
टोरंटो (कनाडा) निवासी व्यंग्यकार धर्मपाल महेंद्र जैन की व्यंग्य कृति ‘भीड़ और भेड़िए’ पाठकों की चेतना को झकझोरने और आत्म साक्षात्कार करवाने की बहुत हद तक कोशिश करते दिखे हैं। यद्यपि संग्रह की रचनाएं आकार में छोटी हैं, लेकिन विषय के निर्वहन में पूर्णता लिए हुए हैं। उन्होंने विभिन्न रचनाओं में लोकतंत्र के ठेकेदारों, साहित्य के मठाधीशों,भूलोक के हैकरों और सोशल मीडिया के बागड़बिल्लों की जमकर खबर ली है। संग्रह की लगभग आधा सैकड़ा रचनाओं में बीमारियां जानी पहचानी है, लेकिन ट्रीटमेंट नए तरीकों से किया गया है। रचनाओं में वाच्यार्थ की जगह व्यंग्यार्थ कहीं अधिक ध्वनित हुआ है। इससे यह बात साबित होती है कि व्यंग्य में विचार ही प्रधान है। संग्रह में गौर करने लायक बात यह कि किसी क्रिकेट टीम के बल्लेबाजी क्रम की तरह लेखक ने मेरे हिसाब से अपनी वजनदार रचनाएं टॉप आॅर्डर में रखी हैं। हम पाते हैं कि संग्रह की प्रतिनिधि रचना ‘भीड़ और भेड़िए’ प्रथम पायदान पर है। इसी तरह ‘प्रजातन्त्र की बस’, ‘दो टांग वाली कुर्सी’ और ‘भैंस की पूंछ’ क्रमश: दूसरे, तीसरे और चौथे स्थान पर रखी हैं। शुरुआती रचनाएं पाठकों को जोरदार व्यंग्य की दावत देती हैं। ‘भीड़ और भेड़िए’ रचना में प्रतीकों के माध्यम से व्यंग्यकार ने देश के भीड़तंत्र/भेड़तंत्र और भेड़ियातंत्र पर गंभीर बातें कही हैं। जैसा कि व्यंग्यकार ने पहले ही अपना मंतव्य स्पष्ट कर दिया था कि वे किस तरह के व्यंग्य के पक्षधर हैं, सो संग्रह की रचनाओं में भरपूर विट है, लेकिन भरपूर ह्यूमर नहीं। जब कड़वी गोली सीधे-सीधे गले उतरती हो तो दूध के साथ पिलाने की अनिवार्यता क्यों? कहने से आशय रचनाएं पाठकों को बांधें रखने में सफल हैं। मध्यप्रदेश के ठेठ वनवासी अंचल झाबुआ से निकलकर कनाडा के टोरंटो में बैठकर व्यंग्य लिखने वाले धर्मपाल महेंद्र जैन दूरदृष्टि सम्पन्न व्यंग्यकार हैं। जन के मानस स्तर पर जाकर व्यंग्य निकालना वे बखूबी जानते हैं। मुझे पक्का भरोसा है कि ‘भीड़ और भेड़िए’ आप पढ़ना शुरू करेंगे तो पढ़ कर ही रहेंगे।
पुस्तक: भेड़ और भेड़िए, लेखक: धर्मपाल महेंद्र जैन, प्रकाशक: भारतीय ज्ञानपीठ, दिल्ली, मूल्य: 260 रुपये
मुकेश राठौर


