Friday, May 1, 2026
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Language Row: भाषा शहीद दिवस पर बोले MK स्टालिन—तमिलनाडु में हिंदी के लिए न जगह थी, न है और न कभी होगी

जनवाणी ब्यूरो |

नई दिल्ली: तमिलनाडु के मुख्यमंत्री और डीएमके अध्यक्ष एमके स्टालिन ने रविवार को भाषा शहीद दिवस के अवसर पर राज्य के ‘भाषा शहीदों’ को श्रद्धांजलि अर्पित की। इस मौके पर उन्होंने हिंदी थोपे जाने के मुद्दे पर एक बार फिर सख्त रुख अपनाते हुए कहा कि तमिलनाडु में हिंदी के लिए “न पहले जगह थी, न आज है और न भविष्य में कभी होगी।”

स्टालिन ने सोशल मीडिया पर साझा किए गए अपने संदेश में कहा कि तमिलनाडु ऐसा राज्य है, जिसने अपनी मातृभाषा को जीवन की तरह प्रेम किया है और हिंदी थोपने के हर प्रयास के खिलाफ हमेशा एकजुट होकर संघर्ष किया है।

हिंदी विरोधी आंदोलन का वीडियो किया साझा

मुख्यमंत्री ने भाषा आंदोलन के इतिहास से जुड़ा एक संक्षिप्त वीडियो भी साझा किया। इस वीडियो में वर्ष 1965 में चरम पर पहुंचे हिंदी विरोधी आंदोलन, उसमें शहीद हुए लोगों और डीएमके के संस्थापक नेता सीएन अन्नादुराई तथा पूर्व मुख्यमंत्री एम करुणानिधि के योगदान को दर्शाया गया है।

स्टालिन ने कहा कि तमिलनाडु ने हिंदी विरोधी आंदोलन का नेतृत्व करते हुए पूरे उपमहाद्वीप में विभिन्न भाषाई समुदायों के अधिकार और पहचान की रक्षा की।

‘अब भाषा के नाम पर कोई जान न जाए’

एमके स्टालिन ने तमिल भाषा के लिए अपने प्राण न्योछावर करने वाले शहीदों को नमन करते हुए कहा कि अब भाषा के नाम पर किसी को अपनी जान नहीं गंवानी चाहिए, लेकिन तमिल के प्रति प्रेम और उसकी रक्षा का संकल्प कभी कमजोर नहीं होगा। उन्होंने दोहराया कि तमिलनाडु हिंदी थोपे जाने के किसी भी प्रयास का विरोध करता रहेगा।

डीएमके और हिंदी विरोध की राजनीति

तमिलनाडु में ‘भाषा शहीद’ उन लोगों को कहा जाता है, जिन्होंने 1964-65 के दौरान हिंदी विरोधी आंदोलन में, मुख्य रूप से आत्मदाह के जरिए, अपने प्राणों की आहुति दी थी। डीएमके उन्हें तमिल अस्मिता और भाषा के प्रतीक के रूप में सम्मान देती है।

राज्य आज भी तमिल और अंग्रेजी की दो-भाषा नीति का पालन करता है। डीएमके लगातार केंद्र सरकार पर नई शिक्षा नीति 2020 के जरिए हिंदी थोपने का आरोप लगाती रही है।

द्रविड़ आंदोलन से जुड़ा है विरोध का इतिहास

डीएमके का हिंदी विरोध द्रविड़ आंदोलन की वैचारिक पृष्ठभूमि से जुड़ा हुआ है। पार्टी का मानना है कि हिंदी थोपना तमिल भाषा, संस्कृति और पहचान के लिए खतरा है। 1960 के दशक के हिंदी विरोधी आंदोलनों, विशेषकर 1965 के आंदोलन में हुई मौतों ने तमिलनाडु की राजनीति को गहराई से प्रभावित किया, जिसकी छाया आज भी राज्य की भाषा नीति और राजनीतिक रुख में दिखाई देती है।

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