Wednesday, January 28, 2026
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सोना क्यों हो रहा असामान्य महंगा

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पिछले कई महीनों से सोने की कीमतों में असामान्य वृद्धि देखी जा रही है। आजकल लगन के दिनों में सोने के आभूषणों की मांग बढ़ जाती है। वर-वधू पक्ष के बीच सोने के आभूषण का अदान प्रदान होता है। इन दिनों सोने कीमतों में इतना उछाल है कि यह आम वर्ग की खरीददारी हैसियत से बाहर होती जा रही है। इंडियन बुलियन एण्ड ज्वेलर्स एसोसिएशन के आंकड़ों के अनुसार, पटना के सर्राफा बाजार में सोमवार को 24 कैरेट सोना 1,320 रुपए की छलांग लगा कर दो सप्ताह के उच्चतम स्तर 1,26,530 रुपए प्रति दस ग्राम के पार चला गया। वहीं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर, पिछले कई वर्षों से सोने के भावों में उछाल आता रहा है। वर्ल्ड गोल्ड कौंसिल के आंकड़ों के अनुसार वित्तीय वर्ष 2020 में सोने की कीमत लगभग 1,462 डॉलर प्रति औंस थी, जो 2024 में बढ़कर 1,988 डॉलर हो गई। 2025 में इसकी कीमतें और उछलीं और यह बढ़कर 2,594 डॉलर प्रति औंस हो गई। मौजूदा वर्ष यानी 2025 में इसने तो औसतन 3,465 डॉलर प्रति औंस के आंकड़े को भी पार कर लिया है। हाल के दिनों में तो बढ़ोतरी और भी असाधारण रही। अप्रैल 2025 में करीब 3,207 डॉलर प्रति औंस था, जो कि अक्टूबर में बढ़कर 4,053 डॉलर प्रति औंस तक पहुंच चुका है ।

सोने के बढ़ते दाम आमजन पर बोझ तो बढ़ाते हैं ही, साथ में मंहगाई का गणित भी बिगाड़ देते हैं। कीमतों में भारी उतार-चढ़ाव से मूल्य सूचकांक भी प्रभावित होता है, और कभी-कभी मूल्य-स्तर की सही तस्वीर भी गड़बड़ा जाती है। हालांकि उपभोक्ता मूल्य सूचकांक की गणना में सोने के भावों को अधिक भार नहीं दिया गया है, सूचकांक में सोने का भार 1.08 प्रतिशत है। लेकिन कीमतों में भारी उतार चढ़ाव सूचकांक को प्रभावित जरूर करता है। मिसाल के तौर पर पिछले साल की शुरूआत में इस धातु की मंहगाई में हिस्सेदारी 0.10 प्रतिशत के आसपास थी, वहीं मंहगाई के ताजातरीन आंकड़ों में इसका योगदान .90 हो गया है। यानी मंहगाई की वृद्धि में सोने का योगदान पहले के मुकाबले नौ गुने से भी अधिक बढ़ गया। इसकी वजह से कोर मुद्रास्फीति की गणना पर भी असर पड़ा। नतीजतन ऐसी नीतियाँ या आर्थिक निर्णय जिनका दारोमदार मूल्य सूचकांक पर होता है, वे प्रभावित होते हैं। इसीलिए सोने के दामों में भारी वृद्धि मौद्रिक नीति के तहत रेपो रेट तय करते समय एक दुविधा पैदा कर सकता है।

हाल ही में भारतीय स्टेट बैंक के आर्थिक अनुसंधान विभाग की ओर से जारी रिपोर्ट ‘कमिंग आफ ए ट्रबलंट एज : द ग्रेट ग्लोबल गोल्ड रश’ के अनुसार भारत में सोने की कुल उपभोक्ता मांग 802.8 है। यह वैश्विक सोने की मांग का 26 प्रतिशत है, जिससे भारत 815.4 टन की उपभोक्ता मांग के साथ चीन के बाद दूसरे स्थान पर आ गया है। भारत में सोने की घरेलू आपूर्ति कुल सोने की आपूर्ति बहुत कम हिस्सा है, बाकी आपूर्ति आयात से होती है। वर्ल्ड गोल्ड कौंसिल के अनुमान के अनुसार 2024 में कुल आपूर्ति में आयात का योगदान लगभग 86 प्रतिशत है।

