Thursday, March 12, 2026
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सोशल मीडिया पर तैरती फूहड़ता

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डिजिटल युग ने हमारे समाज की संरचना, सोच और अभिव्यक्ति के तरीकों को गहराई से बदल दिया है। आज मोबाइल फोन और इंटरनेट के माध्यम से कोई भी व्यक्ति कुछ ही सेकंड में लाखों लोगों तक पहुंच सकता है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ने अभिव्यक्ति को लोकतांत्रिक बनाया है—जहां पहले मनोरंजन और प्रसिद्धि के अवसर सीमित लोगों तक होते थे, वहीं अब हर व्यक्ति के पास अपनी प्रतिभा दिखाने का मंच है। लेकिन इस नए अवसर के साथ कई नई चुनौतियाँ भी सामने आई हैं। इन चुनौतियों में सबसे बड़ी बहस उस कंटेंट को लेकर है जिसे समाज का एक वर्ग ‘फूहड़’ या ‘अशोभनीय’मानता है। पिछले कुछ वर्षों में सोशल मीडिया पर ऐसे वीडियो तेजी से वायरल होते देखे गए हैं जिनमें डांस, अभिनय या मनोरंजन के नाम पर ऐसे हाव-भाव और प्रस्तुति दिखाई जाती है जिन्हें कई लोग सांस्कृतिक मूल्यों के विरुद्ध मानते हैं। इन वीडियो को लाखों व्यूज, लाइक्स और शेयर मिलते हैं, जिससे वे और अधिक लोगों तक पहुंचते हैं। लोकप्रियता की इस दौड़ में कई बार कंटेंट की गुणवत्ता और सामाजिक जिम्मेदारी पीछे छूट जाती है।

समाज के एक बड़े वर्ग का मानना है कि इस प्रकार के कंटेंट का प्रभाव विशेष रूप से युवाओं और किशोरों पर पड़ता है। जब वे देखते हैं कि कुछ लोग केवल कुछ सेकंड के वीडियो बनाकर अत्यधिक प्रसिद्धि और आर्थिक लाभ प्राप्त कर रहे हैं, तो उनके मन में भी वैसा ही करने की इच्छा पैदा हो सकती है। कई बार यह प्रेरणा रचनात्मक दिशा में जाती है—जैसे संगीत, कला, नृत्य या शिक्षा से जुड़े कंटेंट बनाना। लेकिन कई मामलों में यह प्रेरणा केवल वायरल होने की दौड़ में बदल जाती है, जहां ध्यान आकर्षित करने के लिए किसी भी प्रकार का तरीका अपनाया जाता है। यह भी देखा गया है कि सोशल मीडिया पर ट्रेंड और एल्गोरिद्म का बहुत बड़ा प्रभाव होता है।

जो कंटेंट अधिक देखा और साझा किया जाता है, वही तेजी से फैलता है। ऐसे में यदि दर्शक बार-बार उसी प्रकार के वीडियो देखते हैं जिन्हें वे स्वयं ‘फूहड़’ कहते हैं, तो अनजाने में वे उसी प्रवृत्ति को बढ़ावा भी दे रहे होते हैं। इसलिए केवल कंटेंट बनाने वालों को दोष देना इस समस्या का पूरा समाधान नहीं है। दर्शक भी इस डिजिटल पारिस्थितिकी तंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।

दूसरी ओर, यह तर्क भी सामने आता है कि कला और मनोरंजन की अपनी स्वतंत्रता होती है। नृत्य, अभिनय और अभिव्यक्ति के कई रूप होते हैं, और हर व्यक्ति उन्हें अलग-अलग तरीके से देखता है। जो एक व्यक्ति को अनुचित लगता है, वही दूसरे के लिए केवल मनोरंजन या कला का एक रूप हो सकता है। इसी कारण इस विषय पर समाज में तीखी बहस देखने को मिलती है। कुछ लोग इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हिस्सा मानते हैं, जबकि अन्य इसे सामाजिक और सांस्कृतिक मूल्यों के क्षरण के रूप में देखते हैं।

यहां एक महत्वपूर्ण प्रश्न उठता है—क्या किसी भी प्रकार की लोकप्रियता को सफलता का मानक माना जाना चाहिए? सोशल मीडिया ने प्रसिद्धि प्राप्त करने की प्रक्रिया को बहुत तेज कर दिया है। पहले किसी कलाकार को पहचान पाने में वर्षों लग जाते थे; आज एक वायरल वीडियो किसी को रातों-रात स्टार बना सकता है। लेकिन यह त्वरित प्रसिद्धि कई बार स्थायी नहीं होती और इसके सामाजिक प्रभाव भी जटिल हो सकते हैं। कई युवा इस भ्रम में पड़ सकते हैं कि केवल विवादास्पद या ध्यान आकर्षित करने वाला कंटेंट ही सफलता का रास्ता है। परिणामस्वरूप वे अपनी प्रतिभा को विकसित करने की बजाय तात्कालिक लोकप्रियता के पीछे भागने लगते हैं।

