
जब हम बच्चे थे, तब हमें एक कहानी सुनाई जाती थी—बहुत साधारण, बहुत मानवीय। कहानी थी, दो बच्चों की, जो खेलते-खेलते लड़ पड़े। दोनों पड़ोसी थे, उनके परिवार, दोस्त भी थे। शाम को दोनों के पिता घर लौटे और अलग-अलग ‘अदालतों’ में सुनवाई हुई। दोनों बच्चों ने अपनी-अपनी कहानी सुनाई। धीरे-धीरे बात बच्चों से निकलकर पिताओं तक पहुँची और फिर अपने-अपने ‘सचिन तेंदुलकरों’ को लेकर दोनों घरों में बोलचाल बंद हो गया। विडंबना यह थी कि दोनों परिवार पड़ोसी थे, दोस्त थे और माताओं ने मिलकर छोटा-मोटा कारोबार भी शुरू कर रखा था। अब धर्म-संकट खड़ा हो गया—रोज का नुकसान, मानसिक तनाव अलग। कुछ ही दिनों में बच्चे अपना झगड़ा भूल गए और फिर साथ खेलने लगे। तब माता-पिताओं को अपनी मूर्खता समझ आई—बच्चों का झगड़ा सुलझाने के बजाय वे खुद उसमें उलझ गए और अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मार ली।
इस कहानी की सीख साफ थी—झगड़े बातचीत से सुलझाने चाहिए, खासकर तब, जब आप एक ही घर में रहते हों या पड़ोसी हों, क्योंकि ऐसे रिश्ते चुने नहीं जाते, बने-बनाए मिलते हैं, लेकिन आज के हालात अलग हैं। सत्ता के नशे में चूर लोग न समझना चाहते हैं, न समझाए जा सकते हैं—खासकर उन्हें, जो खुद को अवतार समझ बैठे हैं। अब आप कहेंगे, इसमें नया क्या है? नया कुछ नहीं—बस क्रिकेट हो गया। ‘इंडियन प्रीमियर लीग’ यानि ‘आईपीएल’ नामक एक बेहद बाजारू खेल हर साल होता है। करोड़ों की बोली, करोड़ों का जुआ। सब जानते हैं, फिर भी सब उसमें डूबे हैं। इसी दौरान फिल्मी अभिनेता शाहरुख खान ने अपनी ‘कोलकाता नाइट राइडर्स’ टीम के लिए बांग्लादेश के एक खिलाड़ी मुस्तफिजुर रहमान को खरीद लिया। हां, खरीद लिया—मेरी भाषा खराब नहीं है।
बस फिर क्या था। कहीं से कोई बिगड़ा हुआ, नादान परिवार का नादान बच्चा आया और धर्म को खेल में घसीट लाया। धर्म का खेला आना ही था—क्योंकि बंगाल में करोड़ों के चुनाव जो आने वाले हैं। पड़ौसियों में ठन गई। शाहरुख खान ने खिलाड़ी को टीम से हटा दिया। जवाब में बांग्लादेश ने कह दिया कि भारत और श्रीलंका में होने वाला ‘टी-20 वर्ल्ड कप’ भारत में नहीं खेलेगा और बांग्लादेश में मैचों का प्रसारण भी नहीं होगा!
जब से भाजपा सरकार आई है, भारत पाकिस्तान क्रिकेट खेलने नहीं जाता। जवाब में पड़ोसी हमारे यहां नहीं आते। अब दूसरे पड़ौसी से भी झगड़ा कर लिया, तो उन्होंने भी आने से मना कर दिया। अब क्या? अब तो सरकार ही जाने। मोटा-मोटा समझ यही आता है कि भारत सरकार को फिर वही पुरानी कूटनीति अपनानी पड़ेगी—लगा तो तीर, नहीं तो तुक्का। कह दिया जाएगा कि यह सरकार की नीति नहीं है, शाहरुख खान अपने खिलाड़ी को खिला सकते हैं, ‘टी-20 वर्ल्ड कप’ हो सकता है। आखिरकार—बाप बड़ा न भैया, सबसे बड़ा रुपैया। क्रिकेट, उससे होने वाली कमाई और क्रिकेट के नशे में सब कुछ भूल जाने वाला देश—सब कुछ दाँव पर लगा है। सिर्फ़ इसलिए कि किसी शाहरुख खान से नाक रगड़वाई जा सके। भाजपा सरकार यह भी जानती है कि जब अमेरिका भारत के निर्यात पर बंदिशें लगा रहा है, तब यह खेल बहुत महंगा पड़ सकता है। बांग्लादेश भारत का आधे से ज्यादा सूती यार्न खरीदता है। तिलहन की खली सबसे ज्यादा, मसालों में तीसरे स्थान पर और चावल, शक्कर, खनिज, ईंधन एवं पेट्रोलियम उत्पाद, वाहन एवं मशीनरी—इन सबमें बांग्लादेश भारत के टॉप-टेन निर्यात बाजारों में है।
