- ढाई दशक बाद भी आवंटियों को प्लॉट पर कब्जा नहीं, कई-कई बार रजिस्ट्री
रामबोल तोमर |
मेरठ: खबर उन आवंटियों से जुड़ी है, जिन्होंने ढाई दशक पहले मेरठ विकास प्राधिकरण और आवास विकास परिषद से प्लॉट खरीदे थे। आवंटियों को प्लॉट का आवंटन उनके नाम हुआ तो उसके बाद प्लॉट का चुकता भुगतान सरकारी संस्थानों को आवंटी ने कर दिया, लेकिन इसे उन आवंटियों का दुर्भाग्य ही कहा जाएगा या फिर उनके साथ सरकारी सिस्टम के द्वारा की जा रही ठगी। चुकता भुगतान करने के बाद भी आवंटियों को प्लॉट पर कब्जा नहीं मिला।
दरअसल, आवास विकास परिषद ने जागृति विहार में किसानों की जमीन का अधिग्रहण किया गया था, जहां पर आवास विकास परिषद ने प्लॉट आवंटित किये। भूखंड तो आवंटित कर दिए, लेकिन महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि आवंटियों को आवास विकास परिषद प्लॉट पर कब्जा क्यों नहीं दिया?
आवंटी का भुगतान लेने के बाद भी उत्पीड़न क्यों किया जा रहा है? आवास विकास परिषद आवंटन को प्लॉट पर कब्जा नहीं दिला पा रहा है। इस तरह से करीब ढाई दशक बीत गए, लेकिन इसमें आवास विकास के खिलाफ ‘रेरा’ भी कुछ नहीं कर पा रहा है। यदि कोई प्राइवेट बिल्डर का इस तरह का मामला रहा होता तो उसके खिलाफ ‘रेरा’ धोखाधड़ी समेत तमाम धाराओं में मुकदमा दर्ज कर बिल्डर की गिरफ्तारी करा देता।
सरकारी संस्थान के खिलाफ कार्रवाई क्यों नहीं की जा रही है? यहां पर सरकार की दोगली नीति साफ दिखाई दे रही है। आखिर यह दोगली नीति कब तक चलेगी। यही नहीं, मेरठ विकास प्राधिकरण के भी कुछ इसी तरह के हालात हैं। ढाई दशक पहले शताब्दीनगर, गंगानगर, लोहियानगर व वेदव्यासपुरी विकसित करने के लिए जमीन का अधिग्रहण किया गया था।
यहां भी प्राधिकरण की तरफ से प्लॉटिंग कर आवंटियों को प्लॉट का आवंटन कर दिया था, लेकिन ढाई दशक बीतने के बाद भी आवंटी को प्लॉट नहीं मिला। ऐसे एक-दो मामले नहीं है, बल्कि अकेले शताब्दीनगर में 700 लोगों को प्लॉट आवंटित किए गए थे, जिनकी पूरी धनराशि मेरठ विकास प्राधिकरण में जमा कराई जा चुकी है, लेकिन उन्हें प्लॉट पर कब्जा नहीं मिला। वेदव्यासपुरी और गंगानगर में भी कुछ वैसे ही हालात हैं।
इस तरह की हरकत किसी प्राइवेट बिल्डर ने की होती तो अब तक उसके खिलाफ कई मुकदमे दर्ज कर गिरफ्तारी कर दी गई होती। यही नहीं, मेरठ विकास प्राधिकरण ने तो एक ही प्लॉट की कई कई बार रजिस्ट्री कर दी है। ऐसे भी मामले सामने आए हैं।
लोहियानगर में 17 मामले प्राधिकरण के अधिकारियों ने पकड़े थे, जिसमें एक महिला क्लर्क को प्राधिकरण ने बर्खास्त भी कर दिया है, लेकिन बड़ा सवाल ये है कि जिन को कई कई बार प्लॉटों की फर्जी रजिस्ट्री की गई। इसमें आम आदमी को तो नुकसान हुआ ही, मगर इसकी भरपाई कौन करेगा?
इसके लिए जवाबदेही किसकी है? महत्वपूर्ण तथ्य यह भी है कि आवंटी से प्राधिकरण पूरी धनराशि देने के बाद भी फ्री होल्ड चार्ज, बढ़ा हुआ प्रतिकार जैसी तमाम धनराशि आवंटियों से वसूली जाती है। फिर भी आवंटी को उसके प्लॉट पर कब्जा नहीं मिल पाता।
आखिर इस तरह की नीति कब तक चलेगी? जागृति विहार में किसान विरोध कर रहे हैं। शताब्दीनगर में भी किसान विरोध कर रहे हैं, लेकिन इसमें आवंटियों का क्या दोष हैं, जिनको पूरा भुगतान करने के बाद भी प्लॉट पर कब्जा नहीं मिला, वह भी 27 वर्ष बाद।

