
क्या भारत सरकार अंदरूनी तौर पर गहरी चिंता से ग्रस्त है? और क्या पड़ोसी देशों में हाल में हुए जन विद्रोह और उससे बहुचर्चित हुई जेन-जी परिघटना ने उसकी चिंताओं को और बढ़ा दिया है? वैसे तो हाल में आई अनेक छिटपुट खबरों से ऐसे संकेत मिल रहे थे, मगर ‘राष्ट्रीय एकता दिवस’ यानी 31 अक्टूबर को राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोवाल के एक भाषण ने इसे कुछ और स्पष्ट किया है। सरदार पटेल स्मारक भाषण देते हुए डोवाल ने कई अहम बातें कहीं, जिनके अर्थ को समझना महत्त्वपूर्ण हो जाता है। तो आरंभ में हम उनमें से कुछ प्रासंगिक बातों की चर्चा कर लेते है:
डोवाल ने कहा, लोकतंत्र ने खुद को शासन की सबसे प्रभावशाली और टिकाऊ प्रणालियों में से एक साबित किया है, लेकिन उसने अपने साथ कुछ समस्याएं भी पैदा की हैं। लोकतंत्र दलगत राजनीति को जन्म देता है, जिससे समाज में विभाजन होता है। विभाजन एक विचित्र प्रक्रिया है। अगर 100 लोग हैं और मेरे पास 25 लोगों का समर्थन है, तो मैं सत्ता में आ सकता हूं, अगर मैं बाकी 75 लोगों को ऐसे समूहों में बांट दूं, जो प्रत्येक 20 से कम हों। यहां प्रयास 51 का समर्थन हासिल करने का नहीं होता- बल्कि शेष समाज को जितने अधिक टुकड़ों में बांटा जा सके, उतनी कोशिश की जाती है। यह विभाजन खतरनाक है।
लोकतंत्र में धन का एक अहम रोल बन जाता है। चाहे वह वैध हो या अवैध, कानूनी रूप से स्वीकृत हो या नहीं- तथ्य यह है कि धन की बड़ी भूमिका होती है। आदर्शवाद, दृष्टि, विचार और देशभक्ति भी तभी प्रासंगिक होते हैं, जब उसे धन का मजबूत समर्थन मिले। अक्सर ऐसा होता है कि राष्ट्रीय हित पर निहित स्वार्थी हित हावी हो जाते हैं। और जब मैं स्वार्थी हित कहता हूं, तो मेरा आशय किसी भ्रष्ट या अनैतिक व्यक्ति से नहीं है- बल्कि उन संकीर्ण, स्थानीय हितों से है, जो व्यापक राष्ट्रीय हित को शायद कम महत्व देते हैं। तो हम इसका मुकाबला कैसे कर सकते हैं। इसके लिए हमें अपने कानूनों, नियमों, प्रक्रियाओं आदि पर ध्यान देना होगा और उन्हें अधिक जनोन्मुखी बनाना होगा। हमारी नीतियां और योजनाएं ऐसी हों, जो लोगों की आकांक्षाओं को पूरा करें। लोगों की मूलभूत आवश्यकताओं पर ध्यान दिया जाना चाहिए और उन्हें सुरक्षा की भावना प्रदान की जानी चाहिए।’
मोदी सरकार की सफलताओं का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि आतंकवाद पर पूरा नियंत्रण पा लिया गया है- इसका अपवाद सिर्फ जम्मू-कश्मीर है, जो असल में पाकिस्तान के प्रॉक्सी वॉर का शिकार है। डोवाल ने कहा कि इतना कुछ करने के बाद भी मोदी सरकार के कामकाज को लेकर नकारात्मक धारणाएं बनी हैं। इस सिलसिले में उन्होंने कई वैश्विक सूचकांकों का जिक्र किया। कहा कि भारत की वैश्विक रैंकिंग कई क्षेत्रों में कमजोर है, जो भारत की वास्तविक क्षमताओं और उपलब्धियों को प्रतिबिंबित नहीं करती। इस सिलसिले में उन्होंने जिन सूचकांकों का जिक्र किया, उनमें ग्लोबल डेमोक्रेसी इंडेक्स, प्रेस फ्रीडम इंडेक्स, गवर्नेंस इंडेक्स आदि शामिल हैं। डोवाल ने इसी क्रम में श्रीलंका, नेपाल और बांग्लादेश की घटनाओं का उल्लेख किया। उन्होंने इन देशों में गैर-संवैधानिक ढंग से हुए सत्ता परिवर्तन को ‘खराब शासन’ का परिणाम बताया। फिर कहा कि दूसरे विश्व युद्ध के बाद के काल में 37 देशों में से 28 का पतन या विखंडन खराब शासन के कारण हुआ है। कहा कि कोई भी शक्ति उस राष्ट्र की रक्षा नहीं कर सकती, जहां लोग शासन में विश्वास खो देते हैं। यानी यह महत्त्वपूर्ण है कि लोगों की धारणाएं सकारात्मक बनी रहें। शासकों में लोगों का भरोसा बना रहे। लोगों में यह उम्मीद बनी रहे कि उनका जीवन आगे चल कर बेहतर होगा। जब ऐसा नहीं होता, तो लोग उद्वेलित हो जाते हैं और फिर जैसाकि राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार ने कहा- ‘कोई भी शक्ति उस राष्ट्र की रक्षा नहीं कर सकती।’
