Sunday, April 12, 2026
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लगातार जारी है आर्थिक बदहाली

 

Samvad


Vimal Shankar Singhकीचड़ में कमल खिलने से कीचड़ जैसे कमल नहीं हो जाता है वैसे ही देश और राज्यों में कमल खिलने से सामाजिक, राजनैतिक और आर्थिक दशाएं खिल गई हों ऐसा पी चिदंबरम जी नहीं मानते हैं। पूर्व केंद्रीय मंत्री ने अभी हाल में एक लेख में कहा है कि हमें एनडीए सरकार की इस चालाकी की प्रशंसा करनी चाहिए, जिस तरह से उसने टैक्स वसूलने, कल्याणकारी मदद और अपने लिए वोट जुटाने के काम को आपस में जोड़ने का एक तरीका खोजा है। उनके इस मनन चिंतन और सूत्र वाक्यांश को समझने और विस्तार देने कि आवश्यकता है। लेकिन पहले सामाजिक-राजनैतिक दशा और दिशा को समझ लें। सत्तर साल का इतिहास कुछ विद्रूपताओं के बावजूद भी साथी हाथ बढ़ाना साथी रे कि भावना से भरपूर दिखाई पड़ता है।

मोदी 2014 में नव उदारवाद कि सीढ़ी पर चढ़ते दिखाई देते हैं और साथ में है उनके सपने गढ़ने, बेचने की कला, जो बाजारवादी अर्थव्यवस्था कि सबसे बेहतरीन और आवश्यक कला मानी जाती है। लेकिन बेचे गए सपनों को उनके साथी ही जुमला पारिभाषित करते हैं। सबका साथ सबका विकास, कुछ ही लोगों के विकास तक सिमट जाता है। खुद तीव्र विकास का सपना, सरकार द्वारा अपनाये गए विमुद्रीकरण और जीएसटी कार्यक्रम के पैरों तले रौंदे जाते दिखाई देता है। परिणाम कम होते विकास दर में दिखाई देता है।

आइये देखें मोदी काल में विकास दर क्या थी? सन 2014-15, सन 2015-16 और सन 2016-17 में विकास दर क्रमश: 7.4, 8.2 और 8.3 प्रतिशत रही। इस वर्ष के पश्चात विकास दर तेजी से गिरी क्योंकि विमुद्रीकरण और जीएसटी कार्यक्रम अपनाए गए और सन 2017-18, सन 2018-19 और सन 2019-20 में यह गिर कर क्रमश: 7.0, 6.4 और 4.4 प्रतिशत मात्र रह गयी। सन 2020-21 के कोरोना काल में यह गिर कर -7.3 प्रतिशत रह गई।

कोविड के दौरान तो विकास दर दशकों में सबसे कम रही। लेकिन ध्यान देने की बात है कि विकास दर तो कोविड के पूर्व से ही गिर रही थी। कोविड न रहता तो भी विकास दर गिरती हुई दिखाई देती। वस्तुत: कोविड ने तो खस्ताहाल आर्थिक स्थिति को छुपाने का काम किया। सरकार को कोविड ने एक तरह से सहारा ही दिया है। यही तो चिदंबरम कहते हैं। लेकिन सन 2021-22 और सन 2022-23 में इसके क्रमश: 8.9 और 7.2 प्रतिशत रहने की संभावना है।

इसी दौरान बेरोजगारी भी अपने चरमोत्कर्ष पर है। सीएमआईई का आंकड़ा कहता है कि सन 2018 में बेरोजगारी, पिछले 45 वर्षों में सबसे ज्यादा, अभूतपूर्व रही। यह दर सन 2019, सन 2020 में क्रमश: 5.27 प्रतिशत, 7.11 प्रतिशत, सन 2021(मई) में 12 प्रतिशत और सन 2022 (मार्च) में 7.6 प्रतिशत थी। इसी दौरान जनता की क्रय शक्ति और मांग घटी। गरीबी और कीमतें भी बढ़ीं किंतु उसको पर्याप्त महत्व नहीं दिया गया। जैसे पेट छिपाने से नहीं छिपता है वैसे ही आर्थिक बदहाली भी नहीं छिपती। बढ़ती असमानता ने कोढ़ में खाज का काम किया है। ऐसे में मोदी सरकार क्या करती ?

