Thursday, June 4, 2026
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डाक टिकट की कहानी

BALWANI


ललित कुमार मिश्र |

मि. रॉलेण्ड हिल जब ब्रिटिश डाक व्यवस्था में व्याप्त दोषों को दूर करने तथा उसे हो रहे निरंतर घाटे से उबारने के एक उपाय के रूप में डाक टिकटों के प्रयोग की अपनी परिकल्पना को मूर्त्त रूप दे रहे थे, उस समय शायद उन्हें इसका अनुमान भी न रहा होगा कि उनकी सोच इंग्लैंड की ही नहीं, विश्व की डाक-व्यवस्था की रीढ़ बन जाएगी। डाक टिकटों के बिना डाक-व्यवस्था के सुचारू ढंग से संचालन की कल्पना भी न की जा सकेगी। सचमुच आज कंप्यूटरीकरण की बढ़ती रफ्तार के बावजूद डाक टिकटों के बिना डाक-व्यवस्था पंगु हो जाएगी। आज के कागज के नन्हें टुकड़े, जिन्हें हम डाक टिकट कहते हैं, की कहानी महज 162 साल पुरानी है।

6 मई 1840 से पूर्व इन टिकटों का नामों-निशां भी नहीं था। विभिन्न प्रकार के ठप्पों से ही काम चलाया जाता था। लंदन के हेनरी बिशप को ठप्पा टिकटों का जनक कहा जाता है। हेनरी बिशप को वर्ष 1660 में ब्रिटिश सरकार से डाक-व्यवस्था संचालन का विशेषाधिकार मिला था। बिशप द्वारा स्थापित डाक-व्यवस्था को ‘बिशप पोस्ट’ तथा ठप्पों को ‘बिशप मार्क’ कहा जाता है। बिशप मार्क गोलाकार होता था जिसे एक आड़ी रेखा दो भागों में बांटती थी। ऊपरी हिस्से में महीने का नाम तथा निचले हिस्से में तारीख लिखी होती थी।

बिशप के बाद विलियम डॉकवरा ने ‘पेनी पोस्ट’ की शुरुआत की जिस के तहत 1680 ई. से सभी पत्रों पर डाक-व्यय एक पेनी निश्चित कर दिया गया। उसने ठप्पों में भी विविधता लाई। डाक टिकटों के प्रचलन से पूर्व तक ये ‘ठप्पा-टिकट’ ही प्रयुक्त होते रहे। ठप्पे गोल, आयत, त्रिकोण, अंडाकार आदि आकारों के होते थे। इन ठप्पों पर ‘पोस्ट पेड’, पोस्ट नॉट पेड’ आदि बातें उत्कीर्ण होती थीं।

इस व्यवस्था में अधिकांश उपभोक्ता पत्रों का डाक व्यय अग्रिम नहीं देते थे। पत्र पानेवाला भी डाक महसूल देने से कतराता था। पत्र पुन: प्रेषक के पास वापस लाने पर पुन: नकार दिया जाता। इस तरह डाक विभाग को एक पत्र को दो-दो बार ढोना पड़ता और प्राप्ति कुछ भी नहीं होती। इससे सरकार की आय निरंतर गिर रही थी। जब सरकार ने आय बढ़ाने के लिए डाक दर, जो दूरी के हिसाब से लिए जाने के कारण पहले से ही ऊंची थी, बढ़ा दिया तो यह व्यवस्था सामान्य लोगों के लिए और भी महंगी हो गई। फलत: पत्र-व्यवहार में और कमी आ गई और सरकार की आय भी गिरी।

रॉलेण्ड हिल इसके लिए डाक विभाग को ही जिम्मेदार मानता था। उसका कहना था कि ऐसी व्यवस्था, जो न समाज के लिए लाभदायक हो, न ही सरकार के लिए, तत्काल बदल देनी चाहिए। उसके अनुसार यदि डाक व्यय अग्रिम लिया जाय, आम जनता के लिए डाक-व्यय अंकित लिफाफे आदि उपलब्ध कराए जाएं, डाक-व्यय दूरी के आधार पर न लिए जाएं तथा निजी लिफाफा प्रयोग करने वालों के लिए कागज के छोटे-छोटे लेबल जारी किए जायें जिन्हें पत्रों पर डाक-व्यय चुका दिए जाने के प्रमाण स्वरूप लगाया जाय तो डाक विभाग निरंतर घाटे के संकट से उबर सकता है।

