- राजस्व अभिलेखों में गैर आबाद के रूप में कायम है जिले के 65 गांवों का अस्तित्व
जनवाणी संवाददाता |
मेरठ: करीब पांच हजार साल पहले हस्तिनापुर के सिंहासन को लेकर जिन कौरवों-पांडवों के बीच महाभारत के रूप में सबसे बड़ा युद्ध हुआ, उनके नाम पर बसे गांव कौरवान-पांडवान की आबादी भले ही शून्य हो, लेकिन राजस्व अभिलेखों में ये नाम आज भी चले आ रहे हैं।
जनगणना-2021 के लिए पूर्व में दो बार तैयारियां हो चुकी हैं, लेकिन कोरोना महामारी के कारण इन्हें टाल दिया गया था। कुछ माह पहले जिला स्तर से मांगी गई एक रिपोर्ट में मेरठ जनपद के गांवों समेत विभिन्न बिंदुओं पर एक रिपोर्ट तैयार करके मुख्यालय को प्रेषित की गई है।
जिसके आधार पर ऐसा अनुमान लगाया जा रहा है कि जनगणना का कार्य मार्च-2023 तक शुरू हो सकता है। हालांकि इसके बारे में अभी तक कोई स्पष्ट गाइड लाइन जारी नहीं की गई है। इसके बावजूद अधिकारियों के स्तर से तैयारियों का सिलसिला जारी है।
बहरहाल, बात यहां बात करते हैं मेरठ जनपद के गांवों की। जनपद में 479 ग्राम पंचायतें हैं, जबकि राजस्व ग्रामों की संख्या 658 है। ये अंतर इसलिए आता है, क्योंकि राजस्व अभिलेखों में एक बार दर्ज होने के बाद गांव की आबादी भले ही शून्य हो जाए, लेकिन उसका नाम हमेशा जिंदा रहता है।
अब सवाल यह उठता है कि ये गांव आबादी के मामले में शून्य कैसे हो जाते हैं। इसका जवाब अधिकारी देते हुए बताते हैं कि अधिकतर मामलों में ऐसे गांव या तो शहरों का हिस्सा बन जाते हैं, या गांव की जनसंख्या अधिक होने के बाद उन्हें नगर निकाय का दर्जा मिल जाता है।
मेरठ जनपद में हर्रा, खिवाई और शाहजहांपुर इसके ताजा उदाहरण हैं। जिन्हें बीते वर्षों में ग्राम पंचायत से नगर पंचायत बनाया गया है। इस तरह तकनीकी रूप से भले ही गांवों का नाम अब शहरों की सूची में आ चुका है, लेकिन राजस्व गांव की सूची में इनका अस्तित्व हमेशा बना रहता है। ग्राम पंचायत और राजस्व ग्राम के इस अंतर के बीच इनकी संख्या में भी अंतर आ जाता है।
जैसा कि मेरठ जनपद के मामले में देखा जा सकता है कि यहां ग्राम पंचायतों की संख्या 479 और राजस्व गांवों की संख्या 658 है। इस अंतर को स्पष्ट करने के लिए एक सूची और बनती है, जिसे गैरआबाद गांव कहा जाता है। ऐसे नामों को सूची में रखने का एक प्रमुख कारण भूमि संबंधी अभिलेखों का रखरखाव करने की परम्परा है, जिसमें खसरा-खतौनी आदि के लिए राजस्व गांवों का रिकार्ड ही खंगाला जाता है।
वह भले ही आबाद की श्रेणी में हो, या उसे गैरआबाद की सूची में शामिल किया गया हो। मेरठ जनपद में ऐसे ही गैरआबाद गांवों की संख्या 65 है। जिनमें महाभारत काल को यााद दिलाने वाले कौरवान और पांडवान गांव के नाम भी शामिल हैं। दरअसल, जिस समय हस्तिनापुर को नगर पंचायत का दर्जा दिया गया,
उसके बाद से इन दोनों गांवों को गैरआबाद सूची में डाल दिया गया है। अब स्थिति यह है कि मौजूदा पीढ़ी भले ही हस्तिनापुर को एक विकसित पर्यटन स्थल के रूप में जानने लगी है, लेकिन जब-जब राजस्व ग्राम का रिकार्ड खंगाला जाएगा, उसमें दो गांवों के नाम कौरवों और पांडवों के नाम पर कौरवान-पांडवान भी गैरआबाद होने के बावजूद अपना अस्तित्व बरकरार रखते हुए नजर आ जाएंगे।

