नमस्कार, दैनिक जनवाणी डॉटकॉम वेबसाइट पर आपका हार्दिक स्वागत और अभिनंदन है। आज, 7 अक्तूबर को देशभर में महर्षि वाल्मीकि जयंती श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाई जा रही है। हिंदू पंचांग के अनुसार, यह दिन आश्विन माह की पूर्णिमा तिथि पर पड़ता है। महर्षि वाल्मीकि को संस्कृत साहित्य का पितामह और आदिकवि कहा जाता है। उन्होंने विश्व के प्राचीनतम महाकाव्य रामायण की रचना की थी, जिसमें भगवान श्रीराम के जीवन, आदर्शों और मर्यादा का वर्णन किया गया है।
हर वर्ष अश्विन मास की पूर्णिमा के दिन को वाल्मिकी जयंती पूरे देशभर उत्साह और हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। हिंदू धर्म में रामायण बहुत ही पूजनीय ग्रंथ है। वाल्मिकी जयंती पर जगह-जगह कई आयोजन किए जाते हैं। इस दिन शोभा यात्राएं निकाली जाती है। इस मौके पर लोग इनकी पूजा करते हैं।
कौन थे ऋषि वाल्मिकी?
महर्षि वाल्मिकी के जन्म के विषय में कोई सटीक प्रमाण तो नहीं मिलते हैं परंतु माना जाता है कि इनका जन्म ऋषि कश्यप और माता अदिति की नौंवी संतान वरुण और उनकी पत्नी चर्षणी के यहां हुआ था। इनके बड़े भाई ऋषि भृगु थे। कई वर्षो तक राम जी की साधना करते समय इनके शरीर पर दीमक लग जाने के कारण इनका नाम वाल्मिकी हुआ।
लंका पर विजय प्राप्ति करने के बाद जब जब राम, लक्ष्मण और सीता वापस 14 वर्षों का वनवास पूरा करके आए तो भगवान राम ने माता सीता का परित्याग कर दिया था। इसके बाद माता सीता कई वर्षों तक महर्षि वाल्कीकि के आश्रम में रहीं। इस आश्रम में माता सीता ने लव और कुश को जन्म दिया था। जहां पर लव-कुश की शिक्षा-दीक्षा महर्षि वाल्मीकी के द्वारा दी गई थी।
महर्षि वाल्मीकि ने लिखा संस्कृत का पहला श्लोक
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार,महर्षि वाल्मीकि ने ही संस्कृत का पहला श्लोक लिखा था यह श्लोक ये है।
मां निषाद प्रतिष्ठां त्वमगमः शाश्वतीः समाः ।
यत्क्रौंचमिथुनादेकम् अवधीः काममोहितम् ॥
इस श्लोक की रचना एक बहेलिये के लिए श्राप था जिसने एक क्रौंच पक्षी के जोड़े में से नर पक्षी को बाण मारा था।
महर्षि वाल्मीकि को कैसे मिली रामायण लिखने की प्रेरणा?
पौराणिक कथा के अनुसार बाल्यकाल की अवस्था में एक भिलनी के द्वारा चुरा लिया गया था जिसके कारण इनका पालन भील परिवार में हुआ। जिसके कारण पहले इनका नाम रत्नाकर था। रत्नाकर अपने परिवार के भरण पोषण के लिए लोगों से लूटपाट किया करते थे। एक बार उन्हें नारद मुनि मिले तब रत्नाकर ने उनको भी लूटने का प्रयास किया। जिसके बाद नारद ने उनसे कहा कि वह ये बुरा कार्य क्यों करते हैं। इस प्रश्न को सुनकर रत्नाकर ने उनसे कहा कि वे इस कार्य को करके अपने परिवार का पालन पोषण करते हैं।
नारद मुनि ने रत्नाकर से कहा कि जिस परिवार के लिए वे ये सारे बुरे कार्य कर रहे है क्या उनका परिवार उनके इन पाप कर्मों में भागीदार बनने के लिए तैयार होंगे। नारद की यह बात सुनकर रत्नाकर असमंजस की स्थिति में पड़ गए। इस प्रश्न का उत्तर जानने के लिए नारद मुनि को वहीं पर पेड़ से बांध कर अपने परिवार के पास गए। लेकिन उनके परिवार का कोई भी सदस्य उनके पापकर्मों में भागीदार बनने के लिए राजी नहीं था। जिसके बाद उन्हें अपने द्वारा किए गए बुरे कामों के कारण बहुत पश्चाताप हुआ।
वे वापस उस स्थान पर गए जहां उन्होंने नारद मुनि को बांधा था। उन्होंने नारद मुनि के तुरंत बंधन से मुक्त करते हुए क्षमा मांगी और उनके चरणों में गिर गए। जिसके बाद नारद मुनि के द्वारा उन्हें सत्य के ज्ञान से परिचित कराया गया। तब नारद मुनि ने इन्हें राम नाम का जप करने को कहा। प्रभु श्री राम नाम का जप करते हुए ये महर्षि बने। राम नाम का जप करते हुए इनकी कठिन तपस्या से ब्रह्मा जी ने प्रसन्न होकर इन्हें रामायण जैसा महाकाव्य लिखने का सामर्थ्य प्रदान किया।

