Tuesday, June 16, 2026
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गाजा हिंसा के विरोध में अमेरिकी युवा

Nazariya 22


bharat dograपहले अमेरिका, फिर अनेक पश्चिमी देशों के विश्वविद्यालयों में गाजा में हुए दमन व अत्याचार के विरुद्ध छात्र आंदोलनों ने एक सशक्त आवाज बुलंद की है। एक व्यापक उम्मीद यह भी बनी है कि यदि आगे भी ऐसी जागृति बनी रही तो इससे पश्चिमी जगत में शान्ति आंदोलन और मजबूत हो सकता है जिसकी बहुत जरूरत भी है। पूरे विश्व के संदर्भ में देखें तो इस उभार ने एक बार फिर सामाजिक बदलाव में युवा शक्ति के महत्त्व को रेखांकित किया है। विश्व इतिहास में समता और न्याय पर आधारित समाज स्थापित करने के अनेक प्रयास होते रहे हैं। इस उद्देश्य की प्राप्ति में अनेक उतार-चढ़ाव आते रहे हैं। इक्कीसवीं शताब्दी के आरंभ में इन प्रयासों की सार्थकता और जरूरत पहले से कहीं अधिक बढ़ गई है। जलवायु परिवर्तन और पर्यावरण का संकट बहुत गंभीर स्थिति में पहुंचने के साथ यह आवश्यकता बहुत बढ़ गई है कि समय रहते इस संकट का समाधान समता और न्याय की राह से ही प्राप्त किया जाए। इन समस्याओं की गंभीरता के साथ बड़ी व ऐतिहासिक जिम्मेदारियों को निभाने में युवा वर्ग की भूमिका भी बढ़ गई है। युवा वर्ग की सार्थक सामाजिक बदलाव में सदा एक महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है। इसकी एक वजह यह है कि स्वार्थों से ऊपर व आदर्शों से प्रेरित होकर बड़ी चुनौतियों को बहुत उत्साह से स्वीकार करने की जो क्षमता युवाओं में है, वह अन्य आयु वर्गों में अपेक्षाकृत कम देखी जाती है। इसके साथ ही यह भी बहुत जरूरी है कि युवा वर्ग में सार्थक सामाजिक बदलाव के उद्देश्यों और ह्यराहह्ण की सही समझ बने। सुलझी हुई सैद्धान्तिक व व्यवहारिक समझ के बिना दिशाहीन युवा स्वयं अनेक कष्ट सहकर भी वह योगदान नहीं दे पाते, जो वे चाहते हैं।

इस संदर्भ में एक सवाल प्राय: चर्चित रहा है कि सार्थक, सामाजिक बदलाव की राह हिंसक हो या अहिंसक, गुप्त हो या पारदर्शी। मौजूदा दौर की जटिलताओं के साथ अहिंसक व पारदर्शी बदलाव का पलड़ा निरंतर भारी होता रहा है। इस समय सार्थक व जरूरी बदलाव के लिए सबसे जरूरी कार्य है न्याय, समता व पर्यावरण रक्षा पर आधारित एक ऐसे एजेंडे को लोगों के बीच ले जाना जिसके विभिन्न लक्ष्य एक दूसरे से मेल खाते हैं। इसके लिए लोकतंत्र व लोकतांत्रिक प्रक्रियाएं बहुत जरूरी हैं, पारदर्शिता बहुत जरूरी है, खुला विमर्श बहुत जरूरी है। अत: सार्थक सामाजिक बदलाव की राह पर अग्रसर युवाओं को अहिंसा व पारदर्शिता की राह को ही चुनना चाहिए। देश और दुनिया में मौजूदा दौर में अहिंसक क्रांति का अर्थ है अधिसंख्य लोगों को समय रहते समता, न्याय और पर्यावरण रक्षा के एजेंडे के लिए तैयार करना। यह एक बहुत कठिन चुनौती है जिसके लिए बहुत मेहनत, समझदारी और निरंतरता से कार्य करने की जरूरत है। युद्ध व हथियारों की दौड़ के बीच में मौजूदा दौर के सबसे महत्त्वपूर्ण लक्ष्य प्राप्त हो ही नहीं सकते। अत: युद्ध व हथियारों की दौड़ की संभावना को न्यूनतम करते हुए विश्व शान्ति की ओर बढ़ना अहिंसक क्रान्ति का महत्वपूर्ण ही नहीं, अनिवार्य पक्ष है।

