Wednesday, April 22, 2026
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चार्जिंग पॉइंट की खोज में भटकतीं आत्माएं

आज की पीढ़ी के लिए ‘पंचतत्व’ की परिभाषा बदल गई है। अब शरीर अग्नि, जल, वायु, पृथ्वी और आकाश से नहीं, बल्कि डेटा, वाई-फाई, सिग्नल, नोटिफिकेशन और 100 प्रतिशत बैटरी से बनता है। यदि इनमें से एक भी तत्व कम हो जाए, तो आधुनिक मानव का अस्तित्व खतरे में पड़ जाता है। इस डिजिटल युग में ‘मोक्ष’ का मार्ग किसी मंदिर से नहीं, बल्कि कैफे की उस अंधेरी नुक्कड़ वाली मेज से होकर गुजरता है, जहाँ एक बिजली का सॉकेट लगा हो। यह सॉकेट ही आज का ‘कल्पवृक्ष’ है, जिसके नीचे बैठकर जेन-जी अपनी अधूरी इच्छाएं (रील्स और स्ट्रीक्स) पूरी करता है।

जैसे ही फोन की बैटरी 20 प्रतिशत पर पहुंचती है, युवा के माथे पर चिंता की लकीरें उभरने लगती हैं। 10 प्रतिशत पर आते-आते वह बेचैन होकर टहलने लगता है, जैसे अस्पताल के बाहर कोई पिता अपने बच्चे के जन्म की प्रतीक्षा कर रहा हो। और जैसे ही वह जादुई 1 प्रतिशत का आंकड़ा आता है, उसके हाथ-पांव ऐसे फूल जाते हैं मानो किसी ने आॅक्सीजन की नली काट दी हो। उसके लिए वह लाल रंग का छोटा सा निशान ‘खतरे का निशान’ नहीं, बल्कि ‘प्रलय का बिगुल’ है। उसे लगता है कि अगर इस क्षण चार्जर न मिला, तो उसका पूरा डिजिटल साम्राज्य ताश के पत्तों की तरह ढह जाएगा।

त्रासदी तब और गहरी हो जाती है जब चार्जर तो मिल जाता है, पर ‘बेवफा केबल’ धोखा दे जाती है। यह केबल भी किसी जिद्दी बच्चे की तरह होती है, जिसे जब तक एक खास तिरछे कोण पर न रखा जाए, वह ऊर्जा प्रवाहित नहीं करती। अब हमारा आधुनिक योद्धा एक ‘इंजीनियर’ बन जाता है। वह केबल को कभी बाएं मोड़ता है, कभी दाएं, और कभी उसे रबर बैंड से बांधकर सहारा देता है। अंतत: जब वह 37.5 डिग्री के उस गुप्त कोण को पा लेता है, जहां से चार्जिंग शुरू होती है, तब वह अपनी सांसें रोक लेता है। उसे डर है कि यदि उसने जोर से छींक भी दिया, तो केबल का ‘ईमान’ डोल जाएगा और 1 प्रतिशत की वह आखिरी सांस भी टूट जाएगी।

जब फोन 2 प्रतिशत पर पहुंचता है, तो युवा के चेहरे पर वह शांति और चमक आती है जो बुद्ध के चेहरे पर बोधिवृक्ष के नीचे आई होगी। यह 2 प्रतिशत उसे जीवन का नया दान देता है। वह गहरी सांस लेता है, उसकी हृदय गति सामान्य होती है और वह वापस अपनी काल्पनिक दुनिया में लौट जाता है। उसे अब इस बात की परवाह नहीं कि बाहर तूफान आ रहा है या घर में मेहमान आए हैं, उसे बस इस बात का सुकून है कि उसके हाथ में मौजूद ‘काले शीशे का टुकड़ा’ जीवित है। यह 1 प्रतिशत का संघर्ष उसे सिखाता है कि जीवन में सबसे कीमती चीज हवा या पानी नहीं, बल्कि बिजली का एक छोटा सा स्पार्क है।

सोचिए, अगर किसी दिन दुनिया की सारी बिजली गुल हो जाए और सारे चार्जर बेकार हो जाएं, तो क्या होगा? शायद तब यह पीढ़ी पहली बार एक-दूसरे की आंखों में देखेगी। शायद तब उन्हें पता चलेगा कि आसमान का रंग नीला होता है, ‘फिल्टर’ वाला नीला नहीं।

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