Friday, April 3, 2026
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चीन के पाले में क्यों गए पड़ोसी देश

Samvad 51


ARVIND SAMBHAV1947 में भारत की आजादी के समय समूचे दक्षिणी एशिया में चारों तरफ भारत के मित्र राष्ट्र अस्तित्व में थे और भारतीय विदेश नीति निर्माताओं को इस पर बहुत ज्यादा होमवर्क करने की जरूरत नहीं पड़ी। अफगानिस्तान, तिब्बत, चीन नेपाल, भूटान, सिक्किम,बर्मा, श्रीलंका, मालदीव ये सब राष्ट्र भारत के परंपरागत मित्र राष्ट्र थे और इनमें से बहुत से तो ब्रिटिश साम्राज्य के हिस्से भी रहे। इन्हीं देशों के समर्थन एवं सहयोग के बल पर जवाहरलाल नेहरू ने टीटो और नासर के साथ मिलकर गुटनिरपेक्ष राष्ट्रों का पृथक समूह बनाने का न केवल साहस किया अपितु इसे सफलतापूर्वक कार्यान्वित भी किया। समय बदला। चीन भौगोलिक कारणों से मित्र की जगह शत्रु बन गया। तिब्बत को जबरन चीन में विलय कर लिया गया। लेकिन बाकी देश कमोबेश भारत के दोस्त बने रहे और अंतर्राष्ट्रीय मामलों में एक दूसरे का साथ देते रहे। 1971 में नया नया बना बांग्लादेश भी मित्र सूची में जुड़ गया। एक समय ऐसा भी आया जब अफगानिस्तान तालिबानी सरकार और बर्मा सैनिक हुकुमत के कारण भारत सरकार से दूर चले गए किंतु फिर धीरे-धीरे पुन: भारत के नजदीक भी आ गए। अब पिछले कुछ वर्षों से ऐसा लगता है कि ये सभी या इनमें से अधिकांश देश भारत के साथ दोस्ती में गर्मजोशी नहीं दिखा रहे हैं और गाहे बगाहे लिए गए व्यापारिक और सैन्य मामलों के निर्णयों से भारत के हितों को चोट पहुंचाने का कार्य कर रहे हैं। श्रीलंका, मालदीव, बंगलादेश, नेपाल इसके कुछ उदाहरण हैं। यदि गहराई से इस प्रवृत्ति की विवेचना की जाए तो इसके तीन प्रमुख कारण हैं। पहला- चीन की आक्रामक विदेश और व्यापार नीति। दूसरा-भारतीय विदेश मंत्रालय का परंपरागत अहंकार एवं अव्यवहारिक दृष्टिकोण। तीसरा एवं सबसे महत्वपूर्ण-बदलता वैश्विक भूमंडलीकरण। पिछले लगभग बीस वर्षों से चीन समूचे एशिया और अफ्रीका के देशों में अपने व्यापारिक एवं सैन्य संबंध बढ़ा रहा है और अपनी इसी दूरगामी नीति के तहत उसने बहु आयामी अंतर्राष्ट्रीय सड़क निर्माण योजना का शुभारंभ किया जिसमें धीरे-धीरे उसने दक्षिणी, मध्य, पश्चिमी एशिया के साथ-साथ दक्षिणी यूरोप के देशों को भी जोड़ लिया। इस हेतु उसने कम ब्याज दर पर लंबी अवधि के ऋण उन देशों के लिए स्वीकृत किए और उनके आंतरिक इंफ्रास्ट्रक्चर में विभिन्न समझौते करके मदद देनी प्रारंभ की। साथ-साथ उसने उत्पाद और निर्माण क्षेत्र के अपने विशाल औद्योगिक उत्पादों को खपाने के लिये इन्हीं देशों में अपना बाजार भी तलाश लिया। अब सस्ते कच्चे माल और ऋण के जाल में फंसे ये देश पूर्णत: चीन के चंगुल में फंस गये और उतने ही भारत से दूर भी होते गये।

भारत इसमें साधनों के अभाव के कारण या समय पर स्ट्रैटेजिक योजनाएं बनाने में विफल रहने की वजह से बहुत पिछड़ गया और बाजी उसके हाथ से निकल गई। भारत का विदेश मंत्रालय विशेषकर भारतीय जनता पार्टी की 2014 में सरकार बनने के बाद अमेरिकी, यूरोप, पश्चिमी एशिया और मध्यपूर्व के देशों से संबंध मजबूत बनाने की तरफ ज्यादा ध्यान देने लगा और इस क्रम में उसने अपने पड़ोसी देशों को लगभग उपेक्षित ही कर दिया। लापरवाही का आलम तो यह था कि जिस अफगानिस्तान में पुनर्निर्माण के नाम पर भारत ने करोड़ों डालर खर्च कर दिए थे, उस अफगानिस्तान की इस समय की अपेक्षाकृत बेहतर तालिबानी सरकार से औपचारिक दौत्य संबंध भी अभी तक उसने नहीं बनाए हैं। परिणामस्वरूप चीन वहां भी रोड एवं बिल्ट योजना तथा विभिन्न परियोजनाओं के माध्यम से अपना प्रभाव स्थापित कर रहा है। यही स्थिति नेपाल की है। इस समय वहां की प्रत्येक सरकार चाहें वह साम्यवादी हो या नेपाली कांग्रेस हो, सत्ता में आने के बाद अधिकांश आर्थिक, व्यापारिक एवं सैन्य समझौते चीन के साथ करने को प्राथमिकता देने लगे, भारत की उपेक्षा करने लगे। यहां तक की नेपाली सरकार ने गोरखाओं के भारतीय सेना में भर्ती पर भी रोक लगाकर चीन और ब्रिटेन के लिए इसे खुला रखा है।

