
नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री बनते वक़्त अपनी ‘विनम्र’ शुरूआत सेवक के रूप में की थी। तब तो वे प्रधान सेवक का दर्जा भी लेने को तैयार नहीं थे यह भी उन्हें उनके भक्तों ने दिया था। इसके बाद 2019 का चुनाव आते आते वे चौकीदार हो गए और 2024 का चुनाव पूरा होने से पहले ही वे प्राणी जगत के सारे मानकों और जैविक नियमों से ऊपर उठकर अलौकिक, अयोनिज, असाधारण, असंभव और अनंतिम अवस्था ईश्वरत्व को प्राप्त हो गए। ऐसा नहीं है कि इससे पहले उन्हें भगवान का दर्जा नहीं दिया गया, कई बार दिया गया-मगर अब तक यह काम संबित पात्रा, कंगना राणावत, केंद्र और प्रदेशों की भाजपा सरकारों के छुटके मंत्री, भाजपा के बटुक प्रवक्ता किया करते थे-इस बार खास यह है कि यह एलान मोदी जी ने स्वयं किया है। चुनाव अभियान के चौथे चरण के बाद अचानक से उन्होंने प्रायोजित मीडिया साक्षात्कारों की जो झड़ी सी लगा दी थी जिन 80 से ज्यादा इंटरव्यूज में उन्होंने कई चौंकाने वाले, ज्यादातर हंसाने वाले रहस्योदघाटन किए थे ऐसे ही एक इंटरव्यू में उन्होंने दावा किया कि ‘पहले जब तक मां जिंदा थीं तो मुझे लगता था कि शायद बायोलॉजिकली मुझे जन्म दिया गया है। मां के जाने के बाद इन सारे अनुभवों को मैं जोड़ करके देखता हूं तो मैं कन्विंस हो चुका हूं, गलत हो सकता हूं, लेफ्टिस्ट लोग तो मेरी धज्जियां उड़ा ही देंगे, मेरे बाल नोंच देंगे, मगर मैं कन्विंस हो चुका हूं कि परमात्मा ने मुझे भेजा है।‘
यूं तो वे जबसे भारतीय राजनीति के क्षितिज पर आएं हैं तबसे ही पूरी पूर्व-तैयारी के साथ मोदी-मोदी करवाना और इन दिनों खुद ही मोदी-मोदी करने का आत्ममुग्धता का ‘आसमां पे है खुदा और जमीं पे हम’ का भाव उनकी खास पहचान रहा है, मगर इस बार इन्होने जो फेंका वह खुद मोदी स्टैण्डर्ड से भी कुछ ज्यादा ही दूर तक फेंका गया दावा है। इतना बेढब और विचित्र कि जिन वामपंथियों से धज्जियां उड़ने और बाल नोचे जाने, पागल समझे जाने का उन्हें डर था उनने तो कोई खास तवज्जो नहीं दी, ज्यादातर तो उनके स्वास्थ्य की चिंता करते ही दिखाई दिए। मगर दिलचस्प यह था कि उनका अपना जी-हुजूरिया मीडिया तक झेंपा-झेंपा सा दिखा और इन अतरंगी दावों की आलोचना में कथित शब्द जोड़कर इसकी हास्यास्पदता को ढांपने की कोशिश की।
वैसे खुद के भगवान होने का दावा करने वाले वे पहले व्यक्ति नहीं है। पृथ्वी पर ऐसी कई महान विभूतियां हुई हैं, जिन्होंने खुद के ईश्वर और गॉड होने का ऐलान किया, कुछ अभी भी हैं। खुद भारत में भी ऐसे अनेक हुए हैं। जरा सी फुर्सत मिले तो इनकी एक भरीपूरी सूची तैयार की जा सकती है। यह अलग बात है कि इनमें से ज्यादातर ‘भगवान’ विवादों में, आपराधिक मामलों में लिप्त पाए गए, उन पर आपराधिक प्रकरण चले, कुछेक तो अभी भी अलग-अलग जेलों की शोभा बढ़ा रहे हैं। सत्ता की राजनीति में भी ऐसे-ऐसों की भरमार रही जिनके बारे में दक्षिण एशिया के महान शायरों में से एक हबीब जालिब साहब ने दर्ज भी किया कि ‘तुम से पहले वो जो इक शख़्स यहां तख़्त-नशीं था/उसको भी अपने खुदा होने पे इतना ही यकीं था!’ हालांकि जालिब साहब यह बात व्यंजना में कह रहे थे, यह तो उन्होंने भी नहीं सोचा होगा कि उनका उपालम्भ एक दिन उन्हीं के पड़ोस में संज्ञा के रूप में सशरीर हाजिर-नाजिर हो जाएगा।
