Friday, March 20, 2026
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इस बार होलिका दहन में अशुभ भद्रा का नहीं योग

जनवाणी संवाददाता |

मेरठ: वैदिक सूत्रम चेयरमैन एस्ट्रोलॉजर पंडित प्रमोद गौतम ने होलिका दहन के सन्दर्भ में बताते हुए कहा कि इस बार 28 मार्च 2021 को होलिका दहन में अशुभ भद्रा का योग नहीं रहेगा। होलिका दहन के दिन भद्रा काल सूर्योदय से शुरू होगा और दोपहर में समाप्त होगा। यानी होलिका दहन का शुभ मुहूर्त शाम 6: 30 से रात 8:30 बजे तक सर्वाथ सिद्ध योग में हस्त नक्षत्र में होगा।

28 मार्च को पूर्णिमा तिथि मध्य रात्रि में 12 बजकर 19 मिनट तक रहेगी, 28 मार्च को भद्रा योग दोपहर 1:10 बजे तक ही रहेगा। एस्ट्रोलॉजर पंडित प्रमोद गौतम ने भद्रा काल के सन्दर्भ में बताते हुए कहा कि किसी भी मांगलिक कार्य में भद्रा योग का विशेष ध्यान रखा जाता है, क्योंकि भद्रा काल में मंगल-उत्सव की शुरूआत या समाप्ति अशुभ मानी जाती है अत: भद्रा काल की अशुभता को मानकर कोई भी धर्मिक रूप से आस्थावान व्यक्ति शुभ कार्य नहीं करता है।

आखिर क्या होती है भद्रा? और क्यों इसे अशुभ माना जाता है?

एस्ट्रोलॉजर पंडित प्रमोद गौतम ने भद्रा काल के रहस्यमयी तथ्यों के सन्दर्भ में बताते हुए कहा कि वैदिक पुराणों के अनुसार भद्रा भगवान सूर्य देव की पुत्री और ब्रह्माण्ड के न्यायाधीश शनि की बहन है। शनि की तरह ही इसका स्वभाव भी कठोर हमारे वैदिक हिन्दू शास्त्रों में बताया गया है।

भद्रा के स्वभाव को नियंत्रित करने के लिए ही भगवान ब्रह्मा ने उन्हें काल गणना या पंचांग के एक प्रमुख अंग विष्टि करण में स्थान दिया। भद्रा की स्थिति में कुछ शुभ कार्यों, यात्रा और उत्पादन आदि कार्यों को निषेध माना गया किंतु भद्रा काल में तंत्र कार्य, अदालती और राजनीतिक चुनाव कार्य सुफल देने वाले माने गए हैं।

पंडित प्रमोद गौतम ने पंचांग में भद्रा के महत्व के सन्दर्भ में बताते हुए कहा कि हिन्दू पंचांग के 5 प्रमुख अंग होते हैं। ये हैं- तिथि, वार, योग, नक्षत्र और करण। इनमें करण एक महत्वपूर्ण अंग होता है। यह तिथि का आधा भाग होता है। करण की संख्या 11 होती है। ये चर और अचर में बांटे गए हैं।

चर या गतिशील करण में बव, बालव, कौलव, तैतिल, गर, वाणिज और विष्टि गिने जाते हैं। अचर या अचलित करण में शकुनि, चतुष्पद, नाग और किंस्तुघ्न होते हैं। इन 11 करणों में 7 वें करण विष्टि का नाम ही भद्रा है। यह सदैव गतिशील होती है। पंचांग शुद्धि में भद्रा का खास महत्व होता है।

यूं तो ‘भद्रा’ का शाब्दिक अर्थ है ‘कल्याण करने वाली’ लेकिन इस अर्थ के विपरीत भद्रा या विष्टि करण में शुभ कार्य निषेध बताए गए हैं। वैदिक हिन्दू ज्योतिष विज्ञान के अनुसार अलग-अलग राशियों के अनुसार भद्रा तीनों लोकों में घूमती है। ज

ब यह मृत्युलोक में होती है, तब सभी शुभ कार्यों में बाधक या या उनका नाश करने वाली मानी गई है। जब चन्द्रमा कर्क, सिंह, कुंभ व मीन राशि में विचरण करता है और भद्रा विष्टि करण का योग होता है, तब भद्रा पृथ्वीलोक में रहती है। इस समय सभी कार्य शुभ कार्य वर्जित होते हैं। इसके दोष निवारण के लिए भद्रा व्रत का विधान भी धर्मग्रंथों में बताया गया है।

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