
रूस ने अपने पड़ोसी देश यूक्रेन पर 23 फरवरी 2०22 को आक्र मण कर दिया। यह युद्ध 37 दिन व्यतीत हो जाने के उपरांत भी यूक्रेन की धरती पर लड़ा जा रहा है जिसका यूक्रेन के साथ-साथ संपूर्ण विश्व पर आर्थिक व राजनीतिक प्रभाव पड़ेगा। इस प्रभाव से भारत भी अछूता नहीं रहेगा। 25 दिसंबर 1991 को रूस के 15 टुकड़े हुए थे। रुस के उन टुकड़ों में यूक्रेन भी एक देश बन गया था। भारत की अर्थव्यवस्था अभी मार्च 2022 को समाप्त दो वर्ष में कोरोना की विभीषिका से ठीक प्रकार से निकली भी नहीं है। भारत को रूस, अमेरिका व चीन के बीच संतुलन बनाने में कठिनाई होगी हालांकि भारत ने स्वयं को इस युद्ध में तटस्थ बने रहने की रीति नीति अपनाई है परंतु भारत पर आर्थिक ज्यादा व राजनीतिक भी थोड़े बहुत प्रभाव पड़ेगा ही।
रूस ने यूक्रेन पर एकदम से आक्र मण नहीं किया। कुछ वर्षों से दोनों देशों के बीच तनातनी चली आ रही थी। रूस ने यूक्रेन की सीमा पर एक लाख से अधिक सैनिक तैनात किए हुए थे। मौजूदा तनाव व टकराव वर्ष 2013 में बन गया था जब यूक्रेन में तत्कालीन राष्ट्रपति विक्टर यानुकोविच ने यूरोपीय यूनियन से चल रही महत्वपूर्ण राजनीतिक व व्यवसायिक डील रोक दी थी जिसके विरोध में यूक्रेन में हिंसक प्रदर्शन भी हुए थे। मार्च 2014 में रूस ने क्रीमीआ पर नियंत्रण कर लिया तथा कुछ समय बाद ही रूस ने यूक्रेन के आंशिक क्षेत्र डोनत्सक तथा लुहांस्क को स्वतंत्र देश घोषित कर दिया। इन दोनों क्षेत्रों में रूस समर्थकों की सं?या अधिक थी जिससे टकराव और बढ़ गया।
मार्च 2014 से अब तक तीन हजार के लगभग नागरिकों की मौत हो चुकी है। हथियार, प्रशिक्षण एवं सैन्य के रूप में यूक्रेन को नाटो से मिलने वाले सहयोग को रूस अपने लिए बड़ा खतरा मानता है। रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन चाहते हैं कि यूक्रेन यह गारंटी दे कि वह नाटो का सदस्य नहीं बनेगा और नाटो रूस की तरफ अपना विस्तार नहीं करेगा। पुतिन नहीं चाहते कि यूक्रेन में नाटो का मिसाइल सिस्टम तैनात नहीं किया जाए। रुस पड़ोस में दुश्मन नहीं चाहता तथा अमेरिका नाटो व यूक्रेन के मामलों में अपना दृृष्टिकोण बदलें जिससे रूस की सुरक्षा को कोई खतरा उत्पन्न नहीं हो सके।
यूक्रेन का मानना है कि यदि वह नाटो के साथ संबंध बढ़ाता है तो इसमें रूस को हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए। नाटो से जुड़ने अथवा नहीं जुड़ने यह उसके अधिकार क्षेत्र में हैं। यूक्रेन को नाटो का सदस्य न बनने की गारंटी पूरी तरह से अवैधानिक है। यूक्रेन का मानना है कि रूस यूक्रेन में अस्थिरता उत्पन्न करना चाहता है। यूक्रेन ऊर्जा संकट के साथ साथ अनेक घरेलू राजनीतिक संकट से जूझ रहा है। नाटो का मानना है कि यूक्रेन के पास नाटो का सदस्य बनने का विकल्प हर समय खुला हुआ है। नाटो रुस पर आर्थिक, वित्तीय व राजनीतिक प्रतिबंध लगा सकता है।
यूक्रेन संकट का भारत पर प्रभाव
क्रूड तेल के उत्पादन में रूस की हिस्सेदारी 13 प्रतिशत है। यह ओपेक के कुल उत्पादन का 50 प्रतिशत है। पश्चिमी यूरोप के देश प्राकृतिक गैस के लिए रूस पर बहुत कुछ निर्भर है यदि यह आपूर्ति बाधित होती है तो तेल के मूल्य बढ़ने से वैश्विक स्तर पर महंगाई भी बढ़ेगी जिससे भारत में पेट्रोल व डीजल के दाम भी बढ़ेंगे जिससे भारत में महंगाई भी बढ़ सकती है। भारत के सैन्य उत्पादन के आयात में रूस की बड़ी भागिता है। भारत को रूस के अलावा दूसरा विकल्प भी सोचना व खोजना पड़ेगा।
सोवियत संघ के विघटन से पूर्व अर्थात 25 दिसंबर 1991 से पूर्व भारत के निर्यात में रुस की हिस्सेदारी 1० प्रतिशत थी जो विघटन के उपरान्त एक प्रतिशत ही रह गई। आयात में भी रूस की हिस्सेदारी 1.4० प्रतिशत है। रूस के आक्र मण का भारत के विदेश व्यापार पर ज्यादा प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा। प्रभाव उन कोशिशों पर पड़ेगा जो भारत रूस को अधिक उत्पादन निर्यात करने के लिए कर रहा है। भारत के हथियार आयात में रूस का हिस्सा 49 प्रतिशत है। रूस के हथियार निर्यात में भारत की हिस्सेदारी 23 प्रतिशत है।
