Saturday, March 14, 2026
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शिक्षक भर्ती में फंसे योगी

Samvad

KP MALIKआपसी मतभेद और कलह में उलझी भाजपा और उसकी मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व वाली सरकार एक नई मुसीबत में फंस गई है। इस मुसीबत के बीच एक और नई परेशानी करीब साढ़े चार साल पहले और करीब ढाई साल पहले शिक्षक पात्रता परीक्षा (टीईटी) के तहत शिक्षक भर्तियों को लेकर आ पड़ी है, जिसमें भाजपा नेताओं और उसके समर्थक दलों के ही नेताओं के बयान अब योगी सरकार के खिलाफ आ रहे हैं। इन बयानों में भाजपा के कथिक रूप से योगी विरोधी नेता सीधे-सीधे तो योगी सरकार की बुराई तो नहीं कर रहे हैं, लेकिन हाईकोर्ट के फैसले को सही बता रहे हैं। इस प्रकार से पेपर लीक की घटनाओं के बाद अब करीब ढाई साल पहले हो चुकी 68 हजार के करीब शिक्षक भर्तियों को लेकर हर कोई योगी सरकार पर ही अपना गुस्सा निकाल रहा है।

दरअसल, साल 2019 में उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने सरकारी स्कूलों में खाली पड़े शिक्षकों के पद भरने के लिए भर्तियां निकाली थीं और 1 जनवरी 2020 में 69 हजार भर्तियां की थीं और तकरीबन साढ़े चार साल से ज्यादा समय से ये 69 हजार शिक्षक सहायक शिक्षकों के रूप में सरकारी स्कूलों में पढ़ा भी कर रहे थे। फिर 5 जनवरी 2022 को 68 हजार सहायक शिक्षकों की लिस्ट योगी सरकार ने जारी की थी और ये शिक्षक पिछले ढाई साल से ज्यादा समय से बच्चों को पढ़ा रहे थे। लेकिन अब इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने सहायक शिक्षकों की भर्ती को सही प्रक्रिया के तहत न मानते हुए चयनित सभी 68 हजार अभ्यर्थियों की सूची को रद्द कर दिया है और तीन महीने के भीतर सही प्रक्रिया के तहत नई सूची बनाने का निर्देश दिया है।

हाईकोर्ट ने कहा है कि टीईटी में आरक्षण का लाभ लेने वाले अभ्यर्थियों को सामान्य श्रेणी का कट आॅफ मार्क्स पाने पर अनारक्षित वर्ग में रखा जाना उचित है, उन्हें आरक्षण में नहीं गिना जा सकता। इसलिए आरक्षित वर्गों को उनके हिस्से के आरक्षण के हिसाब से नियुक्त किया जाना चाहिए और सरकार सर्विस रूल्स 1981 के नियम 14 के तहत आरक्षण नियमों का पूरी तरह पालन करते हुए 90 दिन के भीतर नई लिस्ट जारी करे।

अब अगर योगी सरकार 68 हजार पदों पर भर्ती के लिए नई सूची जारी करेगी, जो कि उसे करनी ही पड़ेगी, तो पहले ही नियुक्त होकर नौकरी करने वाले सहायक शिक्षकों में से बहुतों की नौकरी छिन जाएगी और आरक्षण के तहत आने वाले उन अभ्यर्थियों को नौकरी मिलेगी, जिनकी भर्ती आरक्षण के तहत हो सकती थी। हाईकोर्ट ने अपने फैसले में ये भी साफ कर दिया है कि शिक्षकों की नई सूची बनाते समय अगर किसी नियुक्त सहायक शिक्षक पर विपरीत असर पड़ता है, तो मौजूदा सत्र का लाभ दिया जाए, ताकि बच्चों की पढ़ाई पर कोई असर न पड़े। लेकिन दूसरी तरफ जो सहायक शिक्षक नियुक्त हो चुके हैं और स्कूलों में पढ़ा रहे थे, वो नौकरी जाने के खतरे को लेकर हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। कहा जा रहा है कुछ शिक्षक हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट पहुंचने का मन बना चुके हैं।

जब उत्तर प्रदेश में भर्ती हुई थी तब योगी सरकार ने पिछड़ा वर्ग और एससी यानि अनुसूचित जाति के आरक्षण प्रक्रिया का पालन नहीं किया। और ओबीसी वर्ग को 27 फीसदी आरक्षण की जगह महज 3.86 फीसदी आरक्षण और एससी वर्ग के अभ्यर्थियों को 21 फीसदी की जगह महज 16.2 फीसदी आरक्षण दिया गया। जब इसे लेकर हंगामा शुरू हुआ तो सरकार ने आरक्षण देने में किसी भी प्रकार की गड़बड़ी से साफ-साफ इनकार करते हुए कहा कि 70 फीसदी अभ्यर्थियों का चयन आरक्षण वर्ग से हुआ है, जबकि ये सफेद झूठ था। इसी साल संसदीय कार्य मंत्री सुरेश खन्ना ने भी विधानसभा में झूठ बोला और कहा कि 69 हजार शिक्षकों की भर्तियों में 31 हजार 228 ओबीसी वर्ग से चयनित हुए हैं, जिसमें से 12 हजार 360 आरक्षित पदों पर भर्ती किए गए थे और 18 हजार 598 मेरिट के आधार पर ओबीसी के शिक्षक भर्ती किए गए।