अजित डोवाल राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार हैं और इस लिहाज से वे मौजूदा सरकार में ऊंची हैसियत रखते हैं। मगर उनकी अहमियत शायद इससे भी कहीं ज्यादा है। समझा जाता है कि वे वर्तमान केंद्र सरकार के सर्व-प्रमुख नीति निमार्ताओं एवं रणनीतिकारों में शामिल हैं। इसलिए मोदी सरकार की ‘सफलताओं’ में उनका प्रमुख योगदान है, मगर इन ‘सफलताओं’ के बावजूद धारणाएं नकारात्मक बनी हैं, जो उसकी जवाबदेही भी उन पर आएगी। इन धारणाओं का अभी भारत में कितना प्रसार और प्रभाव है, इसका कोई ठोस आकलन हमारे पास नहीं है।
राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार के पास संभवत: इस बारे में पर्याप्त जानकारी और ठोस आकलन होगा। तो क्या उन्हें ऐसा अहसास हुआ है कि ‘नकारात्मक धारणाएं’ इस मुकाम तक पहुंच चुकी हैं कि अब उनको लेकर सार्वजनिक रूप से आगाह करना जरूरी हो गया है? अगर ऐसा है, तो क्या ये धारणाएं सिर्फ नकारात्मक विमर्श से बनी हैं अथवा इनके बनने की ठोस स्थितियां भी समाज में मौजूद हैं? ये सवाल इसलिए अहम हैं, क्योंकि एक दूसरी धारणा यह है कि वर्तमान सरकार ने सत्ता में आने के बाद से जमीनी स्थितियां बेहतर करने के बजाय मीडिया हेडलाइन्स को मैनेज करने में ज्यादा दिलचस्पी ली है, ताकि धारणाएं सकारात्मक बनी रहें। ऐसी राय मोदी सरकार के सत्ता में आने के साल भर बाद ही बनने लगी थी। तब पूर्व केंद्रीय मंत्री और पत्रकार अरुण शौरी ने एक इंटरव्यू में दो टूक कहा था- ‘यह सरकार नीतियों से ज्यादा चिंतित सुर्खियों में रहने को लेकर रहती है।’ (सरकार की आर्थिक नीति दिशाहीन, अल्पसंख्यक चिंतित :अरुण शौरी-इंडिया टीवी हिन्दी)
प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में 2014 में नरेंद्र मोदी ने ‘अच्छे दिन’ लाने का वादा किया था। तब समझा गया था कि इसके जरिए उन्होंने ‘अतिरिक्त’ वोट जुटाए। हिंदुत्व समर्थक वोटरों के पक्के समर्थन के साथ जब ये वोट मिले, तो उससे मोदी के नेतृत्व में भाजपा की जीत का रास्ता साफ हुआ। तब से सांप्रदायिक एजेंडे को अधिक तीव्रता देना भाजपा की रणनीति रही है, जिससे हिंदुत्व समर्थक वोट आधार का (संभवत:) विस्तार हुआ है। 2024 के आम चुनाव से पहले तक धारणा थी कि प्रत्यक्ष नकदी एवं अन्य लाभ हस्तांतरण, विकास की कहानियों, और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत बढ़े प्रभाव के नैरेटिव ने (शायद) ‘अतिरिक्त’ आधार को भी बढ़ाया है- या कम-से-कम इस वोट आधार को क्षीण नहीं होने दिया है। मगर 2024 के लोकसभा चुनाव में कई राज्यों में भाजपा को हुए नुकसान से ‘अतिरिक्त’ वोट के बिखरने की चर्चा को बल मिला। उसके बाद से घटनाक्रमों ने जो मोड़ लिया है, उससे विकास एवं विश्व शक्ति बनने की कहानियों पर आंच गहराती गई है।
नीतिकारों को समझना यह होगा कि वैश्विक सूचकांक बनाने वालों की भारत से कोई दुश्मनी नहीं है। उनके सूचकांकों पर भारत की कमजोर सूरत दिखती है, तो उसकी वजहें देश के अंदर छिपी हुर्इं हैं। ये सूचकांक आईना हैं, जो जैसा चेहरा है, वैसा दिखाते हैं। तो बेहतर यह होगा कि आईने को कोसने के बजाय चेहरे को बेहतर करने की कोशिश की जाए!