जिस सनातन को मोदी मानते हैं और जिस ऋग्वेद को उसका प्राचीनतम ग्रन्थ कहते हैं उसके जितने भी वरिष्ठ भगवान हैं वे अब आवागमन नहीं करते। उनमें से उस जमाने में जो पांचवें नम्बर पर आते थे उन विष्णु पर ही बार-बार अवतरित होने की जिम्मेदारी आन पड़ी है। वैसे दावा तो उनके 24 अवतारों का है जिनमें से 23 हो चुके हैं, किन्तु भगवद्गीता में सिर्फ 10 बार अवतरित होने का प्रावधान है। इनमें से अभी तक 9 बार वे मत्स्य, कच्छप, वराह, नृसिंह, वामन, परशुराम, राम, कृष्ण और बुद्ध के रूप में आ चुके हैं, शेष सिर्फ एक आखिरी कल्कि अवतार बचा है। इस लिहाज से यदि मोदी कल्कि होने का दावा करते तो कहीं अधिक धर्मसम्मत और सनातनी लगते, मगर उन्होंने तो धार्मिकता की पूरी समझ को ही जम्बूद्वीपे भारतखंडे से उठाकर यरुशेलम पहुंचा दिया। खैर, जब सनातनियों को ही कोई उज्र नहीं है, वे इसमें खुश हैं तो हमें तू कौन मैं खामखां बनने की क्या पड़ी है।
यह आस्तिक हिंदू समुदाय के धार्मिक विश्वासों का दोहन कर इस बहाने उनके वोटों के दूध से अपनी बाल्टी लबालब भरने की कोशिश है। यह ऐसा अकारथ है जिसका भारत के संविधान में साफ-साफ निषेध किया गया है। यह धर्म का शुद्ध राजनीतिक प्रयोजन से किया गया ऐसा अपवित्र इस्तेमाल है जो राजनीति और धर्म दोनों को विषाक्त बनाता है। यह मोदी की पार्टी भाजपा के निदेशक, नियंत्रक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का अपनी तरह का हिन्दू पद्पादशाही वाला भारत बनाने का नक्शा है; एक ऐसा भारत जो भारत के 5-7 हजार साल के इतिहास में आज तक कभी अस्तित्व में नहीं रहा।
जिन गांधी की दुनिया भर में पहचान कराने का श्रेय एक फिल्म को देते हुए एक इंटरव्यू में मोदी अफसोस जता रहे थे और इस तरह अब उनके व्यक्तित्व को दुनिया जहान में ले जाने का बीड़ा सा उठा रहे थे वे गांधी जीवन भर पक्के सनातनी हिंदू रहे। इसी कुनबे के गोडसे की गोलियां खाने के बाद भी हे राम बोलकर गए मगर अत्यंत धार्मिक होने के बावजूद धर्म के नाम पर राजनीति करने और धर्म के आधार पर राष्ट्र बनाने के खिलाफ रहे। उन्होंने बार-बार कहा कि ‘यदि किसी देश में सारे के सारे नागरिक भी एक ही धर्म को मानने वाले हों तब भी धर्म के आधार पर राष्ट्र नहीं बनाया जा सकता।’ उन्होंने तो यहां तक कहा कि ‘यदि मैं कभी डिक्टेटर बना तो धर्म का राजनीति के लिए इस्तेमाल पूरी तरह से प्रतिबंधित कर दूंगा।‘ अपने इस विश्वास की कीमत भी उन्होंने चुकाई।
विवेकानंद, जिनके चरणों के आगे बैठकर मोदी ने हाल के दौर का सबसे विद्रूप कर्मकांड किया है, वे इस मुद्दे पर और भी ज्यादा बेबाक थे। जिस भाषण के लिए उन्हें ज्यादा याद किया जाता है, 11 सितम्बर 1893 को शिकागो की धर्मसंसद में दिए अपने उस भाषण में उन्होंने कहा था कि ‘सांप्रदायिकता, हठधर्मिता और उनकी वीभत्स वंशधर धर्मान्धता इस सुन्दर पृथ्वी पर बहुत समय तक राज्य कर चुकी है। पृथ्वी को हिंसा से भरती रही है। उसको बार-बार मानवता के रक्त से नहलाती रही है। सभ्यताओं को ध्वस्त करती रही है। पूरे-पूरे देशों को निराशा के गर्त में डालती रही है। ये नहीं होते तो मानव समाज आज की अवस्था से कहीं उन्नत हो गया होता।’
जिनकी प्रतिमा के सामने 10 कैमरों से लाइव ध्यान लगाकर मोदी पोंगापथ को मानप्रतिष्ठा देने और राजनीति में धर्म की सेंध लगाने की कोशिश कर रहे थे वे विवेकानन्द ही कह गए हैं कि; ‘वह देश जहां करोड़ों व्यक्ति महुआ के पौधे के फूल पर जीवित रहते हैं, और जहां दस लाख से ज्यादा साधू और कोई दस करोड़ ब्राह्मण हैं जो गरीबों का खून चूसते हैं। वह देश है या नर्क? वह धर्म है या शैतान का नृत्य?’


