
सामने है-2024 का आम चुनाव। चुनावी माहौल में चल रही है भारत जोड़ो न्याय यात्रा। अचरज की बात है, देखते-देखते बेखौफ बुलडोजर न्याय का उल्लसित प्रतीक बनता चला गया! वह दिन दूर नहीं जब, गोली-बंदूक न्याय का प्रतीक बन जायेगा! चुनावी साल में भी, भारत के नक्शे पर क्या महान दृश्य चल रहा है! एक तरफ राहुल गांधी के नेतृत्व में मणिपुर से प्रारंभ भारत जोड़ो न्याय यात्रा चल रही है तो, दूसरी तरफ उत्तराखंड में ‘बुलडोजर न्याय’ चल रहा है, किसानों को संवैधानिक न्याय मिलना तो दूर की बात है, मुलाकात और मुकाबला ‘पुलिसिया न्याय’ से हो रहा है। मणिपुर! मणिपुर भारत व्यवहार का ऐसा प्रतीक बन गया है, जिस के लिए कोई उपयुक्त नाम नहीं सूझ रहा, बस मणिपुर कहना ही काफी हो गया है। भारत के लोगों की नजर 2024 के आम चुनाव के संभावित नतीजों के पास घूम रही है। संस्कृति के राजनीतिकरण, फिर राजनीति के कॉपोर्रेटरीकरण और बुद्धिमत्ता के यांत्रिकीकरण के दौर में महत्त्वपूर्ण यह है कि पूरी दुनिया भी अपनी नजर से भारत के लोकतंत्र के नव पाठ को पढ़ने की कोशिश कर रही होगी। संचार और संपर्क की तीव्रता के साथ व्यापारिक सुविधा और मुनाफा के लाभ-लोभ ने पूरी दुनिया को बेहद करीब ला दिया है। किसी भी देश की आंतरिक स्थिति का अन्य देशों के हितों पर प्रभाव पड़े बिना नहीं रह सकता है। इस अर्थ में दुनिया बेहद करीब आ गई है। जाहिर है, आज दुनिया के अन्य देश भारत में गरीब और मुफलिस लोगों के लोकतंत्र के विकासमान स्वरूपों को अपने-अपने हित-अनहित की नजर से देख ही रहे होंगे।
भारत में अन्य डरों के अलावा डर का एक बना-बनाया प्रसंग है-हिंदु मुसलमान। हिंदुओं के मन में मुसलमानों का डर और मुसलमानों के मन में हिंदुओं का डर। इस घनीभूत डर के राजनीतिक उपयोग से ध्रुवीकरण को बढ़ाया जाता है। दोनों के बीच की सामाजिक दूरी को बढ़ाते-बढ़ाते अलगाव की हद तक ले जाने के औजार के रूप में सार्वजनिक तौर पर की जानेवाली ‘राजनीतिक बयानबाजी’ सामने आती है, जिसका चरम रूप ‘हेट स्पीच’ में दिखता है। ‘हेट स्पीच’ का हिंदू-मुसलमान के सार्वजनिक प्रसंग के अलावा एक आंतरिक प्रसंग भी है, जिस पर सहज ही ध्यान नहीं जाता है। एक ग्रामीण और एक शहरी प्रसंग का उल्लेख, अप्रासंगिक नहीं होगा। गांवों में बसे ‘उच्च जाति’ के लोग तरह-तरह से अपने बच्चों और परिजनों को तथाकथित ‘नान्ह जात’ से दूर रहने का ‘हितोपदेश’ देते रहते हैं। शहरों में, खासकर ‘कॉलोनियों और सोसाइटियों’ में रहनेवाले अधिकतर शहरी भी, ‘कॉलोनियों और सोसाइटियों’ से बाहर रहनेवालों के संदर्भ में एक भिन्न तरह और तर्क से लेकिन इसी अंतर्वस्तु का ‘हितोपदेश’ अपने बच्चों और परिजनों को देते रहते हैं।
भारत के समकालीन राजनीतिक अध्याय में नकारात्मकता के कारण गुटबाजी और सांप्रदायिकता का बोलबाला बहुत बढ़ गया है। सामाजिक प्रबंधन के लिए नकारात्मकता को सकारात्मकता से विस्थापित किए जाने की जरूरत है; घृणा को प्रेम में बदले जाने की जरूरत है। सामाजिक प्रबंधन, सामाजिक न्याय सुनिश्चित करने की पहली सीढ़ी है। दुहराव के जोखिम पर भी कहना जरूरी है कि डर के दायरे से बाहर निकलना सामाजिक न्याय की पहली जरूरत है। सामाजिक न्याय के अन्य पहलू भी हैं। लोकतांत्रिक देश में न्याय का प्राथमिक और अंतिम आश्रय संवैधानिक न्याय ही हो सकता है। संवैधानिक प्रावधानों के अंतर्गत संस्थागत न्याय के अंत:करण और उसकी अनुकूलताओं में ही प्राकृतिक, ईश्वरीय जैसे न्याय के विविध रूपों सहित सामाजिक न्याय के मसलों का भी हल हो सकता है। संवैधानिक प्रावधानों के अनुपालन की शुचिता पर गौर करने से फिर साधन और साध्य की शुचिता का सवाल उठ खड़ा होता है।
