Saturday, March 28, 2026
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किसके लिए कब क्या निषेध है ?

Sehat


आनंद कुमार अनंत |

स्वस्थ रहने के लिए जीवन में अनेक ऐसी वस्तुएं होती हैं जिनका निषेध (छोड़ देना) करना होता है। पथ्य-परहेज के लिहाज से भी अनेक वस्तुओं का त्याग करना होता है अन्यथा स्वस्थ होने के लिए ली जाने वाली औषधियां अपना प्रभाव नहीं दिखा पाती। इसी प्रकार की कुछ निषेधात्मक वस्तुओं का विवरण यहां प्रस्तुत किया जा रहा है जिन्हें छोड़कर स्वस्थ रहा जा सकता है तथा बीमारी की अवस्था में शीघ्र लाभ पाया जा सकता है।

स्नान निषेध
भोजन करने के तुरंत बाद, व्यायाम एवं रतिक्रिया के तुरंत बाद, कंद, मूल, फल, शर्बत, औषधि सेवन के तुरंत बाद स्नान करना वर्जित होता है। इससे कुछ ऐसी प्रतिक्रिया शरीर में होती है जिससे कई रोगों की उत्पत्ति होती है। ठंडी प्रकृति वाले व्यक्तियों को खुली ठंडी हवा में स्नान नहीं करना चाहिए। इसी तरह कफ प्रकृति वालों को भी अधिक स्नान न करने का परामर्श दिया जाता है। अतिसार के रोगी, नजले के मरीज, छोटे बच्चे, बूढ़े और ज्वरग्रस्त व्यक्ति अगर ठंडे पानी से स्नान करते हैं तो उन्हें हानि पहुंचती है। ऋतुस्राव की समाप्ति के बाद गरम जल से स्नान करने से वासना पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।

तेल मालिश निषेध
यूं तो तेल मालिश करने से अंगों को पुष्टता प्राप्त होती है किंतु कुछ खास परिस्थितियों में उसे वर्जित माना गया है। तेल मालिश को निषेध करते हुए आयुर्वेद विशेषज्ञों ने कहा कि नवीन ज्वर से आक्रांत, अजीर्ण के रोगी, वमन विरेचन से त्रस्त व्यक्ति, अतिसार के रोगी, एनिमा लेने वाले, कोष्ठबद्धता के रोगी को तेल मालिश नहीं करनी चाहिए। अगर इन स्थितियों में मालिश की जाती है तो उसका प्रभाव उल्टा होता है। ऐसे रोगियों के द्वारा तेल मालिश करने से प्राप्त होने वाली पुष्टि और शक्ति शरीर को न मिलकर उन्हीं विकारों को मिलती है, जिसके कारण वे और प्रबल हो जाते हैं। इसी प्रकार गर्भावस्था में गर्भिणी के पेट की मालिश एवं मासिक के दौरान स्तनों की मालिश वर्जित समझी जाती है।

व्यायाम निषेध
व्यायाम शरीर के लिए अति लाभकारी होता है परंतु कुछ परिस्थितियों में व्यायाम करना निषेध माना जाता है। रक्त पित्त के रोगी, शोथ (सूजन) से पीड़ित, श्वास रोग से ग्रस्त, खांसी और हृदय रोगियों को कसरत नहीं करनी चाहिए। उनके लिए प्रात: सायं खुली हवा में टहलना ही लाभकारी व्यायाम है। स्त्री संग से क्षीण, भयग्रस्त, मूर्छा और उन्माद के रोगी को भी व्यायाम करना हानिकारक है। अत्यधिक व्यायाम, जो अपनी सहनशक्ति से अधिक किया जाता है, वह भी प्राणघातक रोग पैदा कर सकता है। भ्रम, थकान, खांसी, हृदय रोग, अरूचि, रक्त-पित्त, क्षय, ज्वर और दमा आदि के रोगियों को भी व्यायाम नहीं करना चाहिए।

रसाहार निषेध
फलों के रसों का आहार स्वास्थ्य के लिए अति उत्तम माना जाता है किंतु डिब्बों या बोतलों में पैक रसों का आहार अनुपयोगी माना जाता है। डिब्बाबंद रसों में सामान्यत: बेन्जोइक एसिड, सल्फयुरिक एसिड अथवा सॉर्बिक एसिड का उपयोग होता है। ये सभी रसायन स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होते हैं। फलों का रस निकालकर संग्रह करने के लिए जो प्रक्रियाएं की जाती हैं, उनमें गर्मी द्वारा होने वाली प्रक्रि या प्रमुख है, जिससे रस के अधिकांश तत्व नष्ट हो जाते हैं। डिब्बों में पैक किए हुए रसों का सेवन करने से उनमें समाविष्ट रसायनों के कारण आंतों का उपदंश (अल्सर), मूत्रपिण्ड के रोग, दांतों की सड़न, कैंसर, मधुमेह, यौन दुर्बलता आदि रोग होने की संभावना बढ़ जाती है।

दातुन निषेध
यूं तो दातुन करना स्वस्थ व्यक्ति के लिए व्यायाम करने जैसा लाभ पहुंचता है किंतु मुख गला, ताल, होंठ, जीभ, दांत के किसी रोग, पीड़ा या घाव आदि होने की परिस्थितियों में दातुन नहीं करनी चाहिए। ऐसे व्यक्ति को चाहिए कि वह किसी मंजन द्वारा ही मुख को शुद्ध कर ले। मुख कैंसर के रोगियों को ठोस दातुनों का प्रयोग कतई नहीं करना चाहिए।

वात रोग में निषेध
वात रोगियों के लिए रात्रि जागरण, चिंता करना, मल-मूत्र आदि वेगों को रोकना, वमन, मेहनत करना आदि वर्जित होता है। चना, मटर के बने पदार्थ, मोटे चावल, तालाब व नदी का जल, जामुन, कसेरू, कमलगट्टे सेम, शहद, कडुएं एवं चटपटे पदार्थ, हाथी-घोड़े की सवारी करना अपथ्य माना जाता है। दही, चावल, मैदा से बने गरिष्ठ पदार्थ, स्नान, व्यायाम आदि को वर्जित कर देना चाहिए।

सूर्य की रोशनी निषेध
सूर्य की रोशनी स्वास्थ्य के लिए अत्यंत ही लाभदायक होती है किंतु चर्म रोग, कुष्ठरोग, जुरापित्ती रोग आदि में सूर्य की तेज रोशनी कष्टकारी हुआ करती है। अधिक तीव्र रोशनी में अधिक समय तक रहने से शरीर की आर्द्रता समाप्त हो जाती है तथा यौन दुर्बलता उत्पन्न हो जाती है। सूर्य की तीव्र रोशनी गोरेपन को नष्ट कर देती है।


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