Saturday, April 11, 2026
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धर्म सत्ता और पितृसत्ता का गठजोड़

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krishna pratap singhदेश की कई नामचीन महिला पहलवानों के यौन उत्पीड़न के आरोपी भारतीय जनता पार्टी के सांसद और रेसलिंग फेडरेशन ऑफ इंडिया के पूर्व अध्यक्ष बृजभूषण शरण सिंह ने ‘अयोध्या के संतों’ के ‘मुखर समर्थन’ के बावजूद आगामी पांच जून को वहां के रामकथा पार्क में आगामी पांच जून को प्रस्तावित ‘देश भर के संतों की’ जनचेतना महारैली अचानक स्थगित क्यों कर दी, इस सवाल के जवाब में कई कारण गिनाए, स्वीकार किए और नकारे जा सकते हैं, लेकिन इस दौरान उन्हें समर्थन को लेकर धर्मसत्ता और पितृसत्ता का जैसा गठजोड़ सामने आया, उससे विचलित तो हुआ जा सकता है लेकिन इनकार नहीं किया जा सकता।

कई लोग इसे लेकर चकित थे कि जब मोदी सरकार तमाम जगहंसाई झेलकर भी बृजभूषण के बचाव में लगी दिख रही है, तब भी वे इतनी ‘असुरक्षा’ महसूस कर रहे थे कि उन्हें इस तरह के समर्थनों की जरूरत लग रही है और ‘संत’ हैं कि उनकी यह जरूरत पूरी करने के लिए धर्म सत्ता के स्त्री विरोध की एक और नजीर बनाने से नहीं बच पा रहे।

बहरहाल, हम जानते हैं कि पितृसत्ता द्वारा पोषित कोई भी सत्ता या व्यवस्था तभी किसी पीड़ित महिला के पक्ष में खड़ी होती है, जब उसकी निगाह में वह महिला इतनी ‘अपनी’ हो कि उसके मान-अपमान को अपनी नाक का सवाल बनाकर लड़ने में गौरव का अनुभव किया जा सके।

इसके लिए भी वह उस महिला को पीड़ा पहुंचाने वाले पुरुष का दूसरे पक्ष का होना जरूरी समझती है क्योंकि अपने पक्ष के पुरुषों द्वारा पहुंचाई गई पीड़ा को तो वह पीड़ा ही नहीं मानती और उसे पहुंचाना उनका हक समझती है।

इस बात को इस तरह भी समझ सकते हैं कि महाराष्ट्र में शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे 2019 में ‘दूसरे’ पाले में जाकर राज्य के मुख्यमंत्री बने और उन्होंने फिल्म अभिनेत्री कंगना राणावत के, जिन्हें उस पाले में माना जाता है, जिसे वे छोड़ गए थे, बंगले का कुछ हिस्सा अतिक्रमण के नाम पर ढहवाने में अपनी शक्तियों का ‘दुरुपयोग’ किया, तो इसी अयोध्या के कई ‘संतों’ की निगाह में वे खलनायक बन गए थे।

तब ये ‘संत’ कंगना के प्रति सहानुभूति व समर्थन से इतने भरे हुए थे कि अपनी सरकार के सौ दिन पूरे होने पर उद्धव द्वारा की जाने वाली अयोध्या यात्रा भी उन्हें गवारा नहीं थी। लेकिन उन्होंने बृजभूषण के समर्थन का फैसला किया तो साफ था कि उनके तईं देश की पहलवान बेटियां कंगना जितनी सौभाग्यशाली नहीं थीं क्योंकि बृजभूषण ने उद्धव की तरह पक्ष नहीं बदला था, वे ‘संतों के सगे’ बने हुए थे और पहलवान बेटियां उनके पक्ष के बजाय विपक्ष में थीं। अभी भी यह स्थिति बदली नहीं है।

अयोध्या के संतों-महंतों में पंथों, मतों, मान्यताओं और सम्प्रदायों आदि पर आधारित व्यापक वैभिन्य है और भले ही कहा जाता हो कि जाति न पूछो साधु की, उनमें जाति आधारित विभाजन भी हैं। इनके मद्देनजर वे प्राय: बहुत एकजुट नहीं हो पाते। इस मामले में भी उनका जो हिस्सा बृजभूषण के पक्ष में मुखर था, वह वही है, जो अपने वर्चस्व की बिना पर हिंदुत्व की पैरोकारी करता व भाजपा और विश्व हिंदू परिषद के हित साधता रहा है।

यह बात और है कि भाजपा इस सारे घटनाक्रम से खुद को अलग दिखाने की कोशिश में ऊंट चरावै निहुरे निहुरे की गति को प्राप्त हो गई थी। मणिरामदास की छावनी के महंत कमलनयन दास, जो बृजभूषण के समर्थन के अभियान में सबसे आगे चल रहे थे, श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के अध्यक्ष महंत नृत्यगोपाल दास के उत्तराधिकारी होने के कारण स्वाभाविक रूप से हिंदुत्ववादी हैं।