विपक्षी गठबंधन में शामिल होते समय ऐसे विपक्षी नेताओं को विश्वास रहा होगा, यह विशुद्ध अनुमान है, कि राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) या भारतीय जनता पार्टी को सत्ता से बेदखल करने के बाद विपक्षी नेता न सिर्फ दोष-सिद्धि से बचा लिए जाएंगे, बल्कि, आगे भी अपना खेल जारी रखने का सुयोग पा सकेंगे; अब यह विश्वास डगमगा गया लगता है। क्योंकि, यदि विपक्षी गठबंधन राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) को सत्ता से बेदखल कर भी देता है तो, उस स्थिति में अनिवार्य रूप से चलेगी कांग्रेस पार्टी की और उसके अथक नेता राहुल गांधी की।
‘आंख में खटकनेवाले जनजुटाव’ के उल्लास में भारत जोड़ो न्याय यात्रा में चल रहे कांग्रेस पार्टी के अथक यात्री राहुल गांधी के तेवर को भांपते हुए दोष-सिद्धि से बचा लिए जाने और आगे भी अपना खेल जारी रखने का सुयोग मिल पाने के प्रति न सिर्फ विपक्षी गठबंधन के घटक दल के नेताओं के, बल्कि, कई ‘कांग्रेसजनों’ के मन में भी भारी संदेह पैदा हो जाने का अंदेशा है। यदि, ऐसा हुआ होगा तो विपक्षी गठबंधन से न सिर्फ घटक दलों के बल्कि, ‘कांग्रेसजनों’ के भी टूटने की कई घटनाएं अभी सामने आएंगी। इस तरह से टूटनेवाले घटक दल और नेताओं का साथ जनता का समर्थन आने का संदेह बना हुआ है।
एक तरफ राजनीतिक दुविधा का जाल है, तो दूसरी तरफ उड़ान भरने का आकुल राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं के पंख! बेरोजगारी का, महंगाई का, जो होगा, सो होगा। लोकतंत्र का जो होगा, सो होगा। सामाजिक न्याय का जो होगा, सो होगा। असल चिंता है, सीटों के बंटवारा का क्या होगा! इन सब से बेफिक्र राहुल गांधी चले जा रहे हैं! कांग्रेस पार्टी देखे जा रही है! रही बात जनता की तो, चुनावी समर में वह अपने तीन-तेरह का हिसाब जोड़ने में व्यस्त है! ऐसी स्थिति में राहुल गांधी क्या करेंगे? जो करेंगे, राहुल गांधी ही तय करेंगे, लेकिन रास्ते दो ही बचे हुए दिखाई देते हैं-एक रास्ता महात्मा गांधी का, दूसरा इंदिरा गांधी का। यदि, महात्मा गांधी के नैतिक आध्यात्मिक लोकतंत्र का छुटा हुआ रास्ता अपनाते हैं तो अकेले पड़ने के खतरे से घिरते जाएंगे, लेकिन अपनी वैचारिक उपस्थिति से प्रासंगिक बने रह सकते हैं।
यदि, इंदिरा गांधी का रास्ता अपनाते हैं तो फिर कांग्रेस (आई) की तरह कांग्रेस पार्टी के बचे हुए पुराने नेताओं के अभिभावकत्व से बाहर निकलना होगा। खुद मुख्तारी से कांग्रेस का चमत्कारिक काया-कल्प करते हुए संवैधानिक लोकतंत्र की प्राथमिकताओं एवं प्रतिबद्धताओं से लैस ‘नई कांग्रेस’ को खड़ा करना होगा। रास्ता तो यह भी आसान नहीं है। भारत जोड़ो न्याय यात्रा में चुनावी संभावनाएं जैसी भी हों, इसमें आंदोलन बन जाने के तत्त्व बहुत हैं। जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में राजनीतिक आपातकाल विरोधी आंदोलन में राम धारी सिंह दिनकर की काव्य पंक्तियां आज भी कान में बजती हैं-राख सुगबुगा उठी, मिट्टी सोने का ताज पहन इठलाती है; दो राह, समय के रथ का घर्घर-नाद सुनो, सिंहासन खाली करो, कि जनता आती है। कोई माने, न माने, राहुल गांधी के सामाजिक न्याय के सामग्रिक तात्पर्य का आम चुनाव में खास महत्व है।