बांग्लादेश, बर्मा (म्यांमार), श्री लंका ने भी अब लगभग भारतीय विदेश मंत्रालय की उपेक्षा करना प्रारंभ कर दिया है। वैश्विक मामलों में जहां आज भी रूस आम तौर पर भारत के साथ खड़ा रहता है, बावजूद इसके कि वर्तमान मोदी सरकार और अपने दूसरे कार्यकाल में मनमोहन सिंह सरकार का झुकाव यूरोप एवं अमेरिका की तरफ दिखाई दे गया था। जहां मनमोहन सरकार ने चीन के प्रति रवैया बहुत ज्यादा नरम नहीं रखा और उससे एक निश्चित दूरी बना कर रखी वहीं नरेंद्र मोदी सरकार ने आश्चर्यजनक रूप से चीन के प्रति अपना न केवल झुकाव दिखाया अपितु बहुत भारी तादाद में उससे वस्तुएं आयात करने लगे जिसके कारण उनका आपसी व्यापार संतुलन बहुत भारी रूप में चीन के पक्ष में झुक गया।
सीमा उल्लंघन और संप्रभुता प्रदर्शन पर भी वर्तमान सरकार ने बेहद कमजोर रुख अपनाया है। इसके साथ ही पड़ोसी देशों की सरकारों को चीन के पक्ष में झुकने देने से रोक पाने में भी भारतीय विदेश मंत्रालय और खुफिया विंग रा पूर्णत: विफल रहे, जिसके उदाहरण हम नेपाल और मालदीव में चीन समर्थक और भारत विरोधी सरकारों के अस्तित्व में आने में देख सकते हैं। भारतीय विदेश मंत्रालय की विवशता इस बात से भी परखी जा सकती है कि उसकी आंखों के सामने भारत का परम मित्र भूटान सीधे ही चीन से सीमा वार्ता कर रहा है। अब यदि भूटान और चीन में डोकलाम पर समझौता हो जाता है तो फिर भारत का समूचा उत्तर पूर्व चिकन नेक पर चीन की पहुंच के कारण संकट में आ सकता है।

आर्थिक मोर्चे पर भी भारत अपने आसपास के देशों में अपना दखल नहीं रख पा रहा है। बावजूद इसके की तत्कालीन मनमोहन सरकार ने बांग्लादेश, मालदीव और श्रीलंका में अनेक परियोजनाएं प्रारंभ की थीं, जिनमें से अधिकांश में अब भारत को हटा कर चीन को भागीदार बना लिया गया है। यह सब इसलिए भी संभव हो पाया है कि अमेरिका ने अपना ध्यान पूर्णरूपेण दक्षिणी एशिया और विशेषकर हिंद महासागर क्षेत्र से हटा कर मध्य पूर्व , पश्चिमी एशिया और यूक्रेन पर स्थिर कर लिया है और सशक्त विकल्प की गैरमौजूदगी में चीन धीरे-धीरे यहां काबिज हो गया और भारत पिछड़ गया।
पड़ोसी देशों का भारत के लिए सबसे बड़ा ऐतराज यह है कि वहां की सरकार उनसे बड़े भाई जैसा सलूक करती है जो किसी भी स्वतंत्र एवं सार्वभौम राष्ट्र को स्वीकार्य नहीं है। दूसरी शिकायत यह है कि यदि किसी देश का किसी परियोजना को लेकर भारत सरकार से समझौता भी हो जाता है तो उसे प्रारंभ करने में ही बरसों बीत जाते हैं। परियोजना पूर्ण तो पता नहीं कितने वर्षों में होती है या नहीं भी होती। इस क्रम में भारत सरकार धनराशि जारी करने में भी अत्यधिक विलंब करती है। इन सब बिंदुओं पर ये देश चीन को अधिक सहज और सकारात्मक पाते हैं। भारत सरकार को गंभीरता और समग्रता से अपनी वैदेशिक नीतियों की समीक्षा करनी चाहिए और पड़ोस के देशों से किस तरह संबंध फिर से पटरी पर आएं, इस पर पुनर्विचार करना चाहिए।


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