- 600 एकड़ भूमि को लेकर पिछले 25 सालों से मेडा के साथ किसान का चला आ रहा विवाद
जनवाणी संवाददाता |
मेरठ: शताब्दी नगर योजना में किसान और मेरठ विकास प्राधिकरण के बीच 600 एकड़ भूमि को लेकर 25 सालों से विवाद चला आ रहा है। 1989 में मेरठ विकास प्राधिकरण ने शताब्दी नगर योजना की शुरुआत की थी। मेरठ विकास प्राधिकरण ने कंचनपुर घोपला, जैनपुर, रिठानी अच्छरौंडा आदि गांव में करीब 1700 एकड़ जमीन का किसानों से अधिग्रहण किया था। किसानों को मुआवजे की धनराशि भी दे दी गई थी, लेकिन मेरठ विकास प्राधिकरण अभी तक 600 एकड़ जमीन पर किसानों के कब्जा नहीं ले पाया हैं, जिसको लेकर विवाद चल रहा है।
आवंटियों को प्लाट आवंटित कर दिये गए हैं। ढाई दशक बाद भी आवंटियों को मेडा कब्जे नहीं दे पाया हैं। ऐसा तब है जब मेडा को आवंटी पूरा भुगतान कर चुके हैं, लेकिन ऐसे में मेडा की भूमिका पर बड़े सवाल उठ रहे हैं। आवंटी रेरा में भी गए, लेकिन मेडा अफसरों के यहां पर किसी की कोई सुनवाई नहीं हो रही हैं। आवंटी परेशान हाल हैं। क्योंकि जीवन भर की पूंजी मेडा से प्लाट खरीदकर लगा चुकी हैं। आवंटियों ने सपना देखा था मकान रहने के लिए मिलेगा, लेकिन ढाई दशक बाद प्लाट पर भी कब्जे नहीं मिले।
यही नहीं, मेडा ज्यादा परेशान होकर कोई आवंटी पैसा मांगता है तो उसे जितना पैसा जमा कराया, उस पर दो प्रतिशत ब्याज देकर वापस कर देती हैं, लेकिन किसी प्राइवेट बिल्डर के यहां पर आवंटियों ने प्लाट खरीदे होते तो जमीन में लगाई गयी धनराशि बीस गुना से भी ज्यादा हो चुकी होती। इस तरह से आवंटी मेडा के प्लाट खरीदकर खुद को ठगा महसूस कर रहे हैं। भविष्य में भी मेडा की कॉलोनियों को लेकर विश्वास कैसे करें? ये भी बड़ा सवाल हैं।
न्यू टाउनशिप तो मेडा ला रही हैं, लेकिन किसानों के साथ ये स्थिति पैदा हो गयी तो फिर से आवंटियों को लंबे समय के लिए जीवन भर की कमाई से हाथ शताब्दीनगर की तरह से धोना पड़ सकता हैं। इस विवाद को सुलझाने की दिशा में एक हजार मीटिंग हो चुकी हैं, लेकिन अफसरों ने अब तो इस दिशा से आंखें की मूंद ली हैं। किसान नेता विजयपाल घोपला का कहना है कि 2013 भूमि अधिग्रहण नई नीति के तहत किसानों को मुआवजा दिया जाए उस मांग को लेकर किसान आंदोलित हैं।
मेरठ विकास प्राधिकरण जमीन पर कब्जा नहीं ले पा रहा है। महत्वपूर्ण बात यह है कि इस जमीन का आवंटन भी मेरठ विकास प्राधिकरण आवंटियों को कर चुका हैं। 25 साल बाद भी जमीन पर कब्जा नहीं मिला पाने से मेडा के अफसरों की विफलता साफ झलक रही हैं। आवंटियों के सपने टूट गए हैं। आवंटियों की गाढ़ी कमाई तो लग गई, लेकिन प्लाटों पर आज तक कब्जे नहीं मिले। ढाई दशक का लंबा समय बीत गया, लेकिन शताब्दीनगर का विवाद अभी तक नहीं सुलझा हैं। कई सरकार आयी और चली गई,
लेकिन किसान और मेडा के बीच टकराव बढ़ता रहा। मेडा अफसर कहते है कि दो बार मुआवजा दे चुके। दोनों बार बढ़ाकर मुआवजा दिया। फिर भी जमीन पर कब्जा नहीं मिला। अब किसान कह रहे है कि नई जमीन अधिग्रहण नीति से मुआवजा दिया जाए। यदि नई नीति लागू होने से पहले कब्जा ले लिया जाता तो ठीक था, लेकिन अब तो नई नीति से ही किसान जमीन का मुआवजा लेने पर अडिग हैं। इसी वजह से ‘रार’ बढ़ रही हैं।
शताब्दीनगर योजना को लेकर किसानों और मेडा के बीच चल रहा विवाद नहीं सुलझ रहा है। विवाद की वजह है 600 एकड़ भूमि है। जमीन पर किसान कब्जा नहीं छोड़ रहे हैं, वहीं जमीन मेडा ने प्लाट के रूप में जमीन आवंटित कर दी है। आवंटियों को जमीन पर मेडा कब्जा नहीं दिला पा रहा है। आवंटी ‘रेरा’ में पहुंच गए हैं, मगर समाधान कुछ भी नहीं हो रहा है। इसी तरह का मामला यदि प्राइवेट बिल्डर का हुआ होता तो बिल्डर के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर अब तक जेल भेज दिया गया होता।
क्योंकि ये मामला मेरठ विकास प्राधिकरण से जुड़ा है, इसलिए तमाम अपराध माफ है। जो आवंटी है, वो तीन दशक से प्लाट खरीदकर मेडा के चक्कर लगा रहे हैं। जिंदगी भर की गाढ़ी कमाई मेडा में जमा करा दी, फिर भी घर का सपना अधूरा ही रहा। तीन दशक कम समय नहीं है, जो जवान थे, वो बुजुर्ग हो चुके हैं, फिर भी किराये के मकानों में रह रहे हैं। लंबे समय से किसान धरने पर बैठे हैं। समाधान कुछ भी नहीं हो रहा हैं।
आवंटियों ने कोर्ट में भी मुकदमा डाल दिया हैं। फिर भी कोई सुनवाई नहीं हुई। प्रशासन का तर्क है कि कई बार किसान मुआवजा ले चुके हैं अब और मुआवजा नहीं। यही वजह है कि तीन दशक से किसानों व प्रशासन के बीच जब भी जमीन पर कब्जा लेने की प्रक्रिया चलती है तो टकराव बन जाता है। आखिर इस टकराव को टालने की दिशा में कोई प्लानिंग क्यों नहीं की जा रही हैं? ये बड़ा सवाल है।

