Friday, January 23, 2026
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परिवार नियोजन का बोझ उठातीं महिलाएं

यूं तो परिवार नियोजन किसी भी समाज और परिवार के स्वास्थ्य के लिए अनिवार्य है। भारत सहित दुनिया के कई देशों में जनसंख्या नियंत्रण के लिए नसबंदी को सबसे प्रभावी स्थायी समाधान माना जाता है, लेकिन जब हम देश और प्रदेश में नसबंदी के आंकड़ों और सामाजिक स्वीकार्यता को देखते हैं, तो इसमें एक गहरा लैंगिक भेदभाव उभर कर सामने आता है। यह विडंबना है कि जैविक रूप से पुरुष नसबंदी अधिक सरल, सुरक्षित और कम खचीर्ली है, फिर भी नसबंदी का लगभग पूरा बोझ महिलाओं के कंधों पर डाल दिया गया है। ऐसा करके इस समाज ने परिवार नियोजन की पूरी जिम्मेदारी महिलाओं पर ही डाल दी है।

आधुनिक जमाने में भी ऐसा हो रहा है। आखिर क्यों? बड़ा सवाल है कि क्या समाज व परिवार कल्याण की जिम्मेदारी केवल महिलाओं की ही है। देश में परिवार नियोजन के लिए नसबंदी के आंकड़े एक महत्वपूर्ण लैंगिक असंतुलन दिखाते हैं। महिलाओं द्वारा नसबंदी करवाने की दर पुरुषों की नसबंदी की तुलना में काफी अधिक है। यह अंतर विभिन्न सामाजिक और सांस्कृतिक कारकों का परिणाम है, जो परिवार नियोजन को लेकर पुरुषों और महिलाओं की भूमिकाओं को प्रभावित करते हैं। अगर हम इसके कारणोंं में जाते हैं, तो देखते हैं कि कई समाजों में परिवार नियोजन की जिम्मेदारी मुख्य रूप से महिलाओं की मानी जाती है। पुरुषों पर परिवार नियोजन के तरीकों को अपनाने का सामाजिक दबाव कम होता है।

पुरुषों को नसबंदी के लाभों और प्रक्रिया के बारे में पर्याप्त जानकारी नहीं होती है या वे इससे जुड़े मिथकों और गलत धारणाओं के कारण इसे अपनाने से हिचकिचाते हैं। हालांकि पुरुष नसबंदी एक सरल प्रक्रिया है, लेकिन कभी-कभी पुरुषों के लिए उपलब्ध सेवाओं की जानकारी या पहुंच सीमित हो सकती है। कुछ सांस्कृतिक मान्यताओं में पुरुष नसबंदी को मर्दानगी या यौन क्षमता से जोड़कर देखा जाता है, जो पुरुषों को इसे अपनाने से रोकता है, जबकि यह गलत है। नसबंदी से पुरुषों की यौन क्षमता पर कोई असर नहीं पड़ता है। परिवार नियोजन कार्यक्रमों में अक्सर महिलाओं को प्राथमिक लक्ष्य समूह के रूप में देखा जाता है, जिससे पुरुष नसबंदी को बढ़ावा देने पर कम जोर दिया जाता है। यह लैंगिक असमानता महिलाओं पर परिवार नियोजन का अतिरिक्त शारीरिक और मानसिक बोझ डालती है।

यह समझना महत्वपूर्ण है कि परिवार नियोजन एक युगल की साझा जिम्मेदारी है और दोनों भागीदारों की सक्रिय भागीदारी से ही एक स्वस्थ और न्यायसंगत समाज का निर्माण संभव है। यह काम सरकारों का है, लेकिन सरकारें भी इसके प्रति गंभीर नहीं होती हैं। वे भी महिलाओं की नसबंदी को लेकर ही अधिक योजनाएं बनाती हैं। पुरुष नसबंदी को लेकर जो भी योजनाएं बनाई जाती हैं, वह धरातल पर नहीं उतरती। आंकड़े बताते हैं कि देश में लगभग 38 फीसदी महिलाएं नसबंदी को अपनाती हैं, जबकि पुरुषों की भागीदारी मात्र 0.3 प्रतिशत है। इसका मतलब है कि हर 100 नसबंदी कराने वाले व्यक्तियों में 99 से अधिक महिलाएं होती हैं।

अगर राजस्थान की बात करें, तो यहां भी स्थिति चिंताजनक ही है। राजस्थान में यह लैंगिक अंतर राष्ट्रीय औसत से भी अधिक गहरा है। यहां 42.4 फीसदी महिलाएं नसबंदी करवाती हैं, जबकि पुरुषों की संख्या मात्र 0.2 प्रतिशत पर सिमट कर रह गई है। हाल ही में प्रदेश में कराए गए एक सर्वे के अनुसार, लगभग 39 प्रतिशत पुरुषों का मानना है कि गर्भ निरोधक का उपयोग केवल महिलाओं का काम है। यही सोच पुरुष नसबंदी की कम दर का प्रमुख कारण है। पुरुषों को नसबंदी के फायदों और गलत धारणाओं को दूर करने के लिए विशेष अभियान चलाया जाना चाहिए। पुरुष नसबंदी को अधिक सुलभ और आकर्षक बनाने के लिए विशेष क्लीनिक और परामर्श सेवाएं शुरू की जा सकती हैं। धार्मिक नेताओं और सामुदायिक प्रभावशाली व्यक्तियों को शामिल कर पुरुषों को परिवार नियोजन में भागीदारी के लिए प्रेरित किया जा सकता है।

देश और प्रदेश के आंकड़े यह भी साबित करते हैं कि परिवार नियोजन की साझा जिम्मेदारी के दावों के बावजूद जमीनी स्तर पर यह केवल महिलाओं का मुद्दा बनकर रह गया है। आज जब स्वास्थ्य सेवाएं बहुत हद तक उन्नत हो चुकी हैं, तब इस खाई को पाटने के लिए पुरुषों की भागीदारी बढ़ाना और उनकी मानसिकता में बदलाव लाना अनिवार्य है।

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