- फरवरी माह में हो सकते हैं चुनाव, दावेदारों की लगी कतार बनी है भाजपा की मुसीबत
- इस बार पब्लिक चुनेगी बोर्ड का उपाध्यक्ष कई दावेदार ठोक रहे हैं ताल
- टिकट न मिलने की स्थिति में कई महारथी बागी होकर चुनाव लड़ने की कर रहे तैयारी
जनवाणी संवाददाता |
मेरठ: पुराने धुरंधरों के मैदान में उतरने तथा कुछ के उतरने की आहट से सर्दी के मौसम में कैंट बोर्ड की राजनीति गरमा गयी है। उपाध्यक्ष के चुनाव में कुछ पुराने धुरंधरों की आहट से मुकाबला दिलचस्प व बेहद कड़ा होने के आसार नजर आ रहे हैं। हालांकि अभी चुनाव की अधिकृत घोषणा नहीं की गयी है, लेकिन माना जा रहा है कि अगले साल फरवरी से अप्रैल माह के मध्य कभी भी चुनाव कराए जा सकते हैं।
भले ही चुनाव की तारीख का एलान न किया गया हो, लेकिन सर्दी के इस मौसम में पुराने धुरंधरों की मौजूदगी ने कैंट बोर्ड की राजनीति में गरमी पैदा कर दी है। आने वाले दिनों में इसमें और गरमाई आने के आसार अभी से नजर आने लगे हैं।
ताल ठोक रहे पुराने धुरंधर
उपाध्यक्ष का चुनाव सीधे जनता के हाथों होने के बाद इस बार चुनाव में पुराने धुरंधर ताल ठोक रहे हैं। इनमें बड़ा व चौंकाने नाम कैंट बोर्ड के पूर्व उपाध्यक्ष दिनेश गोयल का लिया जा रहा है। उन्होंने दमदार एंट्री मारी है। इनके अलावा भाजपा कोटे में नेता सुधीर रस्तोगी, उज्जवल अरोरा, अरविंद मारवाड़ी, सुनील शर्मा व कैंट बोर्ड सदस्य अनिल जैन, उपाध्यक्ष विपिन सोढ़ी का नाम भी चर्चा में है। हालांकि चौंकाने वाली एंट्री दिनेश गोयल की मानी जा रही है। उनकी एंट्री ने चुनाव को दिलचस्प बना दिया है।
पत्ते खोलने को तैयार नहीं
चौंकाने वाली एंट्री करने वाले दिनेश गोयल से जब इस संबंध में सवाल किया गया तो उन्होंने बेहद शायराना अंदाजा में कहा वक्त आने पर बता देंगे तूझे ऐ आसमां हम अभी से क्या बताएं क्या हमारे दिल में है। पूर्व उपाध्यक्ष ने कहा कि जब कुछ बताने का मौका होगा तो सबसे पहले न्योता भी जनवाणी का जाएगा।
इस बार पब्लिक करेगी चुनाव
कैंट बोर्ड का उपाध्यक्ष इस बार सीधे पब्लिक चुनने जा रही है। रक्षा मंत्रालय के इस निर्णय के बाद कैंट बोर्ड की राजनीति अब पूरी तरह से पलट गयी है। अब तक होता ये था कि जो सदस्य चुनकर आते थे उनके बीच से ही कोई उपाध्यक्ष चुना जाता था। इस बार पब्लिक द्वारा उपाध्यक्ष चुना जाएगा।
सदस्य की कीमत कई-कई लाख
उपाध्यक्ष चुनने में एक एक सदस्य की कीमत कई कई लाख होती थी। चुनाव में जितना खर्च होता था, उससे ज्यादा की रिकवरी उपाध्यक्ष के चुनाव में जीतकर आने वाला बोर्ड का सदस्य कर लेता था। इसके अलावा सदस्य के वार्ड के कैंट बोर्ड से संबंधित कई समझौते भी उपाध्यक्ष बनने वाले सदस्य को करने पड़ते थे। हालांकि इतना कुछ करने के बाद भी उपाध्यक्ष की कुर्सी हासिल करना कोई घाटे का सौदा नहीं माना जाता था।
ये कहना है दिनेश गोयल का
कैंट बोर्ड के पूर्व उपाध्यक्ष दिनेश गोयल से जब चुनाव लड़ने पर सवाल पूछा गया तो उन्होंने कहा कि नसीब के आगे झुकूंगा नहीं थककर जरूर बैठा हूं मगर रुकूंगा नहीं। अभी वक्ता का इंतजार करना बेहतर होगा।
ये कहना है सुनील वाधवा का
कैंट बोर्ड के पूर्व उपाध्यक्ष सुनील वाधवा का कहना है कि उपाध्यक्ष का चुनाव सीधे पब्लिक के हाथों किया जाना है। फरवरी माह के बाद कभी भी चुनाव संभव हैं। राजनीतिक शख्स हमेशा चुनावी मोड में रहते हैं।



