
पहले वह अलग-अलग संख्या बताते रहे हैं. कभी वह विमानों की संख्या को 7 तो कभी 8 होने का दावा करते रहे हैं. उन्होंने दोबारा जोर देकर कहा कि उनके हस्तक्षेप सकिस कीमत पर ट्रेड डील?
किसी भी देश के लिए व्यापार समझौते एक सुअवसर तो होते ही हैं साथ ही परीक्षा भी होते हैं। उनका मकसद बराबरी की शर्तों पर पारस्परिक लाभ होता है, न कि एक पक्ष की मजबूरी। भारत ने औपनिवेशिक दौर में इसी असंतुलन के खिलाफ संघर्ष किया था। इसलिए जब भी कोई बड़ा व्यापार समझौता होता है, सवाल सिर्फ निर्यात और आयात का नहीं होता, बल्कि संप्रभुता, खाद्य सुरक्षा और किसानों की आजीविका का भी होता है। हाल में हुए भारत-अमेरिका फ्रेमवर्क समझौते को लेकर यही चिंता उठ रही है। 6 फरवरी 2026 को घोषित प्रारंभिक सहमति में कृषि, ऊर्जा और डिजिटल व्यापार जैसे क्षेत्रों का जिक्र है। विपक्ष और किसान संगठनोंजी का आरोप है कि यह समझौता अमेरिकी कृषि उत्पादों के लिए भारतीय बाजार को ज्यादा खोलता है। सरकार का कहना है कि यह भारत के निर्यात, निवेश और रणनीतिक साझेदारी को मजबूत करेगा। सच शायद इन दोनों दावों के बीच कहीं है, लेकिन कुछ ठोस सवालों की अनदेखी नहीं की जा सकती ।
कृषि बाजार का बराबरी या असमानी मुकाबला?
भारत हर साल लगभग 4.3 करोड़ मीट्रिक टन मक्का पैदा करता है, जबकि अमेरिका का उत्पादन इससे कई गुना अधिक है। यदि ड्यूटी में ढील देकर अमेरिकी प्रोसेस्ड मक्का या डिस्टिलर ग्रेन भारत में आता है, तो घरेलू कीमतों पर दबाव पड़ सकता है। यही स्थिति ज्वार और सोयाबीन के मामले में भी है। भारत में सोयाबीन उत्पादन करीब 1.5 करोड़ टन के आसपास है, जबकि अमेरिका का उत्पादन इससे कई गुना अधिक है। सरकार का तर्क है कि आयात से उपभोक्ताओं को सस्ता माल मिलेगा, खाद्य प्रसंस्करण उद्योग को कच्चा माल सुलभ होगा और निर्यात प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी। वह यह भी कह रही है कि आयात चरणबद्ध और कोटा आधारित होंगे, अचानक बाजार नहीं खोला जाएगा। लेकिन सवाल यह है कि क्या भारतीय किसान, जिन्हें सीमित सब्सिडी और ऊंची लागत का सामना करना पड़ता है, वे अमेरिकी किसानों से मुकाबला कर पाएंगे, जिन्हें भारी सरकारी समर्थन मिलता है?
कपास और वस्त्र उद्योग: अवसर या दोहरी मार?
कपास के मामले में चिंता और गहरी है। भारत दुनिया के बड़े कपास उत्पादकों में है और वस्त्र निर्यात में अग्रणी है। अगर अमेरिका के साथ ऐसी व्यवस्था बनती है कि अमेरिकी कपास से बने वस्त्रों को वहां कम शुल्क पर प्रवेश मिले, तो भारत को भी समान शर्तें चाहिए। वाणिज्य मंत्री का कहना है कि भारत भी अमेरिकी कपास आयात कर, उससे बने उत्पाद निर्यात करेगा और प्रतिस्पर्धी बनेगा। सरकार इसे ह्लरूल आॅफ ओरिजिनह्व की रणनीतिक समझदारी बता रही है। लेकिन इससे दो सवाल उठते हैं। पहला, क्या इससे घरेलू कपास की मांग घटेगी? दूसरा, क्या बांग्लादेश जैसे देशों के साथ हमारे मौजूदा व्यापार समीकरण पर असर पड़ेगा? यदि भारतीय किसान को एमएसपी से कम दाम मिल रहे हैं और उसी समय आयात बढ़ता है, तो यह संतुलन बिगाड़ सकता है। सरकार को स्पष्ट करना चाहिए कि घरेलू कपास उत्पादकों की सुरक्षा के लिए क्या तंत्र रहेगा।
नॉन-टैरिफ बैरियर और सब्सिडी
समझौते में नॉन-टैरिफ बाधाओं की समीक्षा की बात कही गई है। अमेरिका लंबे समय से भारत की कृषि सब्सिडी और कुछ आयात प्रतिबंधों पर आपत्ति जताता रहा है। सरकार का पक्ष है कि भारत विश्व व्यापार संगठन के नियमों के भीतर ही रहेगा और किसानों के हितों से समझौता नहीं होगा। लेकिन वास्तविकता यह है कि अमेरिकी किसान को भारी सब्सिडी मिलती है। भारत में प्रत्यक्ष आय सहायता सीमित है, जबकि लागत लगातार बढ़ी है। ऐसे में यदि सब्सिडी या न्यूनतम समर्थन मूल्य व्यवस्था पर दबाव आता है, तो इसका असर सीधे ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा। सरकार को साफ बताना चाहिए कि क्या किसी सब्सिडी कटौती पर सहमति बनी है या नहीं?
