Thursday, December 9, 2021
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रस्मी भावुकता का हासिल ?

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‘कारवां गुजर गया’ जैसे कई अमर गीत देने वाले ‘गीतों के राजकुमार’ गोपालदास ‘नीरज’ अपने समकालीन कवि अटल बिहारी वाजपेयी को ‘जिगर का टुकड़ा’ बताया करते थे। दोनों की दोस्ती के कई किस्से आज भी कहे जाते हैं। लेकिन एक बार अपने एक साक्षात्कार में उन्होंने अटल को कोरी भावुकता का कवि बता दिया और किसी मुंहलगे ने इसे उनके द्वारा अटल की आलोचना मानकर कारण पूछा तो कहने लगे, ‘मैं अटल की नहीं, उनकी भावुकता की आलोचना कर रहा हूं। इसलिए कि जानता हूं, कोरी भावुकता कहीं नहीं ले जाती।’ यह बात गत रविवार को अचानक तब अचानक बहुत याद आई, जब राष्ट्रपति रामनाथ कोविन्द कानपुर देहात जिले में स्थित अपने पैतृक गांव परौंख पहुंचे और हैलीपैड से उतरते ही आह्लादित से होकर उसकी धरती को झुककर प्रणाम किया। अखबारों ने लिखा है कि उन्होंने अपनी मातृभूमि की माटी को माथे से लगाया। फिर कहा, ‘मैं कहीं भी रहूं, मेरे गांव की मिट्टी की खुशबू और मेरे गांव के निवासियों की यादें सदैव मेरे हृदय में विद्यमान रहती हैं।’

उनके द्वारा अपने गांव में प्रदर्शित यह भावुकता इस अर्थ में बहुत स्वाभाविक है कि हर किसी को अपनी जन्मभूमि से लगाव होता ही है। लेकिन चूंकि वे राष्ट्रपति हैं, उनकी भावुकता को हर किसी की भावुकता जैसी होने की इजाजत नहीं दी जा सकती। फिलहाल, वह मोटे तौर पर दो सवाल खड़े करती है। पहला यह कि राष्ट्रपति के गांव के लिए उनकी इस कोरी अथवा रस्मी भावुकता का हासिल क्या है? सिवा इसके कि वह देश के दूसरे गांवों में उसके प्रति व्यर्थ का डाह पैदा कर दे। और दूसरा यह कि क्या किसी राष्ट्रपति के लिए उसके देश की धरती का कण-कण उसकी मातृभूमि की माटी जितना ही नमनीय नहीं होना चाहिए?

अन्यथा समझे जाने का खतरा उठाकर भी यहां देश के पहले प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू की वसीयत का यह अंश याद दिलाना होगा : मैं चाहता हूं, कि मेरे मरने के बाद कोई धार्मिक रस्में अदा न की जाएं।…विदेश में मरूं तो मेरे शरीर को वहीं जला दिया जाए, और मेरी मृट्ठी भर अस्थियां इलाहाबाद के पास गंगा में डाल दी जाएं, जिससे वे उस महासागर में पहुंच सकें, जो हिंदुस्तान को घेरे हुए है। मेरे भस्म के बाकी हिस्से को हवाई जहाज में ऊंचाई पर ले जाकर बिखेर दिया जाए, उन खेतों पर, जहां भारत के किसान मेहनत करते हैं, ताकि वह भारत की मिट्टी में मिल जाए और उसी का अंग बन जाए।

ठीक है कि आज के विडम्बनाभरे समय में हम रामनाथ कोविन्द से देश के आगे अपनी जन्मस्थली वगैरह का मोह त्यागने की पं. नेहरू जैसी अपेक्षा नहीं कर सकते। लेकिन उन्हें नेहरू द्वारा डाली गई परंपराओं के सर्वथा विलोम में भी कैसे बदलने दे सकते हैं? यह क्या कि एक ओर वे अपने गांव के प्रति इतने भावुक नजर आएं कि उसके निवासियों से कहें कि मेरी आपसे प्रोटोकॉल के तहत ही कुछ दूरी है, अन्यथा कोई दूरी नहीं है, आप अपनी बात और शिकायतें बेहिचक हम तक पहुंचा सकते हैं, और दूसरी ओर नेहरू अपनी भस्म को भारत के जिन किसानों के खेतों में मिलाना चाहते थे, उनके भारत के राष्ट्रपति को लिखे रोषपत्र के जवाब का इंतजार लंबा होता जाने दें।

और तो और, किसानों की इस उम्मीद को भी नाउम्मीद कर दें कि ‘बाबासाहब द्वारा बनाए संविधान के पहले सिपाही होने के नाते आप ऐसे असंवैधानिक, अलोकतांत्रिक और किसान विरोधी कानूनों पर हस्ताक्षर करने से इंकार कर देंगे, जो अलोकतांत्रिक भी हैं और जिन्हें बनाने से पहले किसानों से कोई राय मशवरा नहीं किया गया-उलटे अध्यादेश के माध्यम से चोर दरवाजे से लागू किया गया, संसदीय समितियों के पास भेज कर उन पर जरूरी चर्चा नहीं कराई गई और संसद में पास करते वक्त राज्यसभा में वोटिंग तक नहीं करवाई गई।’

यहां एक और सवाल उठाया जा सकता है कि अपने गांव और उसके लोगों के प्रति इतनी भावुकता प्रदर्शित करने वाले राष्ट्रपति गांवों के प्राण और देश के अन्नदाता कहे जाने वाले किसानों के दु:खदर्दों के प्रति जरा से भी भावुक क्यों नहीं होते? इसके उलट अपने ट्वीट में अपनी सक्सेस स्टोरी क्यों बयान करने लगते हैं? यह लिखकर कि कभी मैंने सपने में भी कल्पना नहीं की थी कि गांव के मेरे जैसे एक सामान्य बालक को देश के सर्वोच्च पद के दायित्व-निर्वहन का सौभाग्य मिलेगा, लेकिन हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था ने यह करके दिखा दिया! इस ट्वीट से लगता है कि वे राष्ट्रपति के अपने कार्यकाल की साल भर से कुछ ज्यादा अवधि बाकी रहते ही कृतकृत्य से हुए जा रहे हैं, जबकि आम देशवासियों के नजरिये से देखें तो यह वक्त इस लोकतंत्र की विडम्बनाओं पर दु:खी होने का है, खुद पर उसके उपकार गिनाने का नहीं। यह बताने का कि जब उसने उन्हें देष के सर्वोच्च पद के दायित्व निर्वहन का दायित्व सौंपा तो उन्होंने उसे किस तरह निभाया?

देश के प्रथम नागरिक के तौर पर उनका इस लोकतंत्र की विडम्बनाएं देखना देश के अंतिम पायदान पर खड़े निवासियों को बहुत बल प्रदान करता। उनके जैसे अनेक सामान्य बालकों को भी, जिनकी रात की अभी भी कोई सुबह नहीं है और हालात इतने विकट हैं कि वे उस लोकतांत्रिक प्रतीकवाद से भी कोई उम्मीद नहीं रख पा रहे, जो कभी उन्हें बहुत उत्साहित करता था। उसके तहत ही कभी उन्होंने देश के पहले प्रधानमंत्री को चाचा बनाकर अनेक सुनहरे सपने देख डाले थे।

इस प्रतीकवाद के सुनहरे दौर को याद किया जाए तो याद आता है, पहला शिक्षक राष