
खानदानी विरासतों के वारिस के रूप में दूसरे पायदान पर खड़े अखिलेश अपने बढ़े वोट प्रतिशत से ‘बम-बम’ हैं और अगले चुनाव में भाजपा को पछाड़ कर अपनी सरकार बनाने की गर्वोक्तियां करते नहीं थक रहे हैं। इसमें कोई संशय नहीं है कि सपा का वोट प्रतिशत लगभग दस प्रतिशत संयुक्त रूप से और भाजपा का अकेले दम पर लगभग दो प्रतिशत बढ़ा है और उसी के आधार पर सपा की सीटों में भी अभिवृद्धि हुई है किन्तु बिना परिश्रम, विरासत में पिता की अनुकंपा से उप्र के मुख्यमंत्री की गद्दी पा गए अखिलेश दो लड़कों की जोड़ी, बुआ-भतीजे की जोड़ी के टोटकों को आजमाने के बावजूद सत्ता के गलियारों से दूर, उप्र की राजनीति के ‘यादव युवराज’ यह भूल गये हैं कि सपा के पक्ष में इस चुनाव के समय बनी राजनैतिक परिस्थितियों से अधिक उनके पक्ष में एक पक्षीय परिस्थितियां शायद कभी न बन पाएं और जिन चोर रास्तों से सपा ने भाजपा के किले में सेंधमारी कर ली थी, वे शायद भाजपा द्वारा बहुत जल्द बंद कर उन्हें लीक प्रूफ बना दिया जाय।
इसमें कोई संशय नहीं है कि अखिलेश इस बार करो या मरो की स्थिति में थे और उनके पक्ष में जितनी आंकड़ों के संदर्भ में परिस्थितियां बनी या बना दी गयीं थीं, उतनी सापेक्ष परिस्थितियाँ, अगर नियति ने ही अखिलेश के भाग्य में राजयोग लिख रखा है । तभी बन पाएंगी अन्यथा निर्वाचन परिस्थितियों का ऐसा उनके पक्ष में स्वर्ण काल बनना निकट भविष्य में तो संभव नहीं लगता है । अपने आप को भी दांव पर लगा कर सपा की राजनीति के सहारे अपना दानापानी चलाने और ऐश लेते हुए दबंगई करने वाला कट्टर सजातीय वोट, भाजपा को हराने के लिए उत्सुक किसी भी दशा में सपा के वोट न कटें के उपक्र म में जी जान से जुटा था तो मायावती बिलकुल निष्क्रि य होकर मैदान से लगभग हट चुकी थीं जिनके अधिकतम वोट को थोड़े से उपक्र म से अपने पक्ष में लाना कोई बड़ा काम नहीं था।
शिव सेना अपने विभिन्न संगठकों के साथ भाजपा के हिन्दू वोट बैंक में सेंधमारी की जुगत भिड़ा रही थी। ममता चटर्जी बंगाली हिन्दू और मुस्लिम वोट को सपा की ओर मोड़ने के लिए बंगाल से आ जा रही थीं। शरद पवार अपना अलग जोर लगा रहे थे। और तो और, भाजपा का बरसों का साथी जेडीयू अपने स्वतंत्र प्रत्याशी खड़ा कर आँखें दिखा रहा था तो इस बार मुस्लिम वोट, उनके अस्तित्व का भय दिखा कर कट्टरपंथी मौलानाओं और मुस्लिम धर्मगुरुओं द्वारा भाजपा को हराने के लिए निर्विवाद रूप से एकजुट किया जा चुका था।
किसान आंदोलन और विभिन्न आंदोलनों के माध्यम से जो चुपके चुपके विभिन्न जातियों को भडकाने के लिए चलाए जा रहे थे, के माध्यम से योगी आदित्य नाथ को ठाकुर जाति का समर्थक सिद्ध करने के प्रयास शीर्ष पर थे । परिस्थितियाँ ऐसी बनती जा रही थीं कि लोगों को लगने लगा था कि विभिन्न हिंदूवादी कार्य करने के बावजूद भाजपा हिन्दू क्षेत्रों में ही पिछड़ती चली जा रही है । सोने पर सुहागा किसान समस्याओं का हवाला देकर अपने चिर शत्रु अल्पसंख्यक वर्ग से जाटों के तथाकथित एक राजनैतिक दल ने समझौता कर सपा का दामन थाम लिया और भाजपा के माथे पर पसीना ला दिया था।