2019 इलेक्शन के बाद मोदी सरकार ने अपना पैंतरा बदला है। चिदंबरम कहते हैं कि मोदी सरकार ने अब लोक कल्याणवादी सरकार का मुखौटा पहन लिया है जिससे कि वोटों की लहलहाती फसल तैयार की जा सके। उन्हें सफलता भी मिली है। वे कहते हैं कि कोरोना के नाम पर लोककल्याणवाद को मजबूत किया गया है अतिरिक्त कल्याणकारी मदद से।

आइये इसे समझें ग्रामीण संसार का उदाहरण लेकर। लगभग सभी गांव पक्की सड़क और बिजली से जुड़ चुके हैं। पाइप से पानी देने का संकल्प भी ले लिया गया है। कहीं-कहीं हो भी गया है। इसी को तो विकास कहते हैं। साथ ही यदि आप गरीब, भूमिहीन या दलित किसान हैं तो आवास और बिजली की समस्या नहीं होगी। सरकार देगी वो भी मुफ्त। खाना बनाने के लिए सिलिंडर मिलना तय है।

भोजन बनाने के लिए राशन, तेल, नमक मिलेगा। स्वच्छता के लिए शौचालय बनवाइए, मदद के लिए सरकार तो है ही। सुलभ शौचालय की योजना भी चल रही है। गावों में सफाई कर्मी हैं। आप वृद्ध हैं तो पेंशन है। बीमार हैं तो आयुष्मान भारत की छत्र-छाया में हैं। बेरोजगार हैं तो मनरेगा का सहारा है। गरीब किसान हैं तो रुपये 6000 सालाना मिलेगा वो भी धन सीधे आपके खाते में आएगा (इस पर सरकार का दो वर्षों में खर्च रु 65000 करोड़ आएगा)।

महिला सशक्तिकरण कि योजना तो है ही। गरीब परिवार के बच्चों, विद्यार्थिओं को नि:शुल्क पढ़ाई का वायदा भी है। अब बाकी देश को भी जोड़ कर देखें। यदि आप या आप के बच्चे ज्यादा भाग्यशाली हैं तो मोबाइल,लैपटॉप, साइकिल, स्कूटी मिलने में कठिनाई नहीं है। अम्मा साड़ी, अम्मा भोजन, मोदी स्कूटी, दर्जनों योजनाएं हैं। सरकारें कह रही हैं कि क्या नहीं है जो आपको नहीं मिल सकता है?

लेकिन सरकार की आर्थिक नीति के इस खेल में पैसा कहाँ से आ रहा है । आइये समझें। सरकार के राजस्व प्रत्यक्ष कर, जीएसटी (अप्रत्यक्ष कर) से प्राप्त आय एवं पेट्रोलियम पदार्थों पर लगे कर से प्राप्त होते हैं। गरीब-अमीर सभी अप्रत्यक्ष कर देते हैं। किंतु व्यक्तिगत आयकर कि दर को सरकार ने उच्चतम 30 प्रतिशत पर बनाए रखा है और साथ ही इस कर पर 4 प्रतिशत का शिक्षा और स्वास्थ्य अधिभार भी बनाए रखा है।

तो विशेष रूप से यही वर्ग कर की मार से कराह रहा है। ऊपर से कोरोना काल में सरकारी कर्मचारियों को मिलने वाला डीए भी बंद था। एक मध्यम वर्ग भी है जो कि अब के दौर में कर तो देता है किन्तु सुविधाओं से वंचित है। साथ ही सरकार कि दुधारू गाय- ईधन पर लगने वाला टैक्स है। वो कामधेनु गाय कि तरह है। उससे लगातार आय होती है। मई 2014 में पेट्रोल पर उत्पाद शुल्क रु 9.20 था और आज रु 26.90 है। डीजल पर यह इन्हीं समयावधियों में क्रमश: रु 3.46 था और अब रु 21.80 है।

एलपीजी, पीएनजी और सीएनजी कि कीमतें सन 2014 में क्रमश: रु 410, रु 25.50 और रु 35.20 रही जबकि आज इनकी कीमतें क्रमश: रु 1000, रु 36.61 और रु 70 है।

कल्याणकारी कार्यों के नाम पर मुफ्त खोरी करने-कराने का तरीका तो राज नेताओं का पुराना शगल है, किंतु सत्ताधीशों का और आम जनता के बीच के कुछ खास वर्गों से उसका गठजोड़ देश के लिए नया है और कल्याणकारी भी नहीं। राजनीतिज्ञ चिदंबरम इसी चिंता से दुबले हो रहे हैं।


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