Wednesday, September 22, 2021
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पेंशन में भेदभाव क्यों?

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वह अपनी पूरी जवानी खपाता है। गिनी-चुनी छुट्टियां छोड़ रोजाना 8 घण्टे तो कई बार 2-4 घंटे ज्यादा काम करता है। हर महीने नपी-तुली पगार से घर चलाता है। जवानी में बीवी की ख्वाहिशें तो बाद में बच्चों की अच्छी परवरिश के लिए कड़ी मेहनत करता है। तनख्वाह से पेट काट कर वह घर, परिवार की जरूरतों को पूरी करता है। अपनी वफादारी और मेहनत के दम पर 5-10 साल में कभी तरक्की पाता है तो ओहदा थोड़ा बढ़ जाता है, कुछ पगार बढ़ जाती है। बस यही सब उसकी खुशी है। अधेड़ होते-होते बच्चों की पढ़ाई, नौकरी, शादी और सबसे आखिर परिवार खातिर आशियाने का सपना बुनता है जो कभी पूरा होता है तो कभी नहीं। तमाम जरूरतें, जिम्मेदारियों से लड़ते, जूझते एक दिन रिटायर होता है। एक छोटी सी उम्मीद बचती है जो उसके पगार से उसी के भविष्य के लिए काटी गई रकम में कुछ सरकार इमदाद मिलाकर उसे एक मुश्त मिलती है। इसी फंड से अपनी बुढ़ापे की जरूरतों का बड़ा ख्वाब पाल लेता है। इस तरह 30-35 बरस लगातार काम करते-करते कब जवान से बूढ़ा हो जाता है, पता ही नहीं चलता। रिटायर होने के बाद जिस पेंशन का हकदार होता है उससे हर महीने मिलने वाली थोड़ी सी रकम से अपनी बची जिंदगी गुजारना शुरू कर देता है। यही एक सरकारी नौकरीपेशा का सच है जिसे जीते-जीते देखते ही देखते वह जवान से बूढ़ा फिर लाचार हो जाता है।

इसके ठीक उलट, विधायकों और सांसदों को दी जाने वाले पेंशन की विसंगतियों या नीतियों को लेकर हैरानी होती है। न तो इनके लिए कोई निश्चित समय सीमा है और न ही नियम। जहां महज एक दिन की सांसदी या विधायकी में जीवन भर पेंशन की पात्रता बनती है।

यदि पेंशन उन्हीं सांसदों और विधायकों को दी जाती जिन्होंने पांच साल का कार्यकाल पूरा किया हो तो भी थोड़ा तर्क संगत लगता। लेकिन लगता नहीं कि अपनी सुविधा के लिए माननीयों के खातिर यह कानून देश के करोड़ों कर दाताओं की गाढ़ी कमाई के साथ नाइंसाफी है? अदालतों में भी समय-समय पर इस कानून को लेकर याचिकाएं दाखिल होती रहीं हैं, हो भी रही हैं।

लेकिन अभी तक इस कानून पर कोई आंच आई नहीं। फिलाहाल मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय में दिसंबर 2020 में दाखिल एक याचिका विचाराधीन भी है, जिसमें भी पेंशन की पात्रता के लिए न्यूनतम कार्यकाल को आधार बनाया गया है।

याचिका में मांग की गई है कि पेंशन की पात्रता के लिए सांसदों और विधायकों का कार्यकाल तय होना चाहिए क्योंकि सांसदों और विधायकों को जो पेंशन दी जाती है, वो करदाताओं का पैसा है। मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की इंदौर खंडपीठ की डबल बेंच ने दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए राज्य और केंद्र सरकार को नोटिस भेजकर चार हफ्ते में जवाब मांगा है जिसकी अगली सुनवाई 24 सितंबर को होगी।