इसी प्रकार जब ये मामला विधानसभा में उठा, तो संसदीय कार्य मंत्री सुरेश खन्ना ने एससी वर्ग भर्ती के बारे में भी सफाई देते हुए सरकार के कदम को उचित और न्यायकारी बता तो दिया, लेकिन पिछड़ा वर्ग और एससी वर्ग के नियुक्त न होने वाले अभ्यर्थियों ने आरोप लगाया कि योगी सरकार ने भर्ती प्रक्रिया में आरक्षण के तहत उन अभ्यर्थियों को धोखा दिया, जो मेरिट लिस्ट के हिसाब से नियुक्त हो सकते थे और इन दोनों आरक्षित वर्गों के एक बड़े हिस्से वाले पदों पर सामान्य वर्ग के अभ्यर्थियों को भर्ती कर दिया, क्योंकि अगर आरक्षण नियम का पालन करती, तो 48 से 50 हजार नियुक्तियां आरक्षित वर्गों के अभ्यर्थियों की होतीं।

बहरहाल, हाईकोर्ट ने 6800 अभ्यर्थियों की सूची खारिज करने के एकल कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा है और एकल पीठ के आदेश के खिलाफ दाखिल 90 विशेष अपीलों को भी एक साथ निस्तारित करते हुए पारित कर दिया है। दरअसल, हाईकोर्ट ने इस मामले में 13 अगस्त को ही फैसला सुना दिया था, लेकिन कोर्ट की वेबसाइट पर इसकी कॉपी 16 अगस्त को अपलोड की। इस संबंध में हाईकोर्ट ने 13 मार्च 2023 के एकल पीठ के आदेश को संशोधित करते हुए ये आदेश दिया है कि सामान्य श्रेणी के लिए निर्धारित मेरिट में आने पर आरक्षित वर्ग के अभ्यर्थी को सामान्य श्रेणी में ही माइग्रेट किया जाएगा।

अब हाईकोर्ट के फैसले का उत्तर प्रदेश सरकार में उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्या ने स्वागत करते हुए इसे ओबीसी वर्ग के हक में न्याय का फैसला बताया है। वहीं भाजपा के समर्थक दल के रूप में एनडीए का घटक दल और योगी सरकार में मंत्री ओमप्रकाश राजभर भी कह रहे हैं कि उन्होंने इस मुद्दे पर करीब चार बार मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से बातचीत की और मुख्यमंत्री ने माना कि अधिकारियों ने गलती तो की है। लेकिन यहां सवाल ये उठता है कि अगर योगी आदित्यनाथ ने गलती मानी, तो फिर विधानसभा में इसे क्यों नहीं माना?

एनडीए का ही हिस्सा और केंद्रीय मंत्री अनुप्रिया पटेल ने भी हाईकोर्ट कोर्ट के फैसले को सही ठहराने हुए इसे वंचित वर्गों के लिए न्यायिक फैसला बताया है। इस प्रकार से वो कई भाजपा और एनडीए के नेता योगी सरकार पर सवालिया निशान लगा रहे हैं, जो कहीं न कहीं मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की नीतियों और व्यवहार के खिलाफ हैं या सीएम योगी के खिलाफ मोदी-शाह के मोहरे के रूप में काम कर रहे हैं।

कहावत है कि जब बुरे दिन चल रहे हों, तो ऊंट पर बैठे आदमी को भी कुत्ता काट लेता है और ऐसा ही कुछ मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के साथ हो रहा है। जबसे लोकसभा चुनाव में 80 के टारगेट के बावजूद महज 33 सीटें उत्तर प्रदेश में भाजपा की आई हैं, तब से ही योगी के विरोधी खेमे के भाजपा नेता, खासतौर पर उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य कोई मौका न चूकते हुए खुलकर योगी के खिलाफ आवाज उठा रहे हैं और शिक्षक भर्ती मामले पर भी वो कुछ ऐसी ही भाषा बोल रहे हैं। इस प्रकार मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ न सिर्फ विपक्ष से घिरे हैं, बल्कि अपने ही दल के विरोधियों के खेमें से भी घिरे हैं।

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