कई दिनों से देख रहा था कि वे जब देखो तब खोये-खोये से रहा करते थे। परस्पर बातचीत में भी उनका ध्यान भटक जाया करता था। इसके चलते उनसे होती बातचीत के दौरान कई बार अपनी बात को दोहराना पड़ता था। लिहाजा बीते दिनों उनसे पूछ बैठा, ‘भाई, कहां खोये रहा करते हो-आखिर आपके मन में क्या चल रहा होता है?’ शायद कि उन्होंने मन का दर्द साझा करना उचित समझा, लिहाजा फूट पड़े ‘क्या बताऊं आपको, दिमाग की घंटी बज रही है। ऐसा नहीं है कि मेरी निजी जिंदगी में कोई उलझन है। दरअसल बीते कुछ वर्षों से प्रिंट एवं इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में प्रकाशित एवं प्रसारित होने वाले राजनीतिक समाचारों के प्रति गहरा रुझान रखता रहा हूं। जिसके चलते मन:स्थिति डांवाडोल होती जा रही है। कभी इधर के पक्ष में मन बनता है तो कभी उधर के। यूं समझ लीजिए कि नित्य प्रति मेरी राजनीतिक निष्ठा में भारी उतार-चढ़ाव आया करता है।’ इतना सुनते ही मैं कुछ यूं आश्वस्त हुआ कि चलो एक अपुन ही नहीं है, जो इस स्थिति से गुजर रहे हैं।
फिर भी मैंने उन्हें दिलासा देते हुए कहा कि हर एक राजनीतिक कथन अथवा घटना का मूल्यांकन तर्क के आधार पर करना चाहिए। आजकल हवा हवाई बातों का चलन जोरों पर है। हम अपना विवेक जागृत रखें, तो ऐसी उलझन की स्थिति से बचे रह सकते हैं। इस पर वे और खुल गए, बोले कि ‘ऐसा नहीं है कि मैं कोई कान का कच्चा होऊं या फिर एकदम भोलाभाला प्राणी होऊं। यदि कोई बात तर्कसम्मत हुआ करती है, तो ही भरोसा करता हूं। लेकिन इन दिनों राजनीति में क्या तो तर्क है और क्या कुतर्क है, यह समझ पाना बहुत मुश्किल जान पड़ता है। राजनीतिक बिरादरी में आए दिन आंकड़ों के सहायता से दिन को रात और रात को दिन सिद्ध करने की होड़ दिखाई देती है।’
उनके कथन की सत्यता को मै स्वयं अनुभूत कर रहा था। लेकिन जैसा कि अक्सर होता है, कोई बात किसी को समझाने के लिए हम बहुत समझदारी की बात कह देते है। लेकिन अपनी ही समझ को अपनी समझ में नहीं बैठा पाते। खैर, मैंने निरुत्तर होने की अपेक्षा यही कहना उचित समझा, ‘देखो भाई, जब आंधी और तूफान का दौर हो और हम कुछ भी कर पाने में समर्थ नहीं हों, तो अपनी आंखें मूंद लेना चाहिए-नहीं तो और भला हम कर भी क्या सकते हैं। इसलिए बेहतर यही है कि राजनीतिक समाचारों को देखना और पढ़ना एकदम से छोड़ दो।’ यह बात मैंने तो ऐसे ही कह दी लेकिन मुझे आश्चर्यजनक रूप से उनके चेहरे पर चमक दिखाई दी। खैर।
अरसे बाद अब वे मिले, चहक रहे थे। मैंने पूछ लिया, ‘क्या बात है कोई लॉटरी निकल आई है क्या?’ इस पर उन्होंने लगभग चहकते हुए कहा कि ‘मान गए गुरु, क्या युक्ति बताई, आंख मूंदने से रात हो जाती है। और मुझे तो तारों के भी दर्शन होने लगे हैं।’ इतना सुनते ही तत्क्षण मैंने तय कर लिया कि मैं भी उनकी तरह तनाव रहित जिंदगी जीने का आनंद लूंगा। लिखना जरूरी है कि अब मैंने साहित्य के पठन-पाठन के प्रति समर्पित रहने का भाव बना लिया है।