ऐसी विसंगतियाँ क्यों? एक व्यक्ति, एक पगार, एक पेंशन माननीयों पर क्यों नहीं लागू होना चाहिए? हालांकि यह नीतिगत मामला है और जगजाहिर है नीति बनाने वाले कौन होते हैं? उससे भी बड़ा सवाल और पूर्ण सत्य यह कि इन्हें इस मुकाम तक पहुंचा कर पगार और पेंशन के काबिल बनाने वाला मतदाता ही इनकी बनाई ऊल-जलूल नीतियों का शिकार होता है! सवाल यही कि सुनेगा कौन? विडंबना देखिए करीब 82 प्रतिशत सांसद करोड़पति हैं, प्रति व्यक्ति आय 10534 रुपये से भी कम है, बड़ी तादाद में लोगों को दो जून की रोटी नसीब न हो उसी देश के जनता के लिए, जनता द्वारा चुने जनप्रतिनिधि जनता की गाढ़ी कमाई से जुटाई रकम को किस तरह पेंशन, पगार के रूप में पाते हैं। यहां तक कि कोई दुबारा सांसद बनता है तो पेंशन में दो हजार रुपए महीने का इजाफा हो जाता है।

1954 में लागू हुए सांसदों के वेतन, भत्ता एवं पेंशन अधिनियम में 29 बार माननीयों ने मनमाने और सुविधाजनक संशोधन किए हैं। हालाकि संविधान सभा ने सांसदों की पेंशन का प्रावधान नहीं किया था। बाद में संशोधन के जरिये पेंशन को जोड़ा गया। धीरे-धीरे सभी राज्यों ने यही किया।

पूर्व सांसदों व पूर्व विधायकों के लिए सौगातों की झड़ी लग गई। देखिए कैसी विसंगति है। 2018 के आंकड़े बताते हैं कि देश में विधायकों पर हर साल लगभग 1100 करोड़ तथा सांसदों पर लगभग 30 अरब रुपये खर्च होते हैं।

यह उस देश के माननीयों के जलवे हैं जहां महज 600 रुपयों की सामाजिक सुरक्षा पेंशन से गुजारे करने के लिए लाखों लोग रोज दफ्तरों का चक्कर काटते, गिड़गिड़ाते देखे जाते हैं। वहीं अभी सरकारी कर्मचारी अपनी एक पेंशन के फेर में ओपीएस यानी पुरानी पेंशन और एनपीएस यानी नई पेंशन योजना के गुणाभाग में ही उलझा हुआ किसी निष्कर्ष नहीं पहुंच पा रहा है।

वहीं सांसदों को 1976 में 300 रुपये मिलने वाली पेंशन 1985 में 500 रुपये, 1993 में 1400 रुपये, 1998 में 2500 रुपये, 2001 में 3000 रुपये, 2006 में 8000 रुपये, 2010 में 20,000 रुपये और 2018 में 25,000 रुपये कर दी गई है।

जबकि कर्मचारी अपने अंशदान से अपने हक के खातिर लड़ रहे हैं, भ्रमित हैं। हैरानी की बात है कि इसका विरोध शायद ही कभी जोरदार तरीके से सुनने को मिला हो सिवाए हालिया पंजाब विधान सभा में आप विधायकों की मांग के।

इसमें आप विधायकों ने एक से अधिक बार विधायक बनने वाले विधायकों या पूर्व विधायकों की एक से अधिक पेंशन का विरोध कर वेतन वृद्धि के नाम ऐसे वित्तीय लाभों को नैतिक और सैद्धांतिक रूप से गलत बताया। विधायक को भी एक सरकारी कर्मचारी समान एक पेंशन दी जानी चाहिए, चाहे वह कितनी भी बार विधायक क्यों न रहा हो।

अगले विधानसभा सत्र में सबकी सहमति से एक से अधिक पेंशन नियम को समाप्त करने की मांग के साथ सरकारी कर्मचारियों को पुरानी पेंशन बहाली की भी बात रखी है। आप पार्टी का मानना है कि सभी को समानता के सिद्धांत के अनुसार सुविधाएं प्रदान की जानी चाहिए।

लगता नहीं कि माननीय मुफ्त की तमाम सुविधाओं और भरपूर पेंशन के हकदार हैं? जनसेवा के लिए खुद से आगे आए जनप्रतिनिधि ही खुद क्यों नहीं सोचते कि वो पेशे के लिए नहीं सेवा खातिर आए हैं! सच में माननीयों की पेंशन, कर्मचारियों की पेंशन के बीच अदनी सी सामाजिक सुरक्षा पेंशन की खातिर गरीब और फटा हाल आम आदमी धूप, बारिश में मीलों चलकर दफ्तरों, बैंकों के चक्कर लगाता और लौट जाता है। काश माननीयों की सदन में उन्हें बनानी वाली ईमानदार आहुतियों की भी चिंता की जाती।


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