
राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में 30 नवंबर तक सभी तरह के पटाखों की बिक्री और इस्तेमाल को राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) द्वारा प्रतिबन्धित कर दिया गया है। यह प्रतिबंध ऐसी जगहों पर भी लागू रहेगा जहां ज्यादा वायु प्रदूषण हो रहा है। ऐसे शहर या कस्बे जहां वायु गुणवत्ता मध्यम या उससे कम दर्ज की गई, वहां दो घंटे के लिए हरित पटाखों के इस्तेमाल की अनुमति दी जा सकती है। हालांकि कोरोना वायरस और बढ़ते वायु प्रदूषण को देखते हुए दिल्ली सरकार ने पहले ही पटाखों पर प्रतिबन्ध लगा दिया था। दिल्ली के साथ ही कुछ अन्य राज्यों ने भी पटाखों को प्रतिबन्धित कर दिया है। इस समय दिल्ली-एनसीआर और देश के कुछ हिस्से खतरनाक वायु प्रदूषण से जूझ रहे हैं। यह दुर्भाग्यपूर्ण ही है कि हर साल अक्टूबर-नवम्बर में दिल्ली-एनसीआर तथा देश के कई भागों में प्रदूषण के कारण हवा की गुणवत्ता काफी खराब हो जाती है। इस प्रदूषण के लिए किसानों द्वारा पराली जलाने को एक बड़ा कारण माना जाता है लेकिन वास्तविकता यह है कि पराली जलाना इस समस्या का एक कारण है। कुछ लोग और बुद्धिजीवी किसानों द्वारा पराली जलाने की प्रक्रिया को ऐसे प्रचारित करते हैं जैसे इस प्रदूषण का केवल यही एक कारण है। केवल पराली जलाने की प्रक्रिया को ही इस प्रदूषण के लिए जिम्मेदार नहीं माना जा सकता। इसके साथ ऐसे अनेक कारण है जो इन दिनों प्रदूषण बढ़ाकर हवा की गुणवत्ता खराब करते हैं।
हालांकि पंजाब रिमोट सेंसिंग सेंटर के अनुसार इस साल पराली जलाने की घटनाओं में पिछले साल के मुकाबले करीब चार गुना अधिक दर्ज की गई है। दरअसल तापमान कम होने और हवा की गति कम होने के कारण हवा के प्रदूषणकारी तत्व आसमान में ठहरे हुए हैं। अनेक लोगों ने कई राज्यों में पटाखों पर प्रतिबंध लगाने के फैसले की आलोचना भी करनी शुरू कर दी है। यह सही है कि इस समय बढ़ते वायु प्रदूषण का एकमात्र कारण पटाखे नहीं हैं, लेकिन यह कटु सत्य है कि पटाखों के कारण दीपावली के कई दिनों बाद तक भी खतरनाक स्तर का वायु प्रदूषण मौजूद रहता हैै।
इस साल दीपावली से पहले देश के विभिन्न हिस्सों में पटाखा फैक्ट्रियों में हुई अलग-अलग दुर्घटनाओं में अनेक लोग मारे गए। ये तो प्रकाश में आर्इं कुछ बड़ी दुर्घटनाओं की तस्वीर भर है। इसके अलावा दीपावली से पहले पटाखा फैक्ट्रियों में ऐसी छुटपुट दुर्घटनाएं भी हुई होंगी, जिनमें लोग मारे गए या फिर घायल हुए और वे प्रकाश में नहीं आ पार्इं। इस तरह की दुर्घटनाओं से पीड़ित परिवारों के लिए दीपावली खुशी की बजाय दुख का कारण बन जाती है। यह तो तस्वीर का एक पहलू है। दूसरी तरफ दीपावली के दौरान पटाखों से होने वाले वायु एवं ध्वनि प्रदूषण से सांस के मरीजों एवं हृदय रोगियों को भारी परेशानी उठानी पड़ती है और इन लोगो के लिए दीपावली प्रकाश की जगह अंधेरे का त्योहार बन जाता है।