इसी तरह गृह-युद्ध, अलगाववादी हिंसा, सांप्रदायिकता, धार्मिक कट्टरता व उन्माद से जुड़ी हिंसा, धार्मिक कट्टरता से जुड़े अलगाववाद को भी नकारना व विभिन्न समस्याओं के लोकतांत्रिक समाधानों को प्रतिष्ठित करना जरूरी है। समता व न्याय का मूल उद्देश्य सदा महत्त्वपूर्ण रहा है और नई गंभीर समस्याओं के आने के बावजूद यह उद्देश्य आज भी उतना ही महत्वपूर्ण है। समानता व न्याय का अर्थ केवल आर्थिक समानता व न्याय से ही नहीं है, अपितु जाति, धर्म, नस्ल, रंग व लिंग आधारित सब तरह के भेदभाव को दूर करना और व्यापक सामाजिक समता को प्रतिष्ठित करना भी उतना ही जरूरी है। विभिन्न देशों की आंतरिक समानता के साथ अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर विभिन्न देशों की समानता भी बहुत जरूरी है, ताकि साम्राज्यवादी सोच, इस पर आधारित प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष शोषण व अन्याय तथा इससे जुड़ी हिंसा व युद्ध की संभावनाओं पर सदा के लिए रोक लग सके। यदि मौजूदा पर्यावरणीय समस्याओं का समग्रता से आकलन किया जाए तो मानव इतिहास के सबसे नाजुक दौर से इस समय हम गुजर रहे हैं। कमोबेश यही निष्कर्ष विश्व के अनेक महत्त्वपूर्ण अध्ययनों व ‘संयुक्त राष्ट्र संघ’ की रिपोर्टों में प्रस्तुत किए जा रहे हैं।

ऐसी स्थिति में युद्ध, महाविनाशक हथियार व शस्त्रीकरण के एजेंडे को छोड़कर समता व न्याय पर आधारित पर्यावरण की रक्षा के एजेंडे को समर्पित हो जाना धरती पर जीवन की रक्षा के लिए एक अनिवार्यता बन गया है, पर विश्व नेतृत्व अभी तक इस जिम्मेदारी से पीछे हट रहा है। यदि संयुक्त राष्ट्र संघ के पांच स्थाई सदस्यों को मोटे तौर पर विश्व नेतृत्व का पर्याय मान लिया जाए तो इनका नेत्तृत्व अभी शान्ति, निशस्त्रीकरण, पर्यावरण रक्षा, समता व न्याय के एजेंडे से दूर है। इस स्थिति में विश्व भर के युवाओं के लिए यह बड़ी चुनौती है कि वे अपने भविष्य को अपने हाथों में लें। भावी पीढ़ियों के भविष्य को भयानक पर्यावरणीय विनाश व महाविनाशक हथियारों की क्षति से बचाने के लिए युवाओं को शान्ति, पर्यावरण रक्षा, समता व न्याय के एजेंडे को लेकर तेजी व हिम्मत से आगे बढ़ना चाहिए। इस अभियान में दुनिया भर के न्यायप्रिय व समझदार नागरिक तथा बुजुर्ग उनका साथ अवश्य देंगे। इस बारे में व्यापक सहमति बनाने में कुछ समय लगेगा, कठिनाइयां भी आएंगी, पर यह कार्य इतना जरूरी है कि इसे करना ही चाहिए। उसमें सभी आयु वर्गों को महत्वपूर्ण योगदान देना होगा व बुजुर्गों के अनुभव की भी महत्वपूर्ण भूमिका होगी।


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