Thursday, April 25, 2024
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पक्षी प्रवास को क्यों जाते हैं?

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पक्षियों में एक बात सबसे विचित्र पाई जाती है कि ये हजारों की संख्या में दल बनाकर प्रवास पर जाते हैं। प्रवास का अर्थ है यात्र पर जाना या दूसरे स्थान पर जाना किंतु उनका यह प्रवास केवल अपने देश में सीमित नहीं होता वरन् सुदूर विदेशों तक होता है।

अध्ययन से यह पाया गया है कि भारत देश के पक्षी लगभग 10,000 किलोमीटर का सफर तय करके रूस के निकट साइबेरिया पहुंचते हैं और इसी प्रकार उस देश के पक्षी भारत में आते हैं। जो पक्षी विदेशों से भारत में आकर सर्दियां गुजारते हैं, वे उत्तरी एशिया, सोवियत रूस और उसके कजाकिस्तान तथा पूर्वी साइबेरिया से यहां आते हैं। 2,000 से 5,000 किलोमीटर की दूरी तो ये आसानी से उडकर पार कर लेते हैं, यद्यपि इसमें समय इन्हें काफी लगता है।

फिर भी यह बहुत आश्चर्यजनक है कि समुद्री और दुर्गम रेगिस्तानी प्रदेशों को ये कैसे पार कर लेते है क्योंकि इन खतरों और सब दृष्टि से कठिन स्थानों को वायुयान से पार करने में भी मनुष्य हिचकिचाते हैं। फिर ये पक्षी इसे कैसे पार कर लेते हैं जबकि ये पक्षी आकार में बहुत बड़े भी नहीं होते। इनमें गेहवाला जैसी छोटी चिड़िया और छोटे-छोटे परिन्दे भी सम्मिलित हैं।

हमारे देश में मंगोलिया से आकर सर्दियां गुजारने वाले पक्षी तथा मंगोलिया में जाकर गर्मियाँ गुजारने वाले पक्षी हंस, दोनों देशवासियों को आश्चर्य में डाल देते हैं। इसी प्रकार भारत का सुप्रसिद्ध पक्षी राजहंस भारत में सर्दियां गुजारता है किंतु वह तिब्बत जाकर मानसरोवर झील के किनारे अण्डा देता है। सब पक्षियों का यह चित्र-विचित्र स्वभाव देखकर पक्षी-विज्ञान के विशेषज्ञ भी आश्चर्यचकित रह जाते हैं।

पक्षी प्रवास पर क्यों जाते हैं, इसके दो कारण माने जाते हैं-1. जलवायु परिवर्तन; 2. उनकी अपनी स्वाभाविक प्रवृत्ति किंतु पक्षियों को यह कैसे ज्ञात हो जाता है कि अब उन्हें दूसरे देश चल देना चाहिए? और वे रास्ता कैसे पहचान जाते हैं? जाते या आते समय रास्ता कैसे याद रखते हैं? आदि अनेक प्रश्न बहुत ही कठिन हैं। इनका उत्तर यह दिया जाता है कि ये सब बातें पक्षियों की शारीरिक बनावट और मौसम परिवर्तन से संबन्धित हैं जिससे वे अपने परम्परागत गुणों के कारण जन्म से ही परिचित होते हैैं। ऐसा माना जाता है कि पक्षियों की किसी भी जाति का जीवन-काल करीब 20 लाख साल का होता है।

इस प्रकार यह स्पष्ट है कि वे अपने इतने वर्षों के गुणों व स्वाभाविक प्रवृत्तियों से उपरोक्त सब बातें अनायास जान लेते हैं और प्रवास पर चल पड़ते हैं। दूसरे परिदों के शरीर से निकलने वाले हारमोन ही इन्हें ऋतु-परिवर्तन पतझड़ में दिनों के छोटे होने, वसन्त में बड़े होने आदि की सूचना दे देते हैं। जब वे प्रवास में रहते हैं या यात्र करते हैं, तब सूर्य ही उनका प्रमुख दिशा-सूचक यंत्र होता है। कौन-सा ज्ञान तन्तु इस कार्य में उनकी मदद करता है, यह बात वैज्ञानिक अभी नहीं जान पाए हैं किंतु यह जान लिया गया है कि रात में उड़ने वाले पक्षी, नक्षत्रों का उपयोग दिशा-सूचक के रूप में करते हैं। यह तथ्य बहुत ही आचर्श्यजनक है।

पक्षी प्रवास पर जाते समय अपने शरीर को प्राकृतिक रूप से उस योग्य बना लेते हैं, यह भी कम आश्चर्यजनक नहीं है। देखा गया है कि प्रवासी बत्तख के वजन में, वसन्त ऋतु में भारत में प्रस्थान करते समय लगभग 150 ग्राम की वृद्धि हो चुकी थी। जब बर्फीले प्रदेश में भालू और सियार (परिस्थितिवश ही) शीत-निद्रा को जाते हैं तो वे अपने शरीर की चर्बी कई महीने पहले से बढ़ाना शुरू कर देते हैं। मेंढक भी शीत-निद्रा को जाते हैं और इसके पहले वे खूब खा-पीकर मोटे-ताजे हो जाते हैं। लोमड़ी तो अपनी गुफा में महीनों पहले से भविष्य के लिए मांस आदि इक्कठा करना शुरू कर देती है जो बर्फ और ठण्ड के कारण महीनों खराब नहीं होता व उनके काम में आता है।

