- पुरातत्वविद टीले से प्राप्त अवशेषों से खुलेगा महाभारत कालीन काल खंड का रहस्य
जनवाणी संवाददाता |
हस्तिनापुर: पुरातत्व विभाग की ओर से ऐतिहासिक साक्ष्यों की खोज के लिए महाभारत कालीन तीर्थ नगरी स्थित उल्टा खेड़ा टीले पर उत्खनन किया जा रहा है। अभी तक मिले अवशेषों के आधार पर खंडित मूर्ति लंबी दीवार मिली हैं। जो सुर्खी और चूने से बना है। खंडहर की जर्जर दीवार, बुलंद इमारत की दास्ता बयां करती है। ठीक इसी तर्ज पर पुरातत्वविद टीले से प्राप्त अवशेषों को देखकर यहां के प्राचीन इतिहास का अनुमान लगा रहे हैं।

प्राचीन भारतीय इतिहास संस्कृति एवं पुरातत्व विभाग के आर्थिक सहयोग से उल्टा खेड़ा टीले का उत्खनन एवं शोध कार्य चल रहा है। उत्खनन विभाग के अधिकारियों की माने तो अब तक पाच खातों का उत्खनन एवं टीले को सेक्शन डीपिंग की गई। इनमें से तीन खातों में प्राकृतिक मिट्टी का जमाव तक उत्खनन हुआ। सेक्शन डीपिंग के दौरान टीले के पश्चिमी तथा दक्षिणी हिस्से में शुंग, कुषान कालीन पक्की र्इंटों के आठ तह के संरचनात्मक अवशेष पाए गए हैं।
महाभारत काल सहित कई कालों के खुलेंगे राज
अवशेषों के अवलोकन व शोध से यह ज्ञात होता है कि टीले का व्यापक विस्तार था। यह स्थल समृद्ध रहा होगा। ताम्र पाषाण काल की संभावना रही होगी। स्थल के क्षैतिज उत्खनन से इसके विभिन्न आयामों तथा सास्कृतिक सन्नीवेष का पता चलेगा। यहां से उत्खनन में उत्तरी कालीन चमकीली मृद-भाड तथा इसके पूर्व के सास्कृतिक अवशेष मिले हैं। जिनकी क्षितिज आज से लगभग 3000 वर्ष पूर्व संभावित है।

70 साल बाद पांडवों की राजधानी हस्तिनापुर में फिर उत्खनन शुरू हो गया है। हस्तिनापुर के उल्टा खेड़ा और पांडव टीला में उत्खनन का कार्य आरम्भ हो गया है। एएसआई के अधिकारियों को उम्मीद है कि इस बार खुदाई से हस्तिनापुर में हजारों वर्ष पुराने महाभारत सहित कई कालों के राज पर से पर्दा उठेगा। अभी तक की खुदाई में मिले अवशेषों में अधिकांश अवशेष मौर्य काल के है।
खुदाई में मिले अवशेष
यहां से प्राप्त पुरातत्व अवशेषों में लौह अयस्क किल, हसिया, ताम्र सलाका, टेराकोटा की मूर्तिया, शतरंज की मोहरें, मंकी, चूड़िया, लैम्पी, कौड़ी, बर्तनों में इंकपाट, कटोरा, थाली, गिलास, कटोरी, घड़ा, खाना बनाने का बर्तन उत्तर कालीन चमकीली मृद-भाड की डिलक्स वेराइटी, मौर्य कालीन सिक्का समेत अन्य अवशेष मिले है।
बूढ़ी गंगा में हुए उत्खनन में हुई थी महाभारतकालीन सभ्यता की पुष्टि
1950-51 में भारतीय पुरातत्व के प्रो. बीबी लाल ने महाभारत कालीन तीर्थ नगरी स्थित उल्टा खेड़ा टीले के कुछ हिस्से में उत्खनन का कार्य किया था। प्रो. बीबी लाल ने उत्खनन कराया, जहां से कांच और क्रिस्टल से बने रंगीन बर्तनों के टुकड़े मिले, जो करीब चार हजार वर्ष पुराने आंके गए। प्रो. बीबी लाल ने बूढ़ी गंगा में उत्खनन कराया और बोरवेल से यही बर्तन दोबारा मिले। इससे महाभारतकालीन विकसित सभ्यता की पुष्टि हो गई। बाद में यह सभ्यता गंगा की बाढ़ में बह गई थी।

