Saturday, April 11, 2026
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बदलते वक्त में बढ़ेगी प्राकृतिक कृषि की भूमिका

 

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देश में गैर-रासायनिक खेती प्रोत्साहित करने के लिए खरीद के रास्ते भले ही जोर लगाया गया हो लेकिन वास्तविकता में सारे प्रयास अभी तक आधे-अधूरे हैं। भारत सरकार ने 2022 तक किसानों की आय दोगुनी करने का लक्ष्य रखा था लेकिन इसमें अभी तक कोई विशेष सफलता हाथ नहीं लगी है। उत्पादन और मूल्य प्राप्ति दोनों में अनिश्चितता की वजह से किसान उच्च लागत वाली कृषि के दुष्चक्र में फंस गया है। लगातार गिरता उत्पादन और फसलों में बढ़ती बीमारियां कृषि क्षेत्र की जटिलताओं को और बढ़ा रही हैं। इस परिस्थिति से किसानों को निकालने और उनके दीर्घकालिक कल्याण के लिए प्राकृतिक खेती की तरफ रुख करने से इसके सकारात्मक परिणाम मिल सकते हैं।

संपूर्ण विश्व में बढ़ती हुई जनसंख्या एक गंभीर समस्या है। बढ़ती हुई जनसंख्या हेतु भोजन की आपूर्ति के लिए मानव द्वारा अधिक से अधिक उत्पादन प्राप्त करने के लिए तरह-तरह के रासायनिक खादों, जहरीले कीटनाशकों का उपयोग, प्रकृति के जैविक और अजैविक पदार्थो के बीच आदान-प्रदान के चक्र यानी इकालाजी सिस्टम को प्रभावित करता है, जिससे भूमि की उर्वरा शक्ति खराब हो जाती है, साथ ही वातावरण प्रदूषित होता है तथा मानव स्वास्थ्य में गिरावट आती है।

भारतवर्ष में ग्रामीण अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार कृषि है और एक बड़ी आबादी की आय का मुख्य साधन खेती है। हरित क्रांति के समय से बढ़ती हुई जनसंख्या को देखते हुए एवं आय की दृष्टि से उत्पादन बढ़ाना आवश्यक है। अधिक उत्पादन के लिये खेती में अधिक मात्रा में रासायनिक उर्वरको एवं कीटनाशको का उपयोग करना पड़ता है जिससे सीमांत व छोटे किसानों के पास कम जोत में अत्यधिक लागत लग रही है और जल, भूमि, वायु और वातावरण भी प्रदूषित हो रहा है, साथ ही खाद्य पदार्थ भी जहरीले हो रहे हैे। इसलिए इस प्रकार की उपरोक्त सभी समस्याओं से निपटने के लिये प्राकृतिक कृषि पर सरकार बल दे रही है।

प्राकृतिक खेती पारंपरिक भारतीय पद्धतियों से उद्धृत रासायन मुक्त कृषि की एक विधि है। यह एक अनूठा मॉडल है जो कृषि-पारिस्थितिकी पर निर्भर करता है। इसका उद्देश्य उत्पादन की लागत को कम करना और सतत कृषि को बढ़ावा देना है। प्राकृतिक खेती मिट्टी की सतह पर सूक्ष्मजीवों और केंचुओं द्वारा कार्बनिक पदार्थों के विखंडन को प्रोत्साहित करती है, धीरे-धीरे समय के साथ मिट्टी में पोषक तत्वों को जोड़ती है। हालांकि, जैविक खेती में, जैविक खाद, वर्मी-कम्पोस्ट, और गाय के गोबर की खाद का उपयोग किया जाता है तथा इन्हे कल्टिवेटेड खेत में प्रयोग किया जाता है।

जीरो बजट प्राकृतिक कृषि एक ऐसी पद्धति है जो लागत कम करने के साथ ही जलवायु स्थायी कृषि तथा किसानों को स्थानीय स्तर पर इनपुट का उपयोग करने के लिए प्रोत्साहित करती है और कृत्रिम उर्वरकों और कीटनाशकों के उपयोग को समाप्त करती है। तथा मृदा स्वास्थ्य एवं मानव स्वास्थ्य को नुकसान से बचाती है।

शून्य बजट प्राकृतिक खेती, एक अनूठा तरीका है, जिसमें बाजार से बीज, उर्वरक और पौधों के संरक्षण रसायनों जैसे महत्वपूर्ण आदानों की खरीद के लिए कोई मौद्रिक निवेश की आवश्यकता नहीं होती है। किसान उर्वरकों और कीटनाशकों के बिना फसल की स्थानीय किस्मों को उगा सकते हैं। चूंकि यह एक शून्य बजट खेती है इसलिए किसी संस्थागत ऋण की आवश्यकता नहीं होगी और मानव श्रम पर निर्भरता भी कम से कम हो जाएगी। शून्य बजट प्राकृतिक खेती विभिन्न कृषि सिद्धांतों के माध्यम से मिट्टी की उर्वरता में सुधार करने के बारे में है।

प्राकृतिक खेती कई अन्य लाभों, जैसे कि मिट्टी की उर्वरता और पर्यावरणीय स्वास्थ्य की बहाली, और ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन का शमन या निम्नीकरण प्रदान करते हुए किसानों की आय बढ़ाने का मजबूत आधार प्रदान करती है। प्राकृतिक खेती प्राकृतिक या पारिस्थितिक प्रक्रियाओं, जो खेतों में या उसके आसपास मौजूद होती हैं, पर आधारित होती है। किसानों की आमदनी दोगुना करने व साथ ही अनाज का उत्पादन भी वर्तमान की तुलना में दोगुना करने के प्रधानमंत्री द्वारा निर्धारित लक्ष्य खेती की इसी विधि से हासिल किए जा सकते हैं। यही नहीं, जीरो बजट प्राकृतिक खेती के तहत जो फसल उगाई जाती है उसकी पैदावार भी काफी अच्छी होती है।

एविडेंस आॅन होलिस्टिक बेनिफिट्स आॅफ आॅर्गेनिक एंड नैचुरल फार्मिंग इन इंडिया (2004-20) नामक रिपोर्ट जारी में किया गया है। प्राकृतिक खेती के दृष्टिकोण और फायदे को लेकर सबूतों के आधार पर यह रिपोर्ट साफ शब्दों में बताती है कि गैर रासायनिक खेती को व्यापक विस्तार दिया जा सकता है। यह रिपोर्ट भविष्य की नीतियों के लिए एक स्पष्ट रास्ता दिखाती है कि सिर्फ पैदावार के बजाय जैविक या प्राकृतिक खेती के विभिन्न फायदों को समग्रता से देखा जाना चाहिए।

वैज्ञानिक समुदाय और नीति निमार्ता इन तथ्यों पर ध्यान देंगे और गैर रासायनिक खेती को प्रोत्साहित करेंगे। 2014-19 के बीच 504 बार दर्ज पैदावार के परिणाम बताते हैं कि प्राकृतिक खेती के जरिए उच्चतम पैदावार 41 फीसदी, आंशिक रसायन आधारित एकीकृत खेती में पैदावार 33 फीसदी और रासायनिक खेती में महज 26 फीसदी पैदावार रही।

नृपेंद्र अभिषेक नृप


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