दरअसल कोई भी त्योहार जहां एक ओर हमारी आस्था से जुड़ा होता है वहीं दूसरी ओर ईश्वर और प्रकृति में हमारे विश्वास को और अधिक पुष्ट भी करता है। हमारे शास्त्रों में भी कहा गया है कि ईश्वर पृथ्वी, जल, वायु और प्रकृति के कण-कण में विराजमान है। यह दुर्भाग्यपूर्ण ही है कि एक तरफ तो हम त्योहार मनाकर ईश्वर में अपना विश्वास प्रकट करते हैं, वहीं दूसरी ओर प्रकृति विरोधी क्रियाकलापों से प्रकृति के प्रति अपनी ही आस्था पर चोट भी करते हैं। अगर त्योहार मनाने का तरीका प्रकृति संरक्षण में अवरोधक है तो उस पर पुनर्विचार किया जाना आवश्यक है। यह विडम्बनापूर्ण ही है कि हमारे देश में जब भी परंपरा से हटकर कुछ सकारात्मक सोचा या किया जाता है तो बिना किसी ठोस तथ्य के कट्टरपंथियों का विरोध झेलना पड़ता है। लेकिन इस बदलते समय में जबकि प्रकृति का दोहन निरन्तर बढ़ता जा रहा है, प्रकृति को मात्र परंपरावादियों के भरोसे छोड़ना सबसे बडी बेवकूफी होगी। इसलिए अब समय आ गया है कि हम अपने और प्रकृति के अस्तित्व के लिए दीपावली मनाने के ढंग पर पुनर्विचार करें।
दीपावली के दौरान होने वाले वायु प्रदूषण से वातावरण में हानिकारक गैसों एवं तत्वों की मात्रा आश्चर्यजनक रूप से बढ़ जाती है। दीपावली के कई दिनों बाद तक भी वातावरण में इन हानिकारक गैसों एवं तत्वों का अस्तित्व बना रहता है। यह दुर्भाग्यपूर्ण ही है कि सस्ते होने के कारण चीन में निर्मित पटाखों ने भारतीय बाजार पर अपना कब्जा जमा लिया है। इन पटाखों में सल्फर की मात्रा अधिक होती है। यही कारण है कि इन पटाखों के जलने पर वातावरण में सल्फरडाई आक्साइड की मात्रा बढ़ जाती है। सल्फरडाई आक्साइड की अधिकता आंखों में जलन, सिरदर्द, श्वसन सम्बन्धी रोग, कैंसर और हृदय रोग उत्पन्न करती है। दीपावली के दौरान वातावरण में सस्पैंडिड परटिकुलेट मैटर (एसपीएम) तथा रेस्पाइरेबल परटिकुलेट मैटर (आरपीएम) की मात्रा बढ़ने से अनेक रोग उत्पन्न हो जाते हैं। एसपीएम से दमा, कैंसर, फेफडों के रोग तथा आरपीएम से श्वसन सम्बन्धी रोग एवं हृदय रोग होने की आशंका बढ़ जाती है।
दूसरी तरफ पटाखों में कैडमियम, लैड, कापर, जिंक, आर्सेनिक, मरकरी एवं क्रोमियम जैसी अनेक जहरीली धातुएं भी पाई जाती हैं। ये सभी जहरीली धातुएं भी पर्यावरण पर बहुत बुरे प्रभाव डालती हैं। कापर श्वसन तन्त्र को प्रभावित करता है। कैडमियम गुर्दों को नुकसान पहुंचाता है तो लैड तंत्रिका तंत्र को प्रभावित करता है। जिंक से उल्टी के लक्षण प्रकट होने लगते हैं जबकि आर्सेनिक एवं मरकरी कैंसर जैसे रोग उत्पन्न करते हैं। इसके अतिरिक्त पटाखा उद्योग में प्रयोग किया जाने वाला गन पाउडर भी हानिकारक होता है। इस उद्योग में कार्य करने वाले बच्चों पर इसके हानिकारक प्रभाव देखे गए हैं। पटाखे छुड़ाते समय आग लगने की घटनाओं से भी जान-माल का नुकसान होता है। दीपावली के दौरान होने वाले ध्वनि प्रदूषण से जहां एक ओर मानव शरीर में अनेक रोग उत्पन्न हो जाते हैं वही दूसरी ओर पशु-पक्षियों पर भी हानिकारक प्रभाव पड़ता है। ध्वनि प्रदूषण से उच्च रक्तचाप, बहरापन, हृदयघात, नींद में कमी जैसी बीमारियां उत्पन्न हो जाती हैं। कुल मिलाकर दीपावली के दौरान होने वाले प्रदूषण से पर्यावरण का हर अवयव प्रभावित होता है। अब समय आ गया है कि हम पटाखों को त्याग कर दीपावली के दौरान होने वाले प्रदूषण को मिटाने का सामूहिक प्रयास करें। आइए कोशिश करें कि इस बार प्रदूषण रूपी अंधेरे की दीवाली सच्चे अर्थों में प्रकाशमय बने।


