक्ष को अपनी सारी राहों के सारे कांटे बुहारने हैं तो उन राज्यों पर तो फोकस करना ही चाहिए, जहां अगले कुछ महीनों में या अगले साल विधानसभा चुनाव होने हैं, उन राज्यों की भी अनदेखी नहीं करनी चाहिए, जहां अभी चुनाव नहीं हो रहे। साथ ही यह भी ‘सिद्ध’ करना चाहिए कि उसने चुनाव में प्रधानमंत्री के ‘चार सौ पार’ के नारे को लोकतंत्र व संविधान के लिए खतरा बताकर भ्रम या झूठ नहीं फैलाया था, जैसा कि अब भाजपा और प्रधानमंत्री कह रहे हैं। वह दावा कर सकता है कि इसके उलट उसने मतदाताओं को सच्चाई से आगाह किया था और सच्चाई यह है कि संविधान व लोकतंत्र के समक्ष उपस्थित खतरे सिर्फ इसलिए टले दिख रहे हैं कि भाजपा अपने दम पर बहुमत से दूर रह गई है। यह वैसे ही है, जैसे अटलबिहारी वाजपेयी के वक्त भाजपा के समक्ष राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के बैनर पर सत्ता-सेवन के अलावा कोई रास्ता नहीं था, तो उसने अपने तीन विवादास्पद मुद्दों को ठंडे बस्ते में डाल दिया था। लेकिन जैसे ही ‘महानायक’ ने उसे बहुमत दिलाया, उसने उनको बाहर निकालकर भुनाने में कुछ भी उठा रखा।
हां, विपक्ष को खुद को नाम के विपक्ष के बजाय नीतिगत (यानी वास्तविक) विपक्ष बनाने और अपने समर्थक मतदाता समूहों, खासकर दलितों, पिछड़ों व अल्पसंख्यकों के बीच के अंतर्विरोधों को हल करने के रास्ते की सारी बाधाएं अत्यंत शीघ्रता से दूर करनी होगी। अन्यथा जो स्थितियां बनेगी वे उसकी एकता के लिए भी खतरे पैदा करेंगी और संभावनाओं के लिए भी। उनसे बचने के लिए उसे हर पल याद रखना होगा कि सत्तापक्ष उसकी संभावनाओं को कम से कम दो तरीकों से धूल-धूसरित कर सकता है। पहला रास्ता उसके नेताओं (पढ़िये: सांसदों) के लोभ-लालच व महत्वाकांक्षाओं को जगाकर उनकी खरीद-फरोख्त का है-‘आपरेशन लोटस’ का, और दूसरा उसके समर्थक तबकों के अंतर्विरोधों को भड़काकर उन्हें एक दूजे के विरुद्ध खड़़ा कर देने का। एक लोकप्रिय फिल्मी गीत के शब्द उधार लेकर कहें तो विपक्ष इन दोनों अंदेशों की रातों से बचकर ही सहर देख सकता और अपनी दुआओं में असर पैदा कर सकता है।


