
जानकार बताते हैं कि संविधान की प्रारूप समिति के अध्यक्ष रहे बाबासाहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर ने 25 नवंबर, 1949 को (यानी संविधान के अधिनियमित, आत्मार्पित व अंगीकृत किए जाने से एक दिन पहले) ही उसे ‘अपने सपनों का’ अथवा ‘तीनों लोकों से न्यारा’ मानने से इनकार करके, उससे जुड़े अंतर्विरोधों का जिक्र करते हुए, उसकी सीमाएं रेखांकित कर दी थीं। विधि मंत्री के तौर पर अपने पहले ही साक्षात्कार में उन्होंने कह दिया था कि यह संविधान अच्छे लोगों के हाथ में रहेगा तो अच्छा सिद्ध होगा, लेकिन बुरे हाथों में चला गया तो इस हद तक नाउम्मीद कर देगा कि ‘किसी के लिए भी नहीं’ नजर आएगा। उन्होंने चेताया था कि ‘संविधान पर अमल केवल संविधान के स्वरूप पर निर्भर नहीं करता। संविधान केवल विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका जैसे राज्य के अंगों का प्रावधान कर सकता है। उन अंगों का संचालन लोगों पर तथा उनके द्वारा अपनी आकांक्षाओं तथा अपनी राजनीति की पूर्ति के लिए बनाये जाने वाले राजनीतिक दलों पर निर्भर करता है। ङ्घयदि राजनीतिक दल अपने पंथ को देश से ऊपर रखेंगे तो हमारी स्वतंत्रता एक बार फिर खतरे में पड़ जाएगी और संभवतया हमेशा के लिए खत्म हो जाए।’
निस्संदेह, आज हम संविधान को खराब हाथों में न पड़ने देने की बाबा साहेब की उस चेतावनी की अनसुनी का नतीजा भुगत रहे और उस मोड़ तक जा पहुंचे हैं, जहां अंतरराष्ट्रीय सूचकांकों में हमारी स्वतंत्रता आंशिक हो गई है तो लोकतंत्र लंगड़ा। लेकिन यह नहीं कहा जा सकता कि संविधान के खराब हाथों में पड़ जाने का उनका अंदेशा आज अचानक सही सिद्ध होने लगा है। इससे पहले भी कई मौकों पर, खासकर 1975 में थोपी गई इमरजेंसी के वक्त भी, यह अंदेशा सही सिद्ध होता दिखा था। लेकिन तब और अब के हालात में एक बड़ा फर्क है। यह कि इमरजेंसी में संविधान का खराब हाथों में पड़ना जहां एक अप्रत्याशित दुर्घटना की शक्ल में सामने आया था, वहीं इन दिनों वह बहुत सचेत व सुनियोजित ढंग से हमारे सामने हैं। इसे यों समझ सकते हैं कि वह हमारे देखते-देखते मौसम बनकर देश के आकाश पर इस तरह छा गया है कि उसे इमरजेंसी जैसे किसी प्रावधान की आड़ लेने की जरूरत ही नहीं महसूस होती। इसका कारण साफ है: खराब हाथों ने अपनी योजनाओं (पढ़िए: साजिशों) की मार्फत शान से संविधान दिवस मनाते हुए संविधान की जड़ों को खोखला करने की ‘सहूलियतें’ हासिल कर ली हैं। कोई पूछे कि वे ऐसा करने में क्योंकर सफल हो गए तो जान लेना चाहिए कि इसके अंदेशे संविधान सभा की बहसों में भी जताए गए थे।
इस लिहाज से देखें तो सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी की अकर्मण्यता को समझने के लिए बहुत दूर जाने की जरूरत नहीं है। वह जिस तरह मौका पाते ही संविधान को ‘असुविधाजनक’ पाकर उसकी ‘समीक्षा’ की अपनी चाहत को आगे करती और उसकी प्रस्तावना से ‘धर्मनिरपेक्षता’ व ‘समाजवाद’ शब्दों को हटाने के लिए बहस छेड़कर उसकी आत्मा तक से खेल में लग जाती है, उसी में इसके भरपूर दर्शन किए जा सकते हैं। क्या आश्चर्य कि उसकी अकर्मण्यता ने उसके वर्चस्व वाली संसद को भी इतनी अकर्मण्य बना दिया है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र्र मोदी को संसद के अधीन काम करने वाले और उसके प्रति जवाबदेह संवैधानिक अधिकारी की अपनी भूमिका को लगातार न्यूनतम करते जाने में कुछ भी अलोकतांत्रिक नहीं लगता।
गौर कीजिए, जगदीप धनखड़ की निगाह में सर्वशक्तिमान जिस संसद ने उनको उपराष्ट्रपति चुना था, उनके इस्तीफे के बाद उन्हें उसके लिए मजबूर किए जाने की अंदरखाने हो रही चर्चा उसकी अशक्तता व अकर्मण्यता बढ़ने की ही संकेत थीं। इतना ही नहीं, अपने पद पर रहते हुए धनखड़ ने संसद की गरिमा को भुलाकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भाजपा की जैसी खुली पैरवी की व पक्ष लिया और सत्ता पक्ष व विपक्ष में जैसा भेदभाव किया (कहना चाहिए, करने के लिए विवश किए गए) उससे तो संसद की ही नहीं, उसके सदनों के सभापति/अध्यक्ष की अकर्मण्यता का भी पता चला, असहायता का भी। कम से कम, राज्यसभा के सभापति होते हुए धनखड़ का प्रधानमंत्री के भक्त संप्रदाय का प्रखर सदस्य नजर आना उनकी शक्ति का परिचायक तो नहीं ही था। इस तथ्य के आईने में यह विडंबना और बड़ी लगती है कि संविधान निर्माताओं ने देश में संसदीय लोकतंत्र की स्थापना की तो संसद को सर्वोच्च माना था। तभी तो व्यवस्था की थी कि प्रधानमंत्री व उनके मंत्री तभी तक अपने पद पर बने रह सकते हैं, जब तक संसद (खासकर उसके निचले सदन लोकसभा) का उनमें विश्वास हो। दूसरे शब्दों में कहें तो उन्होंने प्रधानमंत्री और उनके मंत्रिमंडल का जीवन व मरण संसद के हाथ में सौंप दिया था।
लोकसभा चुनाव से पहले प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार की घोषणा भी संविधान के प्रति अकर्मण्यता दर्शाना ही है, तो क्योंकि संविधान के अनुसार प्रधानमंत्री चुनना लोकसभा के निर्वाचित सदस्यों का अधिकार है और पहले से प्रधानमंत्री का नाम तय कर देने से उनके इस अधिकार की अवज्ञा होती है। प्रधानमंत्री के नाम पर चुनाव लड़े व जीते जाने की स्थिति में प्रधानमंत्री का ‘सर्वशक्तिमान’ हो जाना बहुत स्वाभाविक है। लोकसभा के सदस्य प्रधानमंत्री के नाम व ख्याति के आधार पर चुने जाएंगे, तो वे प्रधानमंत्री को माई-बाप मानकर उसके हर निर्णय को सिर माथे रखेंगे ही, जिससे संविधान या लोकतंत्र नहीं, तानाशाही की प्रवृत्तियों का ही पोषण होगा। फिर प्रधानमंत्री व उनकी सरकार को लोकतांत्रिक बनाने वाले दबाव कहां से आएंगे?
खासकर जब संसद के सदनों के अध्यक्ष/सभापति और पीठासीन अधिकारी वगैरह भी प्रधानमंत्री जो भी निर्णय ले लें, आंखें मूंदकर जैसे भी बने, उसे सदन की स्वीकृति दिलाने को ही अपना परम कर्तव्य मान लें। जैसे कि प्रधानमंत्री के इंगित पर काम करने वाले कार्यकर्ता बनने में ही उनका गौरव हो और संविधान की इस अपेक्षा का कोई मतलब न हो कि वे सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच राग-द्वेष के बगैर दोनों के संरक्षक की तरह अपने सदन की कार्रवाई का संचालन करें। ताकि सदन के गौरव व गरिमा और उसके सदस्यों के मान-सम्मान की रक्षा का उनका संवैधानिक दायित्व ठीक से निभे।
इस दायित्व के निर्वहन के प्रति इतनी उदासीनता है कि अब लोकसभा में उपाध्यक्ष का चुनाव ही नहीं कराया जाता और धनखड़ जैसे ‘वफादार’ सभापति के बेआबरू होकर कूचे से निकल जाने को मजबूर होने में भी, कम से कम सत्ता पक्ष को कुछ भी अस्वाभाविक नहीं लगता। यह तब है जब संविधान में विपक्ष को भी सत्तापक्ष जितनी ही अहमियत दी गई है और ‘महामहिम के विपक्षी दल’ के बगैर ‘महामहिम की सरकार’ का गठन पूरा हुआ नहीं माना जाता। अब इस कर्तव्य पालन की जगह विपक्ष के प्रति असम्मान, अनादर, आक्रामकता और एक शब्द में कहें तो दुश्मनी ने ले ली है।

