Wednesday, March 18, 2026
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आधी आबादी की सुरक्षा का सवाल

Samvad


lalji jayswalपिछले दिनों मणिपुर, पश्चिम बंगाल और राजस्थान सहित देश के अलग अलग क्षेत्रों में महिलाओं के साथ हुई घटनाओं ने देश का व्यथित कर दिया है। वास्तव में यह सभ्य समाज के लिए बड़ी ही चिंता का विषय है। यहां तक कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी इसकी कड़ी निंदा की है। उन्होंने कहा कि दोषियों को किसी भी हालत में बख्शा नहीं जाएगा। मालूम हो कि सुप्रीम कोर्ट ने भी इस मामले को स्वत: संज्ञान लिया है। चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने केंद्र और राज्य सरकार को सख्त कार्रवाई का निर्देश दिया है। बता दें कि हमारे देश में दिन प्रतिदिन महिलाओं के साथ भयावह हिंसा, सामूहिक बलात्कार और हत्या के मामले देखे जा रहे हैं।

वहीं राजस्थान में रेप और गैंगरेप के मामले थमने का नाम नहीं ले रहे हैं। पिछले दिनों कांग्रेस शासित राज्?य राजस्?थान से भी जघन्य अपराध या यों कहे रेप कांड सामने आया, जिसने इंसानियत को शर्मसार करके रख दिया है। लिहाजा, आज सभ्य समाज को चिंतन करने की जरूरत है कि क्या समाज में महिलाएं सुरक्षित है?

आज लगातार हो रही दुष्कर्म की घटनाएं मानवता को शर्मिंदा होने की ओर इशारा कर रही हैं। आखिर इस अमानवीय अपराधी कृत्यों से समाज कब मुक्त होगा? मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि दुष्कर्म हिंसात्मक आधिपत्य स्थापित करने और परपीड़क सुख प्राप्त करने के ध्येय से अधिक होते हैं।

इनमें दुष्कर्म पीड़िता को एक वस्तु की भांति इस्तेमाल किए जाने की प्रवृत्ति देखी गई है। बहरहाल, एनसीआरबी की रिपोर्ट की ओर से जारी किए आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2018 में देश में महिलाओं पर एसिड अटैक के कुछ 126 घटनाएं सामने आई थीं। इनमें से पचास घटनाएं पश्चिम बंगाल में घटी हैं।

वहीं चालीस के आंकड़े के साथ उत्तर प्रदेश दूसरे स्थान पर रहा, नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो की रिपोर्ट 2018 में इसका खुलासा हुआ था। एनसीआरबी के आंकड़ों के अनुसार एसिड अटैक के मामले में प. बंगाल शीर्ष स्थान पर था। नेशनल क्राइम रिसर्च ब्यूरो की रिपोर्ट बताती है कि यौन हिंसा से जुड़े तमाम मामले लंबित पड़े हुए हैं, महिलाओं के प्रति हिंसा के लंबित मामलों का प्रतिशत 89.6 रहा है।

न्याय तंत्र की इस विफलता के ही कारण महिलाओं के प्रति यौन अपराध में कमी नहीं आ रही है। साथ में आज इंटरनेट की अश्लीलता पर प्रतिबंध लगाने के लिए उचित कदम उठाने की भी जरूरत है। इंटरनेट और सोशल मीडिया एक ऐसा जरिया है जहां लोग अपने विचार रख सकते है। पर आजकल लोग इसे हथियार की तरह इस्तेमाल कर रहे है।

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर महिलाओं के बारे में अभद्र टिप्पणी करना, गालियां देना, मखौल उड़ाना, ये सब आज सोशल मीडिया की वजह से आम हो गया है। आज लोगों के उत्पीड़न का अभिकरण सोशल मीडिया ही है, फिर वह चाहे दुष्कर्म की घटनाएं हों या फिर अवैध धन की मांग हो।