इसी तरह जो महंत मिथिलेशनन्दिनी शरण इस अभियान में कुछ ज्यादा ही सक्रिय होकर 2012 में लाए गए पोक्सो ऐक्ट के खोट गिनाते हुए उसे कई महानुभावों की ‘चरित्रहत्या’ व मीडिया ट्रायल का वायस बता रहे और उसमें संशोधन की मांग कर रहे थे, वे गत अप्रैल में अपनी एक लंबी फेसबुक पोस्ट को लेकर चर्चा में आए थे।

उक्त पोस्ट में उन्होंने सवाल उठाया था कि अगर सत्ता व्यवस्था अयोध्या को अयोध्या ही न रहने दे तो क्या वहां श्री राम रह पाएंगे? लेकिन बाद में उन्होंने अपना रुख बदल लिया और अपने द्वारा की गई इस आलोचना की सफाई देने पर उतर आए थे।

कहते हैं कि बृजभूषण शरण सिंह पर पाक्सो के तहत एफआईआर से पहले उन्हें इस कानून में कभी कोई खामी नहीं दिखी थी। लेकिन अब वे कह रहे थे कि इस कानून के रहते तो किसी संत द्वारा आशीर्वाद देने के लिए किसी अवयस्क के सिर पर रखे गए हाथ को भी बैड टच मानकर उस पर कार्रवाई की जा सकती है।

यहां जानना जरूरी है कि अयोध्या बृजभूषण के छात्र नेता से हिंदुत्ववादी नेता और बाहुबली आदि बनने की साक्षी रही है। वे उसके प्रतिष्ठित कामता प्रसाद सुंदर लाल साकेत पी जी कालेज के छात्र और छात्र संघ के पदाधिकारी भी रहे हैं। बाद में 1992 में वे बाबरी मस्जिद के ध्वंस के मामले में अभियुक्त बने और गिरफ्तार भी किए गए थे। तभी से उन्हें इसका भरपूर गर्व भी रहता आया है।

लंबे संग-साथ के कारण न अयोध्या में उनसे उपकृत महसूस करने वालों की कमी है, न उन्हें उपकृत करने व उनके बहुत नजदीक होने का दावा करने वालों की। वैसे भी उनके गृह जिले और अयोध्या के बीच सरयू नदी के इस और उस पार का ही फर्क है। दोनों पार यानी भाजपा के अंदर भी और बाहर भी उनके अनेक शुभचिंतक पाए जाते हैं क्योंकि उन्हें ‘आड़े वक्त काम आने वाला प्रभावशाली आदमी’ या कि बाहुबली माना जाता है।

पिछले साल भाजपा एक खास रणनीति के तहत महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के नेता राज ठाकरे की पांच जून को प्रस्तावित अयोध्या यात्रा को परदे के पीछे से प्रायोजित कर रही थी तो बृजभूषण ने घोषणा कर दी थी कि राज ठाकरे ने उत्तर भारतीयों के अपमान के लिए माफी नहीं मांगी तो वे उन्हें अयोध्या में नहीं घुसने देंगे।

तब उन्होंने कहा था कि पहले वे भगवान राम के वंशज हैं, फिर उत्तर भारतीय और उसके बाद भाजपा के सदस्य। उन्होंने राम मंदिर आंदोलन में ठाकरे परिवार की भूमिका भी नकार दी थी। तब भी भाजपा ने उन पर अंकुश लगाने वाली कोई कार्रवाई नहीं की थी।

‘अयोध्या के संतों’ द्वारा बृजभूषण का समर्थन दोनों पक्षों की परस्परनिर्भरता का भी मामला था, क्योंकि वक्त और जरूरत के हिसाब से ये दोनों एक दूजे की शरण गहते और एक दूजे के प्रभाव का लाभ उठाते रहते हैं। संतों में पहलवानी की भी पुरानी परंपरा रही है और बृजभूषण ने इस परंपरा के संरक्षक या उद्धारक की अपनी छवि भी बना रखी है, इसका लाभ भी उन्हें मिल रहा था।

लेकिन अंतत: रैली के स्थगन से फिर कुछ वैसा ही हुआ जैसा बृजभूषण की अयोध्या में इससे पहले की बहुप्रचारित मुहिमों का होता रहा है। वे अंजाम तक नहीं ही पहुंच पातीं रही हैं। यों इस स्थगन से पहले अयोध्या में एक चर्चा यह भी थी कि क्या पता प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार और स्थानीय प्रशासन इस जनचेतना महारैली को होने भी देंगे या नहीं।


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