Friday, March 20, 2026
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जन सर्वोपरिता का सवाल

आप एक जनसेवक हैं लेकिन एक नागरिक की समस्याओं की सुनवाई नहीं कर रहे हैं।’ मैंने डरते -डरते शब्दों को जितना हो सके उतना विनम्र बनाकर कहा।

‘हम आपकी समस्याएं सुनने के लिए ही तो बैठे हैं।’, अफसर ने कुर्सी पर फैलते हुए अपने कनिष्ठ की ओर आंख दबाते हुए कहा।

‘लेकिन यह तो आप हर बार कहते हैं! आखिर कब तक यह टाल-मटोल होती रहेगी!’ मैं पचास चक्कर लगा चुका हूं लेकिन मेरी समस्या का हल नहीं हो रहा है।’

‘फाइल चल रही है न। काम तो नियम से ही होते हैं। आप पचास चक्कर लगाएं या सौ चक्कर, उससे तो आपकी समस्या हल होने से रही।’अफसर के माथे पर शिकन उभर आई थी और चेहरे पर बल पड़ने लगे थे।

‘तो फिर मैं क्या करूं?’ मेरी आवाज में अब वह नागरिक वाला रूतबा दम तोड़ने लगा था और वह याचक बनने की मुद्रा में आने लगा था।

‘आप वही कर रहे हैं जो एक अच्छे नागरिक को करना चाहिए,’ अफसर ने समझाया, ‘ दफ्तर तक आना, पूछना, इंतजार करना और लौट जाना। यही लोकतांत्रिक अनुशासन है।’

‘लेकिन लोकतंत्र में जनता सर्वोपरि होती है…उसकी हर बात को तवज्जो दी जाना चाहिए’ अब मेरे नागरिक होने के अहंकार ने आवाज बुलंद कर दी। मुझे लगा कि कहीं मैंने संविधान का सहारा लेने की भूल तो नहीं कर दी!

अफसर मुस्कराया, ‘बिलकुल! जनता सर्वोपरि है। !’

‘तो फिर जनता की समस्या,…’

‘देखिए,’ उसने मुझे लोकतंत्र की सीढ़ियां समझार्इं, ‘जनता ने अपने हिस्से का काम जनप्रतिनिधियों को सौंप दिया,जनप्रतिनिधियों ने वह काम हम जनसेवकों को सौंप दिया, और अब जनता का काम है प्रतीक्षा करना।’

‘तो जवाबदेही किसकी है?’ मैंने आखिरी पत्ता फैंका।

‘जवाबदेही भी बंटी हुई है,’ अफसर बोला, ‘इतनी बंटी हुई कि किसी के पास पूरी नहीं बची।और जहां पूरी जवाबदेही नहीं होती, वहाँ पूरी गलती किसी की होती भी नहीं।’

‘लेकिन अगर जनसेवक ही गलत करे तो?’ मैंने लगभग पूरी तरह से रूआंसा होते हुए पूछा।
अफसर ने फाइल थपथपाई ‘जनसेवक जो करे, वही फाइनल, क्योंकि वही फाइल देख रहा है,और जो फाइल देखता है, वही तय करता है कि सच क्या है और समस्या क्या है और उसका हल क्या है।’

‘और जनता?’

‘जनता?’ वह खिड़की से बाहर झांकने लगा, ‘जनता तो एक आदर्श है, जनता जनार्दन है। जनता लोकतंत्र में स्वामी है भाषणों में चमकती हुई, पोस्टरों में मुस्कराती हुई, और दफ्तरों में प्रतीक्षा करती हुई।’

मैं चुपचाप उठ खड़ा हुआ। लोकतंत्र को भीतर से बाहर उठकर जाते हुए देखता रहा और जन सर्वोपरिता को धड़ाम से नीचे गिरते महसूस करने लगा।

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