Tuesday, May 26, 2026
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आज भी सार्थक हैं चौधरी चरण सिंह के विचार

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डॉ. राजकुमार सांगवान
जब भारत में पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश और दूसरे राज्यों के किसान अपनी मांगों को लेकर सर्दी की हाड़ कंपा देने वाली सर्द रातों में खुले आसमान के नीचे तय आंदोलनरत हैं, और सरकार के कान पर जूं तक नहीं रेंग रही, सरकार अपने द्वारा पारित कानूनों को जायज बता रही है, किसानों को बातों के जाल में उलझाया जा रहा है। उन्हें बार-बार वार्ता के लिए टेबिल तक बुलाया जाता है और फिर वापिस भेज दिया जाता है। हर रोज आंदोलनरत किसानों में से कोई दम तोड़ देता है, किंतु सरकार को इस बात से कोई हमदर्दी नहीं। किसान अपने आपको बहुत ही अकेला और बेबस अनुभव कर रहा है। देश का अन्नदाता फुटपाथ पर पड़ा है और हुक्मरान अपने आलीशान बंगलों में अपने नर्म बिस्तरों में आनंदमय जीवन व्यतीत कर रहे हैं। यह इस देश का कैसा दुर्भाग्य है, कैसी विडंबना है। ऐसे संवेदनहीन और विकल्पहीन समय में  भारत के एकमात्र कृषि बुद्धिजीवी चौधरी चरण सिंह की ही सीख याद आती है। वे अक्सर कहा करते थे, कि किसान को अपनी एक आंख खेत की मेंड पर तथा दूसरी आंख लखनऊ पर रखनी चाहिए।  चौधरी चरण सिंह का यह वाक्य आज गंभीर विश्लेषण की मांग करता है।
चौधरी चरण सिंह का मानना था कि स्वतंत्र भारत में जन आंदोलन की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि स्वतंत्र भारत में लोकतांत्रिक व्यवस्था के अंतर्गत चुनावों के माध्यम से विधायिकाओं में अपने जनप्रतिनिधि भेज कर हम अपने हितों की सुरक्षा कर सकते हैं, उनका संवर्धन कर सकते हैं, कहने का निहितार्थ यह है कि हमें कानून निर्मात्री संस्थाओं में ऐसे जनप्रतिनिधि भेजने होंगे, जो आपके यानी कि किसानों के हितों का ख्याल रखें तथा इस हेतु आवश्यक कानूनों का निर्माण कर सकें। आज प्रश्न यह है कि जब चुनाव होते हैं, तब किसान जाति, धर्म, क्षेत्र जैसे अनेकानेक भावनात्मक मुद्दों के आधार पर अपने जनप्रतिनिधियों को चुनकर कानून निर्मात्री संस्थाओं में भेजते हैं, तो फिर उनके अर्थात  किसानों के वर्गीय हितों के लिए कानून कौन बनाएगा,और क्यों बनाएगा।  जिनका चुनाव हमने वर्गीय हितों गांव, कृषि कृषक आदि के आधार पर किया ही नहीं है।
आज भी देश की 57 फीसदी आबादी अपनी जीविका के लिए कृषि एवं कृषि से संलग्न क्षेत्रों पर ही निर्भर करती है। लेकिन इस बहुसंख्यक आबादी की गंभीरता से आवाज उठाने वाले कानून निर्मात्री संस्थाओं में मौजूद ही नहीं है। यही वजह है कि आज किसान अपने हितों के लिए ठुठरती सर्दी में खुले आसमान के नीचे आंदोलनरत हैं। अपनी इस स्थिति के लिए किसान स्वयं जिम्मेदार हैं। अत: यदि किसान चाहते हैं कि उनके हितों की सुरक्षा एवं संवर्धन होता रहे तो उन्हें अपनी एक आंख कानून निर्मात्री संस्थाओं लखनऊ, दिल्ली आदि पर रखनी होगी, जहां उनके