जैविक विविधता और जीएम फसलें
भारत अब तक जीएम फसलों के आयात और खेती को लेकर सतर्क रहा है। यदि प्रोसेस्ड कृषि उत्पादों के जरिए अप्रत्यक्ष रूप से जीएम सामग्री आती है, तो उसके नियमन की व्यवस्था क्या होगी? सरकार का कहना है कि भारत की जैव सुरक्षा प्रणाली कायम रहेगी और कोई भी आयात भारतीय कानूनों के तहत जांचा जाएगा। सवाल है कि अगर भारत में प्रोसेस्ड मक्का, ज्वार, सोयाबीन, फल व अन्य उत्पाद भी आएंगे, तो क्या उनका सीधा प्रभाव भारत की जैविक विविधता और बीज शुद्धता पर नहीं पड़ेगा? इसलिए पारदर्शिता जरूरी है। जनता को यह जानने का अधिकार है कि किन उत्पादों को अनुमति मिलेगी और किस आधार पर।
सरकार का व्यापक तर्क
सरकार इस समझौते को सिर्फ कृषि तक सीमित नहीं देखती। उसका कहना है कि ऊर्जा सहयोग, रक्षा साझेदारी, टेक्नोलॉजी ट्रांसफर और सेवा निर्यात के नए अवसर खुलेंगे। डिजिटल व्यापार में डेटा लोकलाइजेशन पर भारत ने अपने मूल हित सुरक्षित रखे हैं, ऐसा दावा किया जा रहा है। सरकार का यह भी तर्क है कि वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में जगह बनाए रखने के लिए बड़े बाजारों से समझौते जरूरी हैं। यह तर्क पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता। आज की दुनिया में पूर्ण आत्मनिर्भरता व्यावहारिक नहीं है। लेकिन आत्मनिर्भरता का मतलब आत्मसमर्पण भी नहीं होना चाहिए।
बहरहाल बड़ा सवाल है कि क्या यह मोदी सरकार की मजबूती की असली परीक्षा है? क्योंकि सरकार ‘मजबूत’ है या ‘मजबूर’, नारे से आगे बढ़कर तथ्यों पर तय होना चाहिए। अगर समझौते में चरणबद्धता, सुरक्षा क्लॉज, सेफगार्ड ड्यूटी और किसानों के लिए प्रत्यक्ष सुरक्षा तंत्र हैं, तो उन्हें सार्वजनिक किया जाए। अगर नहीं हैं, तो यह गंभीर चिंता का विषय है। व्यापार समझौते कागज पर संतुलित दिख सकते हैं, लेकिन उनका असली असर खेत, मंडी और छोटे उद्योगों में दिखता है।
सरकार का दायित्व है कि वह सिर्फ रणनीतिक साझेदारी की तस्वीर न दिखाए, बल्कि यह भी स्पष्ट करे कि किसान, कपास उत्पादक, फल उगाने वाले और छोटे व्यापारी इस नई व्यवस्था में कैसे सुरक्षित रहेंगे। आखिरकार, किसी भी व्यापार समझौते की सफलता केवल जीडीपी के आंकड़ों से नहीं, बल्कि इस सवाल से मापी जाएगी कि जिसमे देश के अन्नदाता की आय और सम्मान सुरक्षित रह सके। दोनों परमाणु संपन्न देशों के बीच तनाव खत्म हुआ।

