
हमारे पड़ोसी देश पाकिस्तान में आजादी से लेकर आज तक चुनी हुई सरकारें प्राय: सेना के हाथों की कठपुतलियां ही रही हैं। यही कारण है कि वहां न तो जनता की चुनी हुई सरकारें कभी स्वतंत्र फैसले लेने में सक्षम रहीं और न ही वहां के न्यायालयों की कार्यवाहियां सेना के प्रभावों और दबावों से मुक्त रह पार्इं हैं। इसका सबसे बड़ा कारण पाकिस्तान में लोकतंत्र की जड़ों का कमजोर होना है। प्रश्न है कि जब धार्मिक आधार पर भारत को तोड़कर इस्लामिक देश पाकिस्तान का निर्माण हुआ, तब क्या पाकिस्तान को अपना देश मानकर वहां घर-बार बसाने वाले लोगों को कभी लगा होगा कि एक दिन उनके मुल्क में लोगों के पेट भरना भी मुश्किल हो जाएगा… क्या वहां की जनता ने कभी सोचा होगा कि विदेशों में बसने वाले बेहद धनाढ्य सेनाध्यक्षों और शासकों वाला उनका देश एक दिन कंगाल होकर दर-दर की ठोकरें खाते फिरने के लिए मजबूर होगा… और क्या उन्होंने कभी सोचा होगा कि उनके देश में ‘प्रेम’ और ‘सद्भाव’ पर ही नहीं, बल्कि ‘न्याय’ पर भी कठोर पहरे लगाये जाएंगे, जिसके परिणामस्वरूप लोकतंत्र की जड़ें धीरे-धीरे सूखती चली जाएंगी।