वैश्वीकरण के मजबूत जाल में विश्व के देश अब किसी भी देश में जरा सी प्रतिकूल स्थिति से अछूते नहीं रहते भले ही उनके बीच द्विपक्षी संबंध बहुत गहरे न हो। भारत सरकार खाद्य तेल से लेकर खाद तक के कारोबार का मूल्यांकन कर रही है। भारत सरकार कृषि उत्पादन और फार्मा के निर्यात पर पड वाले प्रभाव को लेकर चिंतित है तथा संकट के कारण निर्यातकों के भुगतान को लेकर होने वाली परेशानियों का भी मूल्यांकन किया जा रहा है। भारत की वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के अनुसार सरकार उन वस्तुओं को लेकर चिंतित है जिनकी आपूर्ति यूक्रेन से होती है।
खाद्य तेल की आपूर्ति पर विपरीत प्रभाव पड़ेगा। कृषि निर्यात के लिए भी कठिनाई उत्पन्न हो रही है। भारत को सूरजमुखी तेल के आयात में 74 प्रतिशत हिस्सेदारी यूक्रेन की है जिसकी आपूर्ति बाधित हो चुकी है। इसका प्रभाव पाम आयल के आयात पर पड़ेगा जिससे देश में खाद्य तेल की कीमतें भविष्य में बढ़ सकती है। भारत से फार्मा के निर्यात पर भी असर पड़ेगा।
भारत रूस को 200 करोड़ डॉलर अर्थात लगभग 15,000 करोड़ रुपए का निर्यात करता है। यूक्रेन को 50 करोड़ डॉलर अर्थात लगभग 3,750 करोड रुपए का ही निर्यात करता है। कच्चे तेल की कीमतें बढ़ेंगी क्योंकि वैश्विक रूप से नकारात्मक माहौल बन रहा है। भारत का वार्षिक तेल आयात 7.2 लाख करोड़ रुपये से बढ़ कर 9.5० लाख करोड़ रुपये का हो चुका है जो देश के कुल आयात का 20 प्रतिशत है। भारत का भुगतान संतुलन गड़बड़ा जाएगा। भारत में विदेशी मुद्रा का एक मजबूत भंडार है। परन्तु फिर भी विदेश व्यापार पर अनिश्चितता के बादल छा गये है।
अमेरिका यूक्रेन को नाटो का सदस्य बनाने को तैयार है तथा उसको सैन्य सामग्री प्रदान कर रहा है। अमेरिका अपने हितों को लेकर विश्व व्यवस्था के लिए चीन के आक्र ामक उभार को लेकर चिंतित है। वह रूस को घेरने में लगा हुआ है। वह इससे यूक्रेन संकट को और उलझा रहा है तथा रुस को चीन के पाले में धकेलने का काम कर रहा है। अमेरिका को चीन पर लगाम लगाने पर ध्यान देना चाहिए परंतु वह रूस के रूप में उसे एक सहयोगी उपलब्ध करा रहा है।
रूस को यूक्रेन में अलगाववाद को पनपाना नहीं चाहिए। इस प्रतिकूल प्रभाव का विश्व के अनेक हिस्सों पर भी पड़ेगा। रूस यूक्रेन के मामले में भारत किसी पाले में नहीं खड़ा है। वह संकट को सुलझाने में तटस्थ रहकर सहयोग दे रहा है। भारत को भी संकट से सीख लेते हुए ऊर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनने के समस्त उपाय करने चाहिए क्योंकि ऊर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता से ही भारत के 10 लाख करोड़ रुपए वार्षिक की रकम स्वच्छ ऊर्जा के विकास पर लगेगी जिससे भारत में रोजगार के अवसर बढ़ सकेंगे तथा अर्थव्यवस्था में भी सुधार हो सकेगा तथा देश का बजट तेल की कीमतों का बंधक नहीं बन सकेगा। भारत में महंगाई बढ़ने से राजनीतिक संकट गहरा हो सकता है।
यह युद्ध तभी बंद हो सकता है जब यूक्रेन इस बात की गारंटी देगा कि वह नाटो का सदस्य नहीं बनेगा तथा अमेरिका रूस की सीमाओं के पास से अपने सैनिक और हथियार वापस बुला लेगा। रूस ने युद्ध से पूर्व लिखित प्रस्ताव भी दिया था परंतु कोई सार्थक जवाब उसको नहीं मिला था। रुस व यूक्रेन को बातचीत की मेज पर आना चाहिए क्योंकि युद्ध किसी भी समस्या का समाधान नहीं होता है। युद्ध के दुष्परिणामों का दुर्ष्प्रभाव दोनों देशों की जनता के साथ साथ संपूर्ण विश्व के लोगों को भी भुगतना पड़ता है।
डा. सूर्य प्रकाश अग्रवाल