दूसरे, इस समय भोजन न मिलने पर उनके शरीर की बढ़ी हुई चर्बी, जो धीरे-धीरे जलती रहती है, उन्हें जीवनदान देती रहती है। इस प्रकार शीतनिद्रा व प्रवास के लिए जाते समय पशु-पक्षी स्वाभाविक रूप से अपने शरीर को विकट परिस्थितियों के लायक बना लेते हैं।

पशु-पक्षियों का अध्ययन करने वाले वैज्ञानिक अभी तक यह ज्ञात नहीं कर पाए हैं कि पक्षियों के प्रवास का मार्ग कौन-सा होता है? उनके उड़ान भरने का निश्चित समय कौन-सा है? पड़ाव वे किस-किस स्थान पर करते हैं। क्या वे हर वर्ष प्रवास का मार्ग बदल देते हैं? आदि। दूसरे, इस काम में दो देशों जिस देश से पक्षी प्रवास पर निकले हैं तथा जिस देश में पहुंचेंगे, के पक्षी-वैज्ञानिकों का सहयोग व योजना नितान्त आवश्यक होती है। अभी इसका उतना विकास नहीं हो पाया है।

किंतु वैज्ञानिक यह कैसे जान लेते है कि ये पक्षी प्रवासी हैं? इसके लिए एक वैज्ञानिक तरीका इन वैज्ञानिकों ने खोज निकाला है, वह है पक्षियों के पैर में चिन्हित अल्युमीनियम का छल्ला डालना। धातु के ये छल्ले दो मिलीमीटर से लेकर 19 मिलीमीटर तक बड़े होते हैं। छोटे छल्ले छोटे पक्षियों के पैर में तथा बड़े छल्ले बड़े पक्षियों के पैर में पहनाये जाते हैं। पूरी तरह बन्द न होने वाले ये छल्ले पक्षियों की टांगों में आसानी से पहनाये जा सकते है।
पक्षियों को छल्ला पहनाने से यह ज्ञात हो जाता है कि कहां से कहां तक उडकर आए हैं व कहां लौटे हैं। यह खोज व शोध की नवीन पद्धति है जो अत्यन्त रोचक भी है।

हमारे देश में ‘बम्बई नेचुरल हिस्ट्री सोसायटी’ एक महत्त्वपूर्ण संस्था है, जो पशु-पक्षियों के अध्ययन का कार्य करती है। यह संस्था प्रवासी पक्षियों को आधुनिक जालों और कोहरा जाल (मिस्ट नेट) आदि से पकडकर ये छल्ले उनके पांवों में डालती है। इस पर ‘इन्फार्म बाम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसायटी लि.’ अर्थात यहां पक्षी कहां, कब, किस देश में, किस दशा में मिला, इसकी सारी जानकारी उक्त संस्था को दीजिए, यह निवेदन लिखा होता है। वैज्ञानिक ऐसे प्रवासी पक्षी का सारा विवरण लिखकर इस संस्था को भेजते हैं।

इसी प्रकार विदेशों में भी अनेक संस्थाएं हैं जो पक्षियों को छल्ले पहनाती हैं तथा अपने देश में मिलने वाले पक्षियों की सूचना सम्बन्धित देश को भेजती हैं। इससे यह बात बहुत आसानी से जान ली जाती है कि कौन-से पक्षी किस देश के हैं, तथा वे किस-किस देश तक प्रवास के लिए जाते हैं। यह कार्य बहुत ही नाजुक प्रकार का होता है, किंतु अत्यधिक रोचक और ज्ञानवर्धक भी होता है। पक्षियों के प्रवास का यह क्र म अनिश्चित-सा है, ऐसा कदापि मत मान लीजिएगा।

इसमें एक निश्चितता है और उसके पीछे वैज्ञानिक कारण है। जिस प्रकार गर्मियों में हम ठण्डे स्थान पर जाते हैं उसी प्रकार ठिठुरती ठण्ड से बचने के लिए पक्षी अपेक्षाकृत गर्म स्थानों पर जाते हैं। बहुधा इनकी यात्रएं जाड़े के दिनों में उत्तर दिशा से दक्षिण दिशा की ओर, और भयंकर गर्मी के दिनों में दक्षिण दिशा से उत्तर दिशा की ओर होती है। जाड़े के दिनों में उन्हें वहां ठण्ड के अलावा, भोजन-पानी की समस्या भी सताती है, अत: वे दक्षिण की ओर जाते हैं। गर्मी के दिनों में उन्हें भोजन और पानी तथा तापमान की समस्या सताती है, इसलिए ये उत्तर की ओर जाते हैं।

जब ये वापस आते हैं तो अपने ही घोंसलों को ठीक-ठाक कर कामों में लाने की तैयारी करते हैं। ये अपने ‘घर’ वापस कैसे आते हैं। यह आज भी रहस्यमय बना हुआ है, ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार ‘कबूतर’ कैसे अपने घर लौट आता है?

ललित नारायण उपाध्याय


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