Wednesday, January 28, 2026
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न्यू इंडिया में पुरानी चप्पलें

न्यू इंडिया अब सिर चढ़कर बोल रहा है। हर दिन एक नया ऐप, हर महीने एक नया वादा, और हर भाषण में दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र दोहराया जाता है। लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि इस चमकते भारत की एड़ियों में अब भी वही पुरानी फटी चप्पलें पड़ी हैं, जिनसे न विकास की रफ्तार पकड़ में आती है, न लोकतंत्र की ठोकरें सहने का मोल चुकता होता है। सरकारी रिपोर्टें कहती हैं, जीडीपी बढ़ी, विदेशी निवेश आया, और देश आत्मनिर्भर हुआ। मगर मोहल्ले का रामकिशन अब भी वही रबर की चप्पल पहनता है, जिसकी एक पट्टी हर दो महीने में टूट जाती है, और वो फिर से उसे सेलोटेप से जोड़कर अगली उम्मीद की ओर निकल पड़ता है।


न्यू इंडिया में अब चप्पल सिर्फ पहनने की चीज नहीं, पहचान की चीज हो गई है। शहरों में लोग स्पोर्ट्स शूज की ब्रांड पहचानते हैं और गांवों में लोग ये पहचानते हैं कि चप्पल कितनी पुरानी है, ताकि अंदाजा लगाया जा सके कि कौन कितने दिनों से बेरोजगार है। सरकार कहती है, ‘हर घर जल, हर हाथ काम।’ लेकिन रामू के पांव में चप्पल नहीं है, और सिर पर छांव नहीं। वो हर सुबह स्कूल की डिजिटल स्मार्ट क्लास के लिए नंगे पांव निकलता है, जहां स्मार्टबोर्ड है, लेकिन बैठने को ढंग की बेंच नहीं। अब हर गली में ‘स्मार्ट सिटी’ का बोर्ड टंगा है, लेकिन उसी गली में गड्ढों से बचने के लिए जनता अब भी वही पुरानी चप्पल पहन रही है। नई सड़क के उद्घाटन से पहले नेता जी की गाड़ी गुजर जाती है, और पीछे-पीछे रामकिशन अपनी चप्पल सम्हालता हुआ चल देता है, उसको पता है सड़क नई हो या पुरानी, उसकी चाल वही रहेगी, धीमी और ढुलमुल।

इधर शहरों में ‘विकास’ एक इवेंट बन चुका है। एसी सभागारों में योजनाएं बनती हैं और प्रेस कॉन्फ्रेंस में घोषणाएं होती हैं। लेकिन गांवों की धूल भरी गलियों में वो योजनाएं चप्पल के तलवों से चिपकी पड़ी होती हैं, जैसे चुनाव के बाद वोटर की यादें मिट्टी में दबी होती हैं। क्रांतिकारी नारे अब रील्स में नजर आते हैं। ‘मेक इन इंडिया’, ‘डिजिटल पेमेंट’, ‘हर किसान को लाभ’ सब कुछ स्क्रीन पर चलता है, पर धरातल पर अब भी किसान अपने पाँव से खेत नापता है और उसकी चप्पल से मिट्टी झड़ती रहती है। शायद न्यू इंडिया की सबसे बड़ी विडंबना यही है, यह एक ऐसा इंडिया है जो ऊपर से चमकदार है पर नीचे से अभी भी घिसा हुआ। जिसके चेहरे पर डिजिटल मुस्कान है, पर पाँवों में वही पारंपरिक पीड़ा।

और यह सिर्फ प्रतीक नहीं है। यह उस आम आदमी की सच्चाई है, जो हर बजट में कुछ उम्मीद करता है, हर चुनाव में थोड़ा बदलाव चाहता है, और हर बार वही चप्पल पहन कर लोकतंत्र की लाइन में खड़ा हो जाता है। विकास जब पांव से कटेगा, तब तक भारत दौड़ नहीं सकता। न्यू इंडिया तभी साकार होगा, जब पुरानी चप्पलों को इतिहास बना देंगे, और उन पांवों को सम्मान देंगे, जिन पर ये देश खड़ा है।

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