Sunday, May 31, 2026
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राजनीति की पाठशाला थे वीरेंद्र वर्मा

  • जिला बोर्ड के अध्यक्ष से राज्यपाल के पद तक पहुंचें वीरेंद्र वर्मा
  • राजनीति के साथ-साथ खेलों में भी वर्माजी की थी विशेष रूचि

राजपाल पारवा |

शामली: गंगा-यमुना के दोआब में राजनीति का पर्याय या यूं कहिए राजनीति की पाठशाला अगर कोई थे, तो वे थे वीरेंद्र वर्मा । अविभाजित मुजफ्फरनगर के नगर शामली (अब जनपद) से वीरेंद्र वर्मा देश में आजादी के बाद 1952 में हुए प्रथम उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के टिकट पर निर्वाचित हुए थे। उसके बाद उन्होंने फिर कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। प्रदेश सरकार में कई बार मंत्री और बाद में पंजाब और हिमाचल प्रदेश के राज्यपाल के पद तक पहुंचें। इतना ही नहीं, लोकसभा और राज्यसभा के सदस्य भी निर्वाचित हुए।

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किसान परिवार में जन्मे वीरेंद्र वर्मा

वीरेंद्र वर्मा का जन्म 18 सितंबर 1916 को शामली के एक किसान परिवार में उस समय हुआ था, जब देश में ब्रिटिश शासन था। शामली के जेएच स्कूल और फिर मुजफ्फरनगर के डीएवी स्कूल से हाईस्कूल की शिक्षा ग्रहण की। शिक्षा और कृषि के साथ-साथ कुश्ती, वॉलीबाल और फील्ड हॉकी के बेहतरीन खिलाड़ी ही नहीं रहे बल्कि कॉलेज स्तर पर कप्तान भी रहे। स्नातक के बाद मेरठ कॉलेज मेरठ से एलएलबी की डिग्री प्राप्त की। जिसके बाद आजादी के आंदोलन में भी बढ़चढ़ कर हिस्सेदारी की।

राजनीति के क्षेत्र में बढ़ते कदम

वीरेंद्र वर्मा ने एलएलबी करने के बाद युवास्था में ही राजनीति में पहला कदम उस समय बढ़ाया, जब वे 1948 में जिला बोर्ड, मुजफ्फरनगर के अध्यक्ष चुने गए। हालांकि इससे पहले वे कांग्रेस में कई पदों पर रह चुके थे। फिर, 1952 में कैराना दक्षिण विधानसभा सीट से कांग्रेस के टिकट पर जीतकर प्रदेश विधानसभा में कदम रखा। उस समय कांग्रेस का बोलबाला हुआ करता था। पांच साल बाद यानी 1957 को कैराना विधानसभा सीट से निर्वाचित हुए।

यह वह दौर था जब खेड़ीकरमू के चंदन सिंह ने भी राजनीति के क्षेत्र में चहलकदमी शुरू कर दी थी। इसलिए 1962 में जब कैराना विधानसभा से वीरेंद्र वर्मा ने चुनाव का शंखनाद फूंका तो उनके सामने निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में चंदनसिंह ने ताल ठोंक दी। इस चुनाव में वर्मा जी को हार का सामना करना पड़ा।

इसके बाद वीरेंद्र वर्मा 1962 में नवसृजित कांधला सीट से चुनाव जीते तो 1969 में बीकेडी की लहर में वे खतौली से निर्वाचित हुए। फिर, 1974 में बघरा सीट पर विजय पताका पहराई, लेकिन देश में आपातकाल के बाद 1977 में हुए विधानसभा चुनाव में बघरा सीट पर उनको निर्दलीय बाबूसिंह के सामने हार का सामना करना पड़ा।

1962 में बने पहली बार मंत्री

वीरेंद्र वर्मा के पुत्र डा. सतेंद्र वर्मा के अनुसार, उनके पिता पहली बार 1962 में प्रदेश की कांग्रेस सरकार के मंत्री मंडल में मंत्री बने। उसके बाद उनको अलग-अलग सरकारों में सिंचाई, बिजली, उद्योग, श्रम, शिक्षा, तकनीकी एवं गृह मंत्री जैसे महत्वपूर्ण मंत्रालय सौंपे गए। इन विभागों के मंत्री रहते हुए वर्माजी ने अनेक महत्वपूर्ण कार्य किए। उस समय वीरेंद्र वर्मा को राजनीति की पाठशाला कहने वालों की कमी नहीं थी। दरअसल, प्रदेश की राजनीति से वे अप्रैल 1984 से जून 1990 तक जहां वे राज्यसभा के सदस्य रहे, वहीं 1998 में सपा के मुनव्वर हसन को पराजित कर भाजपा के टिकट पर लोकसभा के लिए निर्वाचित हुए।

