एपी भारती
टूथपेस्ट के क्षेत्र में उत्पादक कंपनियां एक से बढ़कर एक दावे कर रही हैं। कोई टूथपेस्ट निर्माता कहता है, उसका टूथपेस्ट दांतों की सड़न से अधिकतम सुरक्षा देता है तो कोई कहता है, उसका टूथपेस्ट कीटाणुओं से लगातार लड़ता है। एक से बढ़कर एक दावे किए जाते हैं। ऐसे में उपभोक्ता चकरा जाता है कि आखिर कौन सा टूथपेस्ट अच्छा है। वह बार-बार ब्रांड बदलता है लेकिन सामान्यत: स्वाद के अतिरिक्त उसे किसी टूथपेस्ट में कोई बदलाव नजर नहीं आता। सबसे बड़ी बात यह है कि उपभोक्ता को यह भी पता नहीं होता कि टूथपेस्ट किन पदार्थों से बना है। यही नहीं, विज्ञापनदाता द्वारा किए गए वायदों को अगर टूथपेस्ट पूरा नहीं करता तो उसे दंडित करने का प्रावधान भी न के बराबर है।
टूथपेस्ट ‘ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक रूल्स’ के अधीन आता है मगर ‘कॉस्मेटिक्स’ और ‘पैकेज्ड कमोडिटिज’ के लिए बनाए गए नियमों में यह प्रावधान नहीं है कि निर्माता उपभोक्ता को उन पदार्थों का ब्यौरा दे जो टूथपेस्ट में इस्तेमाल किए गए हैं। पेस्ट निर्माण में मानक आईएसआई द्वारा तय किए गए हैं। यह अजीब सा मामला है। मानक आईएसआई के हैं मगर टूथपेस्ट ‘ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स रूल्स’ के अधीन हैं।
एक नजर उन पदार्थों पर भी डाल लेना जरूरी है जिनसे टूथपेस्ट बनता है। टूथपेस्ट में सर्वाधिक मात्रा खड़िया मिट्टी की होती है। इसका प्रतिशत 85 से 95 तक होता है। रुपए-दो-रुपए किलो वाली यही मिट्टी हमें कुछ अन्य पदार्थों के साथ कई सौ रुपए किलो बेची जाती है। ब्रांडेड कंपनियों का 100 ग्राम पेस्ट 30 से 50 रुपये तक बिकता है। पेस्ट के व्यापार में भारी मुनाफा है। यहां प्रस्तुत हैं उन अन्य पदार्थों के परिचय जो पेस्ट में होते हैं।
पोटेशियम नाइट्रेट, ट्राइक्लोसैन, फ्लोराइड, हाइड्रोजन परआक्साइड, जिंक सिट्रेट, गैनटेÑज, कार्बोमाइड परआक्साइड आदि पदार्थों का मामूली मात्रा में इस्तेमाल होता है। पालिशिंग अथवा एबरेसिव तत्व दो तरह से काम करते हैं। एक तो ये दांतों से प्लाक हटाते हैं। इससे नया प्लाक जमने की संभावना कम रहती है। दूसरे ये दांतों से दाग धब्बे दूर कर दांतों पर पालिश सी करते हैं। अगर किसी टूथपेस्ट के इस्तेमाल से आपके एनेमल या डेंटीन को हानि पहुंच रही हो तो टूथपेस्ट तुरंत बदलें, क्योंकि यह एबरेसिव तत्वों की अधिक रसायनिक मात्रा के कारण होता है।
बाइंडर वह पदार्थ होता है जिससे पेस्ट बना रहता है। यह न हो तो पेस्ट का पानी अलग और मिट्टी अलग हो जाएगी, टूथपेस्ट दबाने से कभी पानी निकलेगा तो कभी कचरा। ह्यूमेक्टेंट वह चीज है जो पेस्ट को नमीदार बनाए रखता है। इसके कारण पेस्ट वर्षों नहीं सूखता। ह्यूमेक्टेंट पेस्ट को मिठास भी देता है। फ्लेवरिंग एजेंट से पेस्ट स्वादिष्ट बनता है। अलग-अलग कंपनियां अपने पेस्ट का स्वाद दूसरे से पृथक रखने को पृथक-पृथक फ्लेवरिंग एजेंट इस्तेमाल करती हैं। जिन पेस्टों में झाग होता है उनमें फ्लूरीन नामक तत्व होता है। झाग से टूथपेस्ट मुंह में आसानी से फैलता है। इसका प्रभाव कीटाणुनाशक होता है, जिससे प्लॉक की शक्ति क्षीण होती है। जिन पेस्टों में पेस्ट के मूल तत्वों के साथ फ्लोराइड, ट्राइक्लोसेन, पोटेशियम नाइट्रेट और कैल्शियम होता है, वे टूथपेस्ट ‘एंटी कैविटी’ ‘एंटी सेंसिटिविटी’ या ‘एंटी प्लाक’ कहलाते हैं। अधिक सफेदी के लिए पेस्टों में एलूमिना, हाइड्रोजन परआॅक्साइड या कार्बोमाइड परआॅक्साइड मिलाए जाते है। दांतों की मजबूती का काम कैल्शियम करता है। मानक के अनुसार ट्राइक्लोसैन टूथपेस्ट में 0.3 प्रतिशत होना चाहिए और फ्लोराइड प्रति करोड़ तत्वों में 900 से 1000 तक।
एक महत्त्वपूर्ण तथ्य यह है कि टूथपेस्ट के तत्व एक निर्धारित अवधि तक ही कारगर होते हैं। पुराने टूथपेस्ट के तत्व प्रभावहीन हो जाते हैं चाहे वह टूथपेस्ट किसी भी कंपनी का हो और कंपनी चाहे कोई भी दावा करे, इसलिए नया पेस्ट ही इस्तेमाल करें, अधिक पुराना नहीं। बहुत संभव है कि पुराना टूथपेस्ट दावों से इतर उलटा असर करे इसलिए दावों पर न जाएं। अपना मुनाफा बढ़ाने को कंपनियां आपको मूर्ख बनाती हैं।
कभी भी दांतों में कोई दिक्कत आए तो अच्छे विशेषज्ञ दंत चिकित्सक विशेषज्ञ से जांच कराएं और टूथपेस्ट पर उसकी राय ले लें। यह भी ध्यान रखें कि ब्रश तीन मिनट से अधिक न करें। अधिक रगड़ने से दांतों में खरोचें हो सकती हैं। ब्रश करने का सबसे अच्छा तरीका यह है कि ब्रश दाएं बाएं लाने के बजाए ऊपर नीचे चलाएं। पेस्ट की मात्रा भी संतुलित हो, अधिक से अधिक ब्रश एरिया का एक चौथाई।
हम अपने तरह-तरह के अधिकारों की लड़ाई लड़ते रहते हैं। हमारी एक मांग अब यह भी होनी चाहिए कि ट्यूब के ऊपर उन वस्तुओं का ब्यौरा भी छापा जाए जो टूथपेस्ट में इस्तेमाल की गई हैं। आखिर एक मोटी रकम हम टूथपेस्ट पर खर्च करते हैं तो हमें यह जानने का अधिकार तो है ही कि हम क्या चीज किस मात्रा में इस्तेमाल कर रहे हैं।