लेकिन हमारे नेताओं और उनके पिछलग्गुओं को लगता है कि दुनिया दादागिरी से चलती है। जैसे रास्ते के गुंडे-मवाली गाली-गलौच, तोड़फोड़ और धमकी से काम निकालते हैं—ताकि कोई शाहरुख खान डर जाए और कोई सुधा मूर्ति माफी माँग ले। इनसे सवाल कौन पूछे? जिस बांग्लादेश में हिंदुओं की मॉब लिंचिंग पर भाजपा और उसके भगत आग-बबूला हैं, उसी बांग्लादेश की शेख हसीना को भारत सरकार ने शरण दे रखी है—जिनके सोलह साल के शासन में हिंदुओं पर हमले हुए, मंदिर टूटे और लोग मारे गए।
अपने ही देश के मुसलमानों के प्रति अंधी और उग्र नफरत में डूबा समाज यह समझने से इनकार कर रहा है कि वह किस दिशा में धकेला जा रहा है। यह नफरत सिर्फ़ भीतर की एकता नहीं तोड़ती, बल्कि बांग्लादेश-पाकिस्तान-चीन जैसे देशों के बीच एक खतरनाक सामरिक मेल को भी मजबूत करती है—जिसके सामने घरेलू शेखी और मर्दानगी के नारे बेमानी साबित होंगे। आज की दुनिया नैतिकता से नहीं, ताकत से चल रही है। अमेरिका वेनेजुएला के राष्ट्रपति को उठा लेता है। इसराइल गाजा को मलबे में बदल देता है। रूस यूक्रेन को कुचल रहा है। न कानून बचा है, न नियम, न मानवता—सिर्फ़ ताकत की भाषा।
इसी माहौल में यहां ताल ठोंककर कहा जाता है कि ‘पाक अधिकृत कश्मीर’ (पीओके) को वापस ले आएंगे, लेकिन अगर कल यही तिकड़ी लद्दाख, अरुणाचल या उत्तर-पूर्व को जोड़ने वाले नाजुक सिलीगुड़ी—‘चिकन नेक’ कॉरिडोर को निशाना बनाती है, तो भारत के पक्ष में कौन खड़ा होगा? जिस राष्ट्र ने नैतिकता को कमजोरी समझकर त्याग दिया हो, उसके लिए अंतरराष्ट्रीय समर्थन एक भ्रम से ज्यादा कुछ नहीं होता। जो समाज अपने ही अल्पसंख्यकों के अधिकारों पर चुप रहता है, उसकी पुकार पर दुनिया क्यों बोलेगी?
नफरत की राजनीति सिर्फ़ सामाजिक ताना-बाना नहीं तोड़ती—वह देश को कूटनीतिक, नैतिक और सामरिक रूप से भी अकेला छोड़ देती है। ऐसे समय में दुनिया के किसी कोने में कोई जोहरान ममदानी खड़ा होता है और नैतिकता का आइना दिखाता है। 2026 में भारतीय मूल के जोहरान ममदानी अमेरिका और दुनिया की आर्थिक राजधानी के पहले मुसलमान मेयर बने। उन्हें हराने में अमेरिकी सरकार और न्यूयॉर्क की सारी पूंजी झोंक दी गई।
अलबत्ता, गाजा पर इसराइल के हमले का कड़ा विरोध करने के बावजूद न्यूयॉर्क के यहूदियों ने बड़ी संख्या में ममदानी को वोट दिया। मोदी सरकार की आलोचना के बावजूद भारतीयों ने समर्थन दिया। गलत को गलत कहने की हिम्मत दिखाई तो गोरे-काले-पीले हर रंग के लोग एक लाख से भी बड़ी कार्यकर्ता फौज बन गए और उन्हें अभूतपूर्व जीत दिलाई। वे बेखौफ कहते रहे—अगर आप लोकतंत्र हैं, तो आपका वजूद आम लोगों की वजह से है। जनता के वोट और नोट से बनी सरकार का कोई काम कुछ उद्योगपतियों या गैर-कानूनी लोगों के लिए नहीं हो सकता।
सरकार को हर काम जनता के लिए करना होगा—और इसमें कोई धर्म, जात या राष्ट्रीयता आड़े नहीं आ सकती। एक बार फिर यह सिद्ध हुआ कि नैतिकता, प्रेम और सच्चाई किसी भी सरकार, हथियार या पूंजी से बड़ी होती है, लेकिन जो परिवार यह कहे कि भाई-चारे जैसा कोई शब्द ही शब्दकोष में नहीं—उसे कौन समझाए कि ऐसे देश नहीं चलते और न ही दुनिया चलती है! ये बात नेताओं को समझनी होगी।

