
जश्ने आजादी की पूर्व संध्या पर जब तगड़ी बरसात हो रही थी, दक्षिण दिल्ली के कालकाजी में 50 साल का एक व्यक्ति नीम के पेड़ की आस में इस इरादे से आया कि वह भीगने से बच पाएगा, लेकिन 20 साल से अधिक पुराना पेड़ जड़ से उखड़ गया और उस पर और उसकी बेटी पर गिर गया। इससे व्यक्ति की मौत हो गई, जबकि उसकी बेटी अस्पताल में जीवन के लिए संघर्ष कर रही है। यह घटना सीसीटीवी में कैद हो गई, जिसमें फुटपाथ से कुछ इंच की दूरी पर स्थित विशाल पेड़ को सड़क से उखड़कर अनजान यात्रियों पर गिरते हुए देखा जा सकता है। पेड़ कुछ वाहनों पर गिर गया, जिसमें एक मोटरसाइकिल भी शामिल थी, जिस पर वह व्यक्ति और उसकी बेटी सवार थे। स्थानीय लोग बताते हैं कि लगातार हो रही बारिश के कारण पेड़ के आसपास की मिट्टी बह गई थी, इस वजह से पेड़ गिर गया।
हर बार की तरह दिल्ली नगर निगम ने कमजोर पेड़ों की पहचान, छंटाई की बात दोहरा दी है, लेकिन कभी इस पर कोई विधिवत अध्ययन नहीं कर रहा कि दिल्ली और उससे सटे भीड़ भरे नगरों में थोड़ी सी बरसात के बाद डिवाइडर या फुटपाथ पर लगे पेड़ जमीन क्यों चूमने लगते हैं? जबकि हर बार बरसात या थोड़ी आंधी में ऐसे गिरे हुए पेड़ भले ही जन हानि न करें, लेकिन घंटों जाम का कारण बनते हैं। खासकर अब तो केंद्रीय दिल्ली भी सुरक्षित नहीं है।
याद दिलवाना होगा कि दिल्ली हाईकोर्ट ने 14 फरवरी 2022 को एक आदेश जारी किया था। उस आदेश में सभी नगर निगमों और सरकारी एजेंसियों को कहा था कि वे पेड़ों के लिए एंबुलेंस बनाएं। कोर्ट ने इस योजना में डीडीए और पीडब्ल्यूडी जैसी एजेंसियों को भी शामिल किया था। कोर्ट ने कहा था कि पेड़ों को बचाने के लिए विशेषज्ञों का रखा जाए। ऐसा कहा गया कि एक साल पहले ऐसी कुछ एम्बुलेंस सड़कों पर आई भी, लेकिन कालकाजी और उससे पहले दिल्ली के अलग-अलग स्थानों पर जर्जर जमीनी पकड़ के कारण जिस तरह पेड़ गिरे, उससे स्पष्ट है कि यह अभियान पोस्टर-प्रचार से आगे कहीं बढ़ नहीं पाया।
दिल्ली को हरियाली के मामले में बहुत भाग्यशाली माना जाता है। जब दिल्ली को राजधानी बनाया तो ब्रिटिश आर्किटेक्ट सर एडविन लुटियंस ने हर सड़क पर खास तरह से पेड़ लगाए, जिनमें जामुन, इमली, नीम जैसे बड़े और लंबे समय तक जीवित रहने वाले पेड़ थे जो छाया और हरियाली के साथ-साथ उस समय कम शिक्षित समाज को सड़क की पहचान भी करवाते थे-जैसे जामुन के पेड़ वाली सड़क, अर्थात अशोक रोड। समझना होगा कि अधिकांश पेड़ 1910-1930 के बीच लगाए गए थे, अर्थात उनकी उम्र 100 से 125 साल है। हालांकि इन पेड़ों की इतनी उम्र कोई ज्यादा नहीं लेकिन उनकी जड़ों को फैलने के लिए माकूल विस्तार न मिलना और उसके आसपास सीमेंट पोतने से मिट्टी पर जड़ की पकड ढीली होना ऐसे सामान्य कारण हैं, जो पेड़ों को हलकी बरसात या आंधी में हिला देते हैं। समझना होगा कि महानगर को सुंदर बनाने के लिए हम जितना अधिक सीमेंट और कोलतार का इस्तेमाल कर रहे हैं, वह शहरी हरियाली का दुश्मन है। हर बड़े पेड़ को गहराई तक अविरल जड़ों का फैलाव और जड़ों तक पर्याप्त पानी और पौष्टिक तत्व जरूरी होते हैं। जंगलों में तो पेड़ से गिरे पत्ते ही सड़ कर बेहतरीन कम्पोस्ट के रूप में बड़े पेड़ों को पुष्ट करते हैं, लेकिन दिल्ली या दीगर बड़े शहरों में पेड़ों की जड़ें, गहराई तक जाकर उन्हें मिट्टी में मजबूती से जकड़ने के बजाय, सतह के पास ही रहने को मजबूर हैं, क्योंकि नीचे पानी उपलब्ध नहीं है। शहरी इलाकों में गिरने वाला ज्यादातर पानी जमीन में रिसता नहीं; बल्कि नालियों में बह जाता है और बाहर निकल जाता है। शहरों में ज्यादातर सतहों पर सीमेंट, कंक्रीट, टाइलें, पत्थर, प्लास्टिक, कोलतार और धातु होने के कारण जड़ें पेड़ों को स्थिर रखने का अपना काम नहीं कर पातीं।