कुल मिला कर भाजपा को ऐसे चक्र व्यूह में घेर लिया गया था जिसे तोड़ना एक बारगी तो असंभव लग ही रहा था । ऐसी परिस्थितियां बना दी गयीं कि भाजपा समर्थक दृृश्य मीडिया भी सपा की संभावित विजय का राग अलापने लगा और भाजपा समर्थक वोट बैंक ऊहापोह के कगार पर पंहुचने लगा, कट्टरपंथी अपने पंख फडफड़ाने लगे और गुंडा तत्व खुले आम धमकियां देने लगे। अपनी प्रतिबद्धताओं के चलते स्वयं को प्रगतिशील और धर्मनिरपेक्ष कहने वाला एक समाचार चैनल और उसका चेहरा बने एक एंकर ने तो भाजपा विरोधी नई से नई बातें परोस कर उप्र की जनता को, विशेषकर योगी के विरूद्ध ऐसा षडयंत्र रचा कि कई और चैनल भी वही राग अलापने लगे। इस दूरगामी अभियान से योगी और मोदी के प्रति प्रतिबद्ध जनता का विश्वास भी डगमगाने लगा था।
ऐसे में भाजपा ने अपने पूरे नेतृत्व को उप्र में उतार दिया और पूरे निर्वाचन को हिन्दू बनाम मुस्लिम पर लाकर हिन्दू वोट को पूर्व की भांति जातीय विभाजन कर, भाजपा को हराने की चिरपरिचित विरोधी नीति को हिन्दुओं के एक बड़े वर्ग की मानसिकता से निकाल कर दरकिनार करवाने में भाजपा सफल रही और अपनी विभिन्न कल्याणकारी योजनाओं के पक्ष में हिन्दू वोट के अधिकांश भाग को तो जातीयता के पंक में फिर से जाने से रोक पाई।
ऐसा नहीं है कि सब कुछ सपा युवराज के पक्ष में ही हुआ है । मोदी और योगी के साथ शीर्ष भाजपा के नेताओं की मेहनत भी रंग लायी है और उसने कई स्थानों पर प्रारंभ से ही बाजी में बराबरी या उसे पलटने का क्र म जारी रखा और अधिकांश हिन्दू वोट को एकजुट रखने में लगी रही । फलस्वरूप जहां मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में सपा ने झाड़ू फेरी, वहीं गोरखपुर की नौ सीटों में से नौ और गोरखपुर कमिश्नरी की सीटों में से सत्ताईस सीटें जीत कर और इसी तरह और कई स्थानों पर भाजपा ने भी सपा के सपनों पर झाड़ू फेरी है।
इस सब कवायद का परिणाम यह हुआ कि भाजपा तो उप्र में सरकार बना रही है और ‘युवराज सपा’ के अधडूबे जहाज से संयुक्त दलों ने छलांग लगाने या उसकी तैयारी का उपक्रम करना शुरू कर दिया है। रालोद के प्रदेश अध्यक्ष विभिन्न आरोप लगाकर पद से इस्तीफा दे चुके हैं। ओमप्रकाश राजभर सर्कस कर रहे हैं कि सौदा तय हुआ और भाजपा अच्छी?
अन्य भी कई दल इसी तरह की कशमकश में हैं?।वे कब तक सपा के युवराज के साथ रहते हैं यह भविष्य के गर्भ में है । चलते चलते एक अनुमान और शायद ‘द कश्मीर फाइल’ निर्वाचन से पहले आ जाती तो भाजपा के नेताओं को इतनी मेहनत नहीं करनी पडती और भाजपा का अपना रिकार्ड भी तोड़ सकने की स्थिति में आ सकने की स्थिति आ सकती थी?
राज सक्सेना


