आदमी यदि थोड़ा बहुत भी समझदार है, संवेदनशील है और जिंदगी की ऊंच-नीच को समझता है, तो वह टेंशन लेने से बच नहीं सकता। वैसे भी यह तो मुफ्त में मिला करता है, लेकिन यदि इसका निदान करना चाहे, तो इसकी प्रक्रिया बेहद खर्चीली हुआ करती है। एक बार दवा ली तो फिर आजीवन ही लेना पड़ती है। इसलिए यह जरूरी है कि आदमी हर परिस्थिति में बिंदास रहे। यूं भी जमाने में संताप बहुत है, ऐसे में कौन-कौन से संताप को तोते की तरह पालेंगे! इसलिए बेहतर यही है कि उंगली कट जाए तो हाथ के सलामत रहने का जश्न मना लिया जाए। एक जेब कट जाए तो बाकी जेब की सलामती के उत्सव मना लिया जाए। यानी कि अपनी दृष्टि को विपरीत से विपरीत परिस्थिति में भी अत्यंत सकारात्मक रखा जाए।
व्यवहार में देखा गया है कि ठस प्रवृत्ति आत्मसात कर लेने के चलते दिल और दिमाग में किसी भी प्रकार का टेंशन घर नहीं कर सकता। चतुर सुजान कहते है कि जितना हम अध्ययन करते जाते हैं, उतनी ही मात्रा में हमें अपने अल्पज्ञान का बोध हुआ करता है। कभी-कभी जरूरत से ज्यादा ज्ञान आदमी को उलझा कर रख दिया करता है। इसलिए किसी भी चीज या विषय को लेकर बहुत बारीकी करने का यह जमाना नहीं है। दरअसल हमें हर किसी बात को फौरी तौर पर ही लेना चाहिए। अनावश्यक रूप से किसी विषय में बहुत ज्यादा गोते लगाने के चलते डूब जाने की संभावना बलवती हो जाती है।
रोजमर्रा की जिंदगी में ऐसे वाकये आम हुआ करते हैं कि इसके साथ यह नहीं खाना और उसके साथ वह नहीं खाना। ऐसा होने पर ऐसा नहीं करना और वैसा होने पर वैसा नहीं करना। इसके चलते कभी-कभी तो आदमी एकदम पगला सा जाता है। तुलनात्मक रूप से औसत बुद्धि से कमतर बुद्धि वाली शख्सियत के लिए उसकी अज्ञानता भी उसके लिए वरदान सिद्ध हो जाती है। उसे किसी बात की चिंता नहीं हुआ करती। लोग क्या कहेंगे, लोग क्या सोचेंगे, लोग क्या समझेंगे? दुनिया वाले क्या सोचेंगे? इस तरह की एकतरफा चिंता से ऐसी शख्सियत कोसों दूर हुआ करती है। मजे में जो मन मे आया वह किया। मनचाहा खाया और पीया। गरज यह कि ऐसी शख्सियत अपने मन की मालिक सिद्ध हुआ करती है।
वैसे इतना जरूर है कि आदमी को अपनी अकल साथ रखनी चाहिए। लेकिन अपनी अकल अपने ही गले पड़ जाए, तो अकल का बोझा ढोना पड़ सकता है। अधिक समझदार लोग अपनी ही अकल के बोझ के चलते मन मार कर जीने को विवश है। इसके विपरीत अकाल के कच्चे खिलाड़ी जिंदगी का सच्चा मजा लेते दिखाई देते है। जब दुनिया में विश्वयुद्ध की आशंका बलवती होने लगी थी, दुनिया की खबर रखते वाले आशंकित अवस्था को प्राप्त करने लगे थे। लेकिन जिसे अणु परमाणु का एबीसीडी भी नहीं मालूम, वह तो बड़े मजे से रिमझिम वर्षा के दौर में गरमा गरम पकौड़ों का चाय के साथ आनंद ले रहे थे।