पंजाब और हिमाचल प्रदेश के रहे राज्यपाल

राज्य सरकार में राज्यपाल का पदा शीर्ष पद होता है। वीरेंद्र वर्मा जिला बोर्ड के अध्यक्ष के पद से विधायक, लोकसभा और राज्यसभा के सदस्य के साथ-साथ राज्यपाल के पद तक पहुंचें। जून 1990 से दिसंबर 1990 तक पंजाब के राज्यपाल रहे। तो, दिसंबर 1990 से जून 1993 तक हिमाचल के राज्यपाल के पद पर विराजमान रहे। अंतत: 2 मई 2009 को राजनीति का यह बुलंद सितारा अस्त हो गया।

चौ. चरणसिंह से हो गए थे वैचारिक मतभेद

पूर्व प्रधानमंत्री स्व. चौधरी चरणसिंह और वीरेंद्र वर्मा के बीच वैचारिक मतभेद रहे हैं। यहां तक जब 1971 में चौ. चरणसिंह मुजफ्फरनगर लोकसभा सीट से बीकेडी पर सीपीआई के ठा. विजयपाल सिंह, बिराल के सामने चुनाव हार गए तो वीरेंद्र वर्मा पर चौ. चरणसिंह को चुनाव हरवाने के आरोप लगे। हालांकि वीरेंद्र वर्मा के पुत्र डा. सतेंद्र वर्मा का कहना है कि चौ. चरणसिंह ने वर्माजी को लोकदल का कोषाध्यक्ष बनाया था।

इस पर उनके पिता ने कोषाध्यक्ष होने के नाते हिसाब-किताब मांग लिया था, बस! यही नाराजगी का कारण रहा था। इससे ज्यादा कुछ भी नहीं था। दूसरी ओर, राजनीति गलियारों में ये भी चर्चा रही कि 1971 में चौ. चरणसिंह के मुजफ्फरनगर से हारने के बाद उनकी हार का बदला लेने के लिए उनकी पत्नी गायत्री देवी ने वीरेंद्र वर्मा के गढ़ कैराना लोकसभा सीट से 1980 में चुनाव लड़ा और उस समय वीरेंद्र वर्मा के करीबी नारायण सिंह को पराजित किया।

ईमानदार छवि के नेता थे वीरेंद्र वर्मा

केंद्र की राष्ट्रीय मोर्चा की सरकार में वीपी सिंह दो दिसंबर 1989 से 10 नवंबर 1990 तक देश के प्रधानमंत्री रहे। इस दौरान वीरेंद्र वर्मा राज्यसभा के सदस्य थे। इसी दौरान वीपी सिंह के पुत्र अजय प्रताप सिंह सेंट किट्स प्रकरण को लेकर चर्चाओं में आए। मामला संसद में गूंजा तो वीपी सिंह ने प्रकरण की जांच के लिए वीरेंद्र वर्मा का नाम सुझाया था। दरअसल, वीपी सिंह की नजरों में वीरेंद्र वर्मा ईमानदार नेता था। बता दें, कि लोकदल में कोषाध्यक्ष बनने के बाद वे ईमानदार नेता के रूप में जनता के सामने उभरे थे।

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बेटे की राजनीति नहीं चढ़ी परवान

वीरेंद्र वर्मा के पुत्र डा. सतेंद्र वर्मा वर्तमान में शामली में होम्योपैथिक क्लीनिक चलाते हैं। उन्होंने 2012 में भाजपा के टिकट पर शामली विधानसभा से चुनाव लड़ा लेकिन महज 9105 मतों पर ही सिमट गए। उनके सामने कांग्रेस के पंकज मलिक ने जीत हासिल की थी। उसके बाद डा. सतेंद्र वर्मा ने फिर कभी राजनीति में अपना भाग्य नहीं आजमाया।

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