सच्चे प्रतिनिधि मौजूद हों, जो उनके हितों की रक्षा कर सकें। चौधरी चरण सिंह जी का जीवन चरित्र हमें यही शिक्षा देता है। आज किसानों को इस बात की भी महती आवश्यकता है कि वह अपने ही बीच में आंदोलन कर रहे सरकारों के एजेंटों को भी पहचानें, जो आंदोलन तो उनके साथ कर रहे हैं, किंतु मुखालफत सरकार की करते हैं और आंदोलनों को तोड़ने के लिए सरकार की पूरी मदद करते हैं। सरकार कहती है कि हमने यह कानून किसानों की बेहतरी और खुशहाली हेतु बनाए हैं, किंतु सच्चाई इसके सर्वथा विपरीत है।
किसानों की दुर्दशा किसी से छिपी नहीं है। उनकी आत्महत्या की खबरें चीख-चीख कर उनकी स्थिति का यथार्थ भली-भांति बयान कर रही हैं। देश के किसी न किसी हिस्से में आए दिन किसान आंदोलन रत रहते हैं। विगत दिनों हम सभी ने सड़कों पर टमाटर और प्याज की दुर्दशा की तस्वीरें देखी हैं। यही प्याज और टमाटर जब व्यापारियों के पास पहुंचता है तो इसकी कीमत आसमान को छू जाती है। हमें उन महापुरुषों के चिंतन से सीख लेनी चाहिए जो वास्तव में किसानों के सच्चे हितैषी थे। चौधरी चरण सिंह जी का चिंतन ऐसा ही चिंतन है। हमें एक बार फिर उनके चिंतन को समझना होगा और उसे व्यावहारिक धरातल पर फलीभूत भी करना होगा। वर्तमान समय में यही होगी चौधरी चरण सिंह के राजनैतिक विचारों की सार्थकता।
बाबूगढ़ छावनी के निकट नूरपुर गांव, तहसील हापुड़, जनपद गाजियाबाद, कमिश्नरी मेरठ में काली मिट्टी के अनगढ़ और फूस के छप्पर वाली मढ़ैया में 23 दिसम्बर,1902 को चौधरी साहब का जन्म हुआ। चौधरी चरण सिंह के पिता चौधरी मीर सिंह ने अपने नैतिक मूल्यों को विरासत में चरण सिंह को सौंपा था। चरण सिंह के जन्म के 6 वर्ष बाद चौधरी मीर सिंह सपरिवार नूरपुर से जानी खुर्द के पास भूपगढी आकर बस गए थे। यहीं के परिवेश में चौधरी चरण सिंह के दिल में गांव-गरीब-किसान के शोषण के खिलाफ संघर्ष का बीजारोपण हुआ। आगरा विश्वविद्यालय से कानून की शिक्षा लेकर 1928 में चौधरी चरण सिंह ने ईमानदारी, साफगोई और कर्तव्यनिष्ठा पूर्वक गाजियाबाद में वकालत प्रारम्भ की। वकालत जैसे व्यावसायिक पेशे में भी चौधरी चरण सिंह उन्हीं मुकदमों को स्वीकार करते थे जिनमें मुवक्किल का पक्ष न्यायपूर्ण होता था।
कांग्रेस के लाहौर अधिवेशन 1929 में पूर्ण स्वराज्य उद्घोष से प्रभावित होकर युवा चरण सिंह ने गाजियाबाद में कांग्रेस कमेटी का गठन किया। 1930 में महात्मा गांधी द्वारा सविनय अवज्ञा आन्दोलन के तहत नमक कानून तोडने का आह्वान किया गया। गांधी जी ने ‘डांडी मार्च’ किया। आजादी के दीवाने चरण सिंह ने गाजियाबाद की सीमा पर बहने वाली हिंडन नदी पर नमक बनाया। परिणामस्वरूप चरण सिंह को 6 माह की सजा हुई। जेल से वापसी के बाद चरण सिंह ने महात्मा गांधी के नेतृत्व में स्वयं को पूरी तरह से स्वतंत्रता संग्राम में समर्पित कर दिया। 1940 के व्यक्तिगत सत्याग्रह में भी चरण सिंह गिरफतार हुए फिर अक्टूबर 1941 में मुक्त किए गए।

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