यही नहीं शहरों में बढ़ता वायु प्रदूषण भी पेड़ों के लिए बड़ा खतरा है। सन 2018 में यूनाइटेड किंगडम के एयर क्वालिटी एक्सपर्ट ग्रुप की रिपोर्ट में बताया गया था कि घने यातायात के बीच उपजने वाले पेड़ों की वायु प्रदूषण के कारण वृद्धि धीमी हो सकती है, पत्तियां खराब हो सकती हैं और वे बीमारियों और कीटों के प्रति अधिक संवेदनशील हो सकते हैं। इसके अलावा, वायु प्रदूषण, विशेष रूप से ओजोन, प्रकाश संश्लेषण को बाधित कर सकता है और पौधों के स्वास्थ्य को कमजोर कर सकता है। दूषित वायु के रासायनिक कण जब पानी के साथ मिल कर धरती की गहरे में पेड़ों की जड़ों तक पहुंचते हैं तो उसे बीमार बना देते हैं। र्इंधन से उपजने वाली सल्फर डाय आॅक्साइड और नाइट्रोजन डायआॅक्साइड गैसों के वायुमंडल में नमी के साथ अभिक्रिया करने से बनने वाली अम्लीय वर्षा मिट्टी के पीएच को कम कर देती है, जिससे कैल्शियम और मैग्नीशियम जैसे आवश्यक पोषक तत्वों की कमी हो जाती है। परिणामस्वरूप, पेड़ कमजोर हो जाते हैं और बीमारियों और कीटों के प्रति अधिक संवेदनशील हो जाते हैं। सनद रहे दिल्ली में बहुत से पेड़ दीमक के शिकार हो चुके हैं। आज जरुरी है कि अकेले इंसान नहीं, पेड़ों को भी वायु प्रदुषण से बचाने के लिए नियमति रूप से पत्तियों पर जल और दवाओं का छिड़काव किया जाए। शहरों के पेड़ों की भी उसी तरह रखरखा की जरूरत है, जैसे किसान अपनी फसलों की करता है।
यदि पेड़ों के कमजोर होने की कारणों का अध्ययन कर लें तो इन्हें गिरने से बचाने के उपाय स्वत ही खोजे जा सकते हैं। सड़कों, पार्किंग और फुटपाथ के निर्माण में पेड़ों की जड़ों के आसपास की मिट्टी को सीमेंट या टाइल से ढक दिया जाता है। इससे पानी और हवा का प्रवाह रुक जाता है। फुटपाथ या पार्किंग बनाते समय पेड़ के तने से कम से कम 3-4 फीट का दायरा मिट्टी का खुला छोड़ जाए तो पुराने हों या नए, पेड़ों को नया जीवन मिल सकता है। हर 6-8 महीने में जड़ों के पास की मिट्टी को ढीला करके उसमें जैविक खाद डालें, जिससे पोषक तत्व और नमी बनी रहे। इससे पेड़ मजबूती से खड़ा रहेगा, गिरेगा नहीं। कई बार बिजली के तार या विज्ञापन बोर्ड के रास्ते में आने पर पेड़ों की गलत तरीके से शाखाएं काट दी जाती हैं, जिससे उनका संतुलन बिगड़ जाता है। पुराने पेड़ों में दीमक, फंगस या खोखलापन आ जाता है, जो समय पर पता न चले तो उनकी मजबूती खत्म कर देता है।
महानगरों के पेड़ सिर्फ हरे-भरे दृश्य नहीं, बल्कि हमारे अस्तित्व का आधार हैं। यदि हम उन्हें सही देखभाल, खुली सांस लेने की जगह और वैज्ञानिक रखरखाव देंगे, तो न केवल वे पीढ़ियों तक खड़े रहेंगे, बल्कि शहर की हवा, तापमान और जीवन गुणवत्ता को भी बचाए रखेंगे। शहर का विकास पेड़ों की कीमत पर नहीं होना चाहिए, बल्कि उनके साथ सामंजस्य में होना चाहिए।