कौंसिल का अनुमान है कि 2025 तक कुल मांग 600 से 700 टन के बीच होगी। बढ़ी हुई कीमतों का सीधा असर सोने की मांग पर पड़ा है। मौजूदा वित्तीय वर्ष की की तीसरी तिमाही में भारत की सोने की माँग 209.4 टन थी, जो पिछले वर्ष की तुलना में 16 प्रतिशत कम है, और आभूषणों की मांग में 31 प्रतिशत की गिरावट के कारण है। इसी काल में यानी तीसरी तिमाही में आयात 37 प्रतिशत घटकर 194.6 टन रह गया, जबकि 2024 वित्तीय वर्ष के लिए कुल आयात 712.1 टन था। चूँकि अब शादी का सीजन चल रहा है, इसलिए नवंबर-दिसंबर में सोने के आयात में तेजी से बढ़ने की सम्भावना है। पिछले सात महीनों में कुल आयातित वस्तु आयातों में सोने का हिस्सा करीब 9 फीसदी रहा है।

सोने की कीमतें बढ़ने का मुख्य कारण डॉलर के मूल्य में उतार-चढ़ाव है। मौजूदा भूराजनीतिक माहौल भी डॉलर की मजबूती को प्रभावित कर रहा है। यूक्रेन युद्ध के बाद से डॉलर अस्थिर रहा है। सोने और डॉलर की कीमतों के बीच उल्टा संबंध है, डॉलर कमजोर होता है तो सोना मजबूत होता है। वर्तमान धारणा है कि अगर अमेरिकी फेड दरें घटाएगा, तो डॉलर और कमजोर होगा, जिससे सोने की कीमत और भी बढ़ेगी। लेकिन यदि फेड दरें कम करने में धीमा रहा तो डॉलर मजबूत रहेगा और सोना स्थिर हो सकता है। गौरतलब है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में डॉलर भी एक कारोबारी जिन्स सरीखा है। यह वायदा बाजार का भी हिस्सा है, जिसमें निवेशक पैसा लगाते हैं। मौजूदा समय में निवेशकों और सट्टेबाजों ने कमजोर डॉलर के आधार पर फ्यूचर्स मार्केट में जो पोजीशन ली है, उससे सोने की कीमतें बढ़ रही हैं।

ये निवेशक भले ही वायदा बाजार में वास्तविक ‘डिलीवरी’ न लें और ‘स्क्वायर आॅफ’ करें, जो कि वे करते हैं, लेकिन इससे कीमतों में गति जरूर आ जाती है। आज के वैश्विक परिदृश्य में वित्तीय निवेश तंत्र और मुद्रा में लोगों का भरोसा तो घट ही रहा है। वहीं दुनियाभर के केंद्रीय बैंकों ने भी अपने जोखिम का विविधीकरण भी कर रहे हैं। वे अपने विदेशी मुद्रा भंडार को किसी एक मुद्रा पर अत्यधिक निर्भरता को कम करने की दिशा में बढ़ रहे हैं। इसको ‘डि-डॉलराइजेशन’ कहा जाता है। केंद्रीय बैंक सोने की ज्यादा खरीदारी कर रहे हैं, इससे सोने की कीमतों में तेजी आई है।

चीन और भारत पूरी दुनिया के दो सबसे बड़े सोने के खरीददार या उपभोक्ता है। अब जबकि इसकी कीमत बढ़ रही है, लोगों में प्रत्याशा है कि आने वाले दिनों में कीमत और बढ़ेगी। इसलिए लोग प्रत्याशा में सोना खरीद रहे हैं कि कीमत और बढ़ेगी। हालांकि यह भौतिक मांग है, लेकिन यह भी सोने की कीमतों को ऊपर ढकेलती है। आजकल लोगों का रुझान निवेश में बढ़ा है। सोने में निवेश अन्य वित्तीय इंस्ट्रूमेंट्स की अपेक्षा ज्यादा सुरक्षित और अधिक रिटर्न वाला माना जाता है। और इसके लिए गोल्ड ईटीएफ या ई-गोल्ड बेहतर विकल्प है। निवेश भले ही ई-गोल्ड के नाम पर हो लेकिन इसमें भी अनिवार्य रूप से अपनी 70 से 80 फीसदी परिसंपत्तियां भौतिक सोने में रखनी होती हैं। इससे भी कीमतों में वृद्धि होती रही है।

हालिया वैश्विक परिदृश्य में ट्रंप के टैरिफ का झटका तो है ही, लेकिन वैश्विक बाजार ने अपने आपको इस स्थिति से उबार लेने की कोशिश में है। वहीं अमेरिकी अर्थव्यवस्था अनिश्चितता के दौर से गुजर रही है। दुनिया की कई अर्थव्यवस्थाएं डि-डॉलराइजेशन के रास्ते पर चल पड़ी हैं। औपचारिक वित्तीय निवेश तंत्र और मुद्रा में लोगों का भरोसा घट रहा है। इन हालात में सोने की कीमतों के तेजी कम होने की संभावना फिलहाल कम है।

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