काफी नुक्ताचीनी के बाद हिल के सुझाव स्वीकार कर लिए गए। ब्रिटिश संसद ने 1839 में सभी स्थानों के लिए आधा औंस वजनी पत्रों के लिए डाक-व्यय सामान्य रूप से 1 पेंस कर दिया तथा नई दर लागू होने की तिथि 1० जनवरी 1840 ई. निर्धारित कर दी परंतु इतने कम समय में लेबल या टिकट उपलब्ध कराना आसान काम नहीं था। टिकट के डिजाइन, छपाई, जालसाजी रोकने के उपाय आदि समस्याएं थी। डिजाइन के लिए तो सौ पाउंड की एक प्रतियोगिता भी आयोजित की गई परंतु कोई भी प्रविष्टी संतोषजनक नहीं पाई गई।

अंत में कारबोल्ड नामक एक कलाकार के टिकट के डिजाइन में विक्टोरिया के पार्श्वचित्र को अंतिम रूप दे दिया। ये पार्श्वचित्र सर्वप्रथम 9 नवंबर 1837 को विक्टोरिया के इंग्लैंड की महारानी बनने के बाद प्रथम बार लंदन पधारने के अवसर पर प्रचारित एक तमगे पर दिया गया था। टिकट का मुद्रण लंदन की एक फर्म ‘परकिंसन, वेकन एंड पैच’ ने मुद्रण की रीसैस तकनीक से किया। टिकटों की छपाई मुकुट जलचिन्ह युक्त कागज पर की गयी ताकि जालसाजी न की जा सके।
इस तरह 6 मई 1840 को डाक टिकट डाकघरों में उपलब्ध थे।

आधा औंस वजनी पत्रों के लिए एक पेनी मूल्य के टिकट तथा एक औंस के पत्र के लिए 2 पेनी मूल्य के टिकट छापे गए। एक पेनी मूल्य के टिकट काली स्याही मे छपे थे इसलिए इन्हें ‘पेनी-ब्लैक’ कहा जाता है। साथ ही एक व दो पैनी मूल्य के लिफाफे व रैपर भी जारी किए गए जिसका डिजाइन मलरैडी ने तैयार किया था और इसलिए इसे ‘मलरैडी कवर’ भी कहा जाता हैं। इन प्रयोगों से न केवल डाक सुविधा जन साधारण को सुलभ हुई तथा डाक संचालन आसान हुआ बल्कि ब्रिटिश प्रयोग की देखा-देखी अन्य देशों में भी यह व्यवस्था काफी लोकप्रिय हुई।

भारत में भी डाक टिकट की शुरूआत करने का श्रेय अंग्रेजों को ही जाता है। भारत में सबसे प्रथम डाक टिकट 1852 में जारी किए गए।चूंकि ये टिकट केवल सिंध प्रांत में ही व्यवहृत हो सकते थे इसलिए इसे ‘सिंध डाक’ भी कहा जाता है। सिंध डाक लाल चपड़ीनुमा चमड़े पर तैयार किया गया था, मूल्य था आधा आना। चमड़े पर बने होने के कारण ये अक्सर टूट जाते थे इसलिए बाद में इसे सफेद कागज पर गोल आकारों में उभारा गया परंतु टिकट सफेद होने के कारण रात के मंद प्रकाश में डाक कर्मियों को टिकट देखने में कठिनाई होती थी।

अंतत: ये टिकट सफेद कागज पर नीली स्याही में छापे गए। टिकट में चिपकाने के लिए न तो गोंद लगी थी और न ही छिद्रण जिससे एक टिकट दूसरे से अलग किया जा सके परंतु ये टिकट जारी न हो सके क्योंकि तब तक यानी 1854 में अखिल भारतीय स्तर के टिकट जारी हो चुके थे। अखिल भारतीय स्तर के टिकटों पर विक्टोरिया के पार्श्वचित्र थे तथा ये आधा आना, एक आना, दो आना व चार आना मूल्य के थे। ये टिकट तत्कालीन उप-सर्वेक्षण प्रमुख कैप्टन यूलियर की देख-रेख में तैयार हुए थे तथा कलकत्ता में ही छापे गए थे।


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