एक समतामूलक और लैंगिक विभेद मुक्त समाज के निर्माण के लिए आवश्यक है कि किसी एक जेंडर का किसी दूसरे जेंडर पर प्रभुत्व स्थापित न हो। हमें यह सदैव ध्यान रखना चाहिए कि महिला और पुरुष दोनों में कोई एक-दूसरे से श्रेष्ठ या अधीनस्थ नहीं है। इसलिए अब महिलाओं के प्रति समाज की सोच को बदलना ही होगा।

समाज और परिवार में महिलाओं की प्रतिभा को कम करके आंकना, उन्हें परिवार तक सीमित रखने का तर्क देना, उन्हें केवल शरीर के रूप में स्वीकारना, यह मानना कि उनमें निर्णय लेने की क्षमता का अभाव होता है, ऐसी तमाम बातें महिलाओं को अपनी अस्मिता को स्थापित करने से रोकते हैं।

अत: अब केंद्र व राज्य सरकारों के साथ समाज पर यह जिम्मेदारी है कि वे इस प्रकार के सामाजिक मानसिकता और उससे उपजते अपराधों पर नियंत्रण के लिए सामाजिक और भौतिक ढांचे का विकास करें। दुनियाभर के समुदायों को बाल यौन उत्पीड़न की चुनौती का भी सामना करना पड़ रहा है, जो आज यह एक वैश्विक महामारी बन चुकी है, जिससे दस में से एक बच्चा प्रभावित होता है।

यूके ने उत्पीडन के बाद अपराधियों से निपटने और पीड़ितों की सहायता के लिए कई प्रकार की सेवाओं की शुरुआत की है। भारत को भी कुछ इसी के तर्ज पर प्रयास करने की जरूरत है। आज स्कूल और कॉलेज के पाठ्यक्रम में समानता और महिलाओं की स्वायत्तता के प्रति सम्मान दिखाने के सामाजिक मूल्यों से संबंधित अध्याय जोड़े जाने की भी जरूरत है।

साथ ही महिलाओं के लिए सार्वजनिक परिवहन को सुरक्षित बनाना होगा। नगरों में पर्याप्त रोशनी की व्यवस्था भी जरुरी है और सीसीटीवी कैमरे भी लगाने होंगे। असुरक्षित क्षेत्रों में पुलिस पेट्रोलिंग बढ़ानी होगी। बच्चियों के प्रति होने वाले अधिकांश यौन शोषण के मामले में देखा गया है कि बच्चियां समझ ही नहीं पातीं कि उनके साथ गलत किया जा रहा है।

ऐसे में मां-बाप को बच्चियों को शुरू से ही स्पर्श से संबंधित ‘गुड टच’ और ‘बैड टच’ की जानकारी देनी चाहिए ताकि जब कभी उन्हें इस तरह की गंदे स्पर्शों से गुजरना पड़े तो वो इस बात को समझ पाए कि उनके साथ गलत हो रहा है। आज यह एक अच्छी पहल की जा रही है कि स्कूलों में विशेष तौर पर लड़कियों को सेल्फ डिफेंस की ट्रेनिंग दी जा रही है। यौन हिंसा को रोकने के लिए सहशिक्षा को भी बढ़ावा मिलना चाहिए।

विपरीत लिंग के प्रति आकर्षण चूंकि कुदरती देन है, इसलिए महिलाओं और पुरुषों दोनों को अपनी सीमाओं का विशेष ख्याल रखना जरूरी है। इसे हर हाल में नैतिकता का पैमाना बनाना ही घृणित सोच को बदलने का सबसे कारगर तरीका होगा। अगर मनुष्य के रूप में बराबरी और महिला अस्मिता के प्रश्न को उठाते हुए महिलाओं की स्थिति में सुधार लाना है तो उसकी नैतिकता को भी अस्मिता से जोड़ना होगा और जो पुरानी नैतिकता सदियों से चली आ रही है।


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