Tuesday, March 17, 2026
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20 वर्ष की उम्र में धर्म के लिए छोड़ा मोह, ली जैन धर्म की दीक्षा

  • दुनिया और पारिवारिक मोह का त्याग, धर्म के रास्ते पर चलने का फैसला
  • हजारों श्रद्धालुओं की उपस्थिति में दोनों युवतियों ने जैन धर्म अपनाया

जनवाणी संवाददाता |

मेरठ: जो भी इस दुनिया में आया है वह किसी न किसी रूप से मोह से बंधा हुआ है। इसमें परिवार का मोह हो या संसारिक क्रियाओं व संसाधनों का। मोह की दुनिया से निकलना आसान नहीं होता, इसके लिए कड़ी तपस्या के साथ समर्पण होना जरूरी है। ऐसी ही भावनाओं की धनी दो युवतियों ने न सिर्फ अपने परिवार को त्यागा बल्कि संसारिक मोह-माया को भी समर्पित कर दिया।

दोनों युवतियों ने जैन धर्म की दीक्षा हासिल कर अपने नए जीवन की शुरूआत की है। अब इनका जीवन धार्मिक क्रिया कलापों में ही गुजरेगा। रविवार को जैन नगर में आयोजित एक भव्य कार्यक्रम में नेपाल की रहने वाली मान्या व सोनीपत की रहने वाली अंजलि ने जैन धर्म की दिक्षा हासिल की।

दोनों युवतियां काफी समय से जैन धर्म की अपनी गुरूमाताओं के सानिध्य में रहकर धार्मिक कार्य कर रहीं थी। इस दौरान उन्होंने न सिर्फ अपने परिवार से दूर रहते हुए धर्म का रास्ता चुना बल्कि समाज में आम लोगों के मन में भी धार्मिक भावनाएं जाग्रत करनें का काम किया।

त्याग दिया संसारिक मोह

दोनों युवतियां जैन धर्म अपनाने के बाद सभी संसारिक मोह से दूर हो गई है। अब इनका संपूर्ण जीवन समाज को समर्पित रहेगा। इनके सर्मपण की भावना के चलते अब यह जैन धर्म की उपासक बन गई है। सूरज ढलने से पहले भोजन ग्रहण करना होगा, साथ ही एक जगह से दूसरी जगह जाकर लोगो को यह संदेश देना है कि संसार में सब मोह-माया है।

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जीवों की रक्षा करने से लेकर जरूरतमंदों की मदद करना ही इनके जीवन का उद्देश्य बन गया है। दीक्षा समारोह कार्यक्रम में बड़ी संख्या में जैन समाज के प्रबुद्ध लोग शामिल हुए। इस दौरान दोनों युवतियों ने विशेष प्रकार के वस्त्र धारण करने के साथ जैन धर्म के सभी नियमों का पालन करना शुरू कर दिया। पूरे देश में विचरण करते हुए जैन धर्म का संदेश लोगों तक पहुंचाना ही अब इनका मुख्य ध्येय है।

एक स्थान पर महज 40 दिन रहेंगी इसके बाद अपनी गुरूमाताओं के साथ आगे बढ़ जाएंगी। दोनों युवतियां नेपाल की मान्या व सोनीपत की अंजली का परिवार भी दीक्षा कार्यक्रम में शामिल होने पहुंचा था। आजीवन अपने विचरण के दौरान दोनों युवतियां अब पैदल ही चलेंगी, कोई वाहन का प्रयोग नहीं करेंगी साथ ही मुख पर मुंहपत्ति धारण करेंगी। दोनों साध्वीयों की गुरनी मां गीता व मानवी हमेशा अपनी शिष्यों के साथ रहेंगी।

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