राजेंद्र बज
जिंदगी का कोई भरोसा नहीं। कब किसी के साथ क्या कुछ घटित हो जाए, कुछ भी कहा नहीं जा सकता। आज हम जी रहे हैं – क्योंकि हमें जीना है या कि जीना पड़ रहा है- खैर, जो भी कुछ हो। लेकिन कभी-कभी मन में विचार आता है कि जीवन के अंतिम सत्य से जब सामना होगा, क्या हम मनोवांछित तरीके से जी लिए – या उसके अनुरूप जीना शेष था? क्या यह सवाल भी मन का मन में ही रह जाएगा? बस, दरअसल मानव जीवन की यही विडंबना है कि कोई भी शख्सियत अपने जीवन काल में ‘भरपूर जीवन जी लिए’ ऐसा दावा नहीं कर सकती। हमारी हर एक आती-जाती सांस इस धरा पर हमारे अस्तित्व का ह्रास करती चली जाती है… और हम वर्ष-दर-वर्ष अपने जन्मदिन की खुशियां मनाते रह जाते हैं।
एक बार भी हमारे चेतन या अवचेतन मन में यह विचार नहीं आता कि वर्ष-दर-वर्ष हमारा जीवनकाल समाप्ति की ओर अग्रसर हो रहा है। वैसे देखा जाए तो इसकी बड़ी वजह यह है कि हर कोई ‘जीते-जीते जिया ही चला जाएगा’, कुछ इसी प्रकार की भ्रमित अवस्था में रहा करता है। वैसे जीवन के अंतिम सत्य को सब जानते हैं और पहचानते हैं। लेकिन रहती सांस तक जीने की तमन्ना मन मयूर में हिलोरे लिया करती है। बस ऐसे ही दौर में देखते ही देखते सांसें जवाब दे जाती हैं और हम पंचतत्व में विलीन हो जाया करते हैं। परिजन भी समय के साथ-साथ शोक की बेला से उबर जाया करते हैं।
दरअसल यही संसार की रीत है कि ‘जाते के साथ कोई नहीं जाता’, महज कुछ दिनों का शोक और फिर देखते ही देखते सब कुछ वैसा का वैसा-जैसा कि कभी था।
ऐसी स्थिति में यह अत्यंत आवश्यक हो जाता है कि हम अपने जीवन मूल्य को समझें और वही करें जो सच्चे अर्थों में हमारे अंतर्मन में सुकून का कारण बना करता है। वास्तव में हम जानते हैं कि हमें एक न एक दिन इस असार संसार से जाना ही है। आती-जाती सांसें चाहे जीवन के पल छीन रही हो, किंतु हम इस तथ्य को लेकर गंभीर नहीं होते। यह मानव मात्र की दुर्बलता है कि उसके अंतरंग में जिजीविषा के भाव निरंतर बने रहा करते हैं। वैसे एक प्रकार से यह जीवटता की निशानी है। इसके बावजूद कहीं न कहीं, किसी न किसी प्रकार मन की अतृप्त प्यास मन की मन में ही रह जाया करती है। ऐसे में बेहतर हो यदि हम अपने जीवन काल में ही अपनी प्राथमिकताओं को वरीयता देकर जो कुछ जहां अधुरा है- उसे पूर्ण करने का प्रयास करें।
इन्हीं संदर्भों में हमें जीवन के नैतिक मूल्यों के साथ ‘जीवन मूल्य’ भी निर्धारित कर लेना चाहिए। इस संसार में हर कोई कहीं न कहीं किसी न किसी पर आश्रित है। यानी कि हर कोई किसी अन्य पर किसी न किसी रूप में निर्भर करता है। एक-दूसरे के जीवन मूल्य परस्पर आपस में गूंथें रहा करते हैं। यही एक-दूसरे पर निर्भरता की स्थिति परिवार और समाज की रचना में सहायक होती है। इसका वृहद स्वरूप सकल राष्ट्र की भौगोलिक स्थिति में परिलक्षित होता है। इसी आधार पर व्यक्ति में राष्ट्रीयता के भाव भी जागृत होते हैं। और आगे जाएं तो विश्व बंधुत्व की भावना भी इन्हीं अवधारणाओं से उपजी हुई मानी जा सकती है। हम अपनी धारणाओं और भावनाओं के माध्यम से अपने जीवन में अपना कार्यक्षेत्र सुनिश्चित करते हुए घर परिवार के अतिरिक्त समाज व राष्ट्र के लिए भी अपना जीवन सार्थक सिद्ध कर सकते हैं।
जहां तक व्यक्तिविशेष के व्यक्तिगत जीवन का प्रश्न है, तो किसी भी व्यक्ति का जीवन मात्र उसके लिए ही महत्वपूर्ण नहीं होता। अपितु अन्य के लिए भी महत्व का हुआ करता है। इसी आधार पर मानवीयता के गुणों का समावेश भी व्यक्ति विशेष में होता आया है। हर एक व्यक्ति के सामाजिक सरोकार भी होते हैं, इन सरोकारों से जुड़कर ही हम परस्पर सौहार्दतापूर्वक संबंधों को विकसित करते हुए अपने अस्तित्व की सार्थकता सिद्ध कर सकते हैं। हमें अपने लिए ही नहीं जीना चाहिए अपितु दूसरों के लिए भी अपने जीवन का कुछ अंश न्योछावर करते रहना चाहिए। चाहे इस अंश में समय हो या धन, लेकिन समर्पण की भावना के साथ यदि हम किसी के हित में कुछ करते हैं, तो हम निमित्त बन जाते हैं। ऐसे निमित बनने पर अंतर्मन में असीम आनंद की दिव्य अनुभूति से दो-चार हो सकते हैं।

