प्रमोद दीक्षित मलय
मेरा बचपन गांव में बीता है और शहर में बसने के बावजूद आज भी अपने गांव से किसी न किसी रूप में रिश्ते की डोर जुड़ी हुई है। मकान से जुड़ी हुई एक बड़ी तलैया जिसके निर्मल जल में अठखेलियां करती मछलियां मन मोह लेतीं। गहरे छिछले खेतों में प्राकृतिक रूप से बन गयी बड़ी पोखर। इसी तलैया पर जाड़ों के मौसम में मैंने दर्जनों प्रवासी पक्षियों को डेरा जमाते, जल पर तैरते और मोहक संगीत बिखरते देखा-सुना है। हालांकि तब मुझे बिलकुल भी मालूम नहीं था कि जाड़ों में आने वाले ये पक्षी दूर देशों से आने वाले प्रवासी पक्षी हैं, यह जानकारी बहुत बाद में हुई जब शिक्षक बन बच्चों के बीच काम करने का अवसर मिला। तब आषाढ़ में धान की बेड़ लग जाती और नवरात्र आते-आते पौधों पर दूधिया दाना बनने लगता। जल्दी पकने वाली धान की किस्में दीपावली तक पकने लगतीं और एक मीठी-भीनी महक वातावरण में घुलने लगती।
धान के खेतों के भरे पानी में छोटी-छोटी मछलियां चांदी सा चमकती बहती रहतीं, लिसलिसे घोंघे अलसाये से रेंगते और केकड़े मेड़ की निचली गीली दरारों में मिट्टी के घरौंदे बनाते रहते। तलैया और पोखर में तो कुछ बड़ी मछलियों और केकड़ों का राज रहता। पोखर और तलैया में अपने आप उग आने वाला धान, जिसे हमारे यहां पसही का धान कहा जाता था, इन दिनों पक जाता था। तो बस, यही तो चाहिए था प्रवासी पक्षियों को। पर्याप्त भोजन, सुरक्षित आवास, प्रजनन हेतु अनुकूल जलवायु।
दीपावली तक तलैया पर रंग-बिरंगे, धूसर, काले-सफेद छोटे-बड़े पक्षियों का कब्जा हो जाता और होली तक बना रहता। गर्मी शुरू होते गेहूं की फसल भी पक चुकी होती, खेत खाली होने लगते, आसमान कुछ-दहकने लगता, पेड़ों की छाया सिकुड़ने लगती, तलैया के चतुर्दिक उगे घास-खरपतवार सूख रहे होते, तलैया में मछलियों की धमाचौकड़ी भी शांत हो जाती तब इन प्रवासी पक्षियों की वापसी उड़ान शुरू हो जाती और एक सप्ताह के अंदर तलैया बेजान, नीरस और उदास हो जाती जैसे किसी मां के बेटे-बेटियां कमाने-खाने परदेश निकल जाते हैं। तब तलैया शुष्क आंखों से अगले वर्ष उनके आने की बाट जोहती, राह तकती। हमें भी कुछ अच्छा नहीं लगता। केवल बच्चों ही नहीं बल्कि बड़े-बुजुर्गों का रिश्ता भी प्रवासी पक्षियों से अपनेपन का रहता। कोई भी व्यक्ति किसी भी पक्षी को हानि नहीं पहुंचाते थे बल्कि कुत्ते-बिल्ली एवं सियार-लोमड़ी से बचाव करते थे। अगर कोई कुत्ता-सियार किसी पक्षी का शिकार कर लेता था तो कई दिन तक घर-परिवार में हम बच्चों को लापरवाही के लिए डांटा जाता और घर में मातम सा पसरा रहता।
यह सह-अस्तित्व का भाव था, जो बिना पाठ पढ़ाये केवल आचरण-व्यवहार द्वारा एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पनपता रहता था। ये पक्षी तलैया में हम लोगों के नहाते समय भी बिना डरे बिलकुल आसपास तैरते और भोजन चुगते रहते। इन पक्षियों में सबसे बड़ा पक्षी सारस होता था, सफेद या कुछ-कुछ बादलों के रंग सा, लम्बी लाल चोंच और बड़ी-ऊंची टांगें। पूरी ऊंचाई हम बच्चों के बराबर या कुछ अधिक ही। सारस हमेशा जोड़े में होते और जब पंख फैलाकर उड़ान भरते तो लगता कि कोई छोटा वायुयान टेकआॅफ कर रहा हो। उसके पंखों की फड़फड़ाहट का ध्वनि कंपन हम महसूस कर सकते थे। उसकी आवाज दूर से ही उसके आने का संकेत कर देती।
अन्य पक्षियों में छोटी चोंच वाले झक सफेद बगुले होते लगता कि छोटे-छोटे बच्चे बर्फ की चादर ओढ़े बैठे हों, कुछ लगभग दो-तीन फीट ऊंचाई वाले एक टांग पर खड़े मंझोली चोंच, सफेद पेट एवं पूरे काले पंखों वाले बड़े बगुले मानों कोई बूढ़ा सफेद कुर्ता पहने ऊपर से काले ऊन का कम्बल लपेटे भजन कर रहा हो। हमारे लिए सभी पक्षी बगुले ही थे जिसे हम अपनी बोली में ‘बक्का’ कहते थे, उनके वैज्ञानिक नाम भी होते हैं, यह पता न था। कुछ बगुले बहुत प्यारे सुंदर बादामी, बैंगनी, हल्के लाल, आसमानी रंग के होते, लगता जैसे किसी त्योहार के लिए नये रंग-बिरंगे कपड़े सिलवाकर पहन लिए हों। ये पक्षी साल दर साल आते रहते और खुशियां बांटते। तब पता नहीं था कि ये पक्षी दूसरे देशों से आते हैं जहां कड़ाके की ठंड पड़ती है, धरती पर बर्फ की चादर बिछ जाती है। दाना-पानी के स्रोत बंद हो जाते हैं तब वे गर्म देशों की ओर उड़ पड़ते। भारत उनकी पसंद का देश होता जहां की जलवायु, भोजन एवं सुरक्षा उनके अनुकूल होती। मई एवं अक्टूबर के द्वितीय शनिवार को मनाया जाने वाला विश्व प्रवासी पक्षी दिवस तभी सार्थक और अपने उद्देश्यों की प्राप्ति में सहायक सिद्ध होगा जब विद्यालयों में बच्चों को पक्षियों के प्रति करुणा का व्यवहार करना सिखाएं और यह तभी सम्भव होगा जब हम बड़े पक्षी प्रेम का आचरण अपने जीवन में करते दिखाई देंगे, तभी प्रवासी पक्षियों का मधुर कलरव गूंजता रहेगा।