संस्कृति की बात करें तो यह किसी एक व्यक्ति या एक पीढ़ी की देन नहीं होती। संस्कृति सदियों के अनुभव, परंपराओं और सामाजिक मूल्यों से बनती है। इसमें परिवर्तन भी होता रहता है—क्योंकि हर युग अपने साथ नए विचार और नए रूप लेकर आता है। लेकिन परिवर्तन और अतिरेक के बीच संतुलन बनाए रखना भी आवश्यक है। जब मनोरंजन का उद्देश्य केवल सनसनी या ध्यान आकर्षित करना बन जाए, तो समाज में यह चिंता स्वाभाविक है कि कहीं हम अपने मूल्यों से दूर तो नहीं जा रहे। इस संदर्भ में परिवार, शिक्षा और समाज की भूमिका भी महत्वपूर्ण हो जाती है। बच्चों और युवाओं को यह समझाना जरूरी है कि इंटरनेट पर दिखने वाली हर चीज अनुकरण के योग्य नहीं होती। डिजिटल साक्षरता—यानी यह समझ कि आॅनलाइन दुनिया कैसे काम करती है—आज के समय की बड़ी आवश्यकता बन गई है। यदि युवा यह समझ पाएँ कि एल्गोरिद्म कैसे काम करते हैं, व्यूज और लाइक्स कैसे बढ़ते हैं, और किस प्रकार का कंटेंट उन्हें प्रभावित कर सकता है, तो वे अधिक जागरूक निर्णय ले सकेंगे।

कंटेंट क्रिएटर्स की जिम्मेदारी भी कम नहीं है। जो लोग लाखों दर्शकों तक पहुंच रखते हैं, उनके पास समाज को प्रभावित करने की शक्ति भी होती है। यदि वे अपनी लोकप्रियता का उपयोग सकारात्मक संदेश, रचनात्मक कला और प्रेरणादायक सामग्री के लिए करें, तो वही सोशल मीडिया समाज के लिए एक सशक्त मंच बन सकता है। कई उदाहरण ऐसे भी हैं जहां क्रिएटर्स ने शिक्षा, लोक संस्कृति, भाषा और परंपराओं को बढ़ावा देने का काम किया है और लाखों लोगों को प्रभावित किया है। इसलिए समाधान केवल विरोध या बहिष्कार में नहीं, बल्कि संतुलित दृष्टिकोण में है। समाज को यह तय करना होगा कि वह किस प्रकार के कंटेंट को बढ़ावा देना चाहता है।

यदि दर्शक रचनात्मक, ज्ञानवर्धक और सांस्कृतिक रूप से समृद्ध सामग्री को अधिक समर्थन देंगे, तो स्वाभाविक रूप से वही कंटेंट अधिक दिखाई देगा। सोशल मीडिया का एल्गोरिद्म अंतत: दर्शकों की पसंद पर ही निर्भर करता है। इसके साथ ही प्लेटफॉर्म कंपनियों की भी जिम्मेदारी बनती है कि वे ऐसे मानक और नीतियाँ विकसित करें जो समाज के व्यापक हितों का ध्यान रखें। कई प्लेटफॉर्म पहले से ही समुदाय दिशानिर्देश लागू करते हैं, लेकिन उनकी प्रभावशीलता इस बात पर निर्भर करती है कि उन्हें कितनी गंभीरता से लागू किया जाता है।

अंतत: यह समझना जरूरी है कि संस्कृति की रक्षा केवल नारों या हैशटैग से नहीं होती। संस्कृति तब मजबूत होती है जब समाज अपने व्यवहार, चुनाव और प्राथमिकताओं के माध्यम से उसे जीवित रखता है। यदि हम वास्तव में अपनी सांस्कृतिक पहचान को सुरक्षित रखना चाहते हैं, तो हमें सकारात्मक विकल्पों को बढ़ावा देना होगा—चाहे वह लोक कला हो, पारंपरिक संगीत हो, साहित्य हो या आधुनिक लेकिन संवेदनशील और जिम्मेदार मनोरंजन। सोशल मीडिया एक शक्तिशाली माध्यम है। यह समाज को जोड़ भी सकता है और भटका भी सकता है। फर्क केवल इस बात से पड़ता है कि हम इसे किस तरह उपयोग करते हैं। यदि क्रिएटर्स जिम्मेदारी के साथ कंटेंट बनाएं और दर्शक विवेकपूर्ण तरीके से उसे चुनें, तो यही प्लेटफॉर्म संस्कृति के संरक्षण और रचनात्मक अभिव्यक्ति का सबसे बड़ा मंच बन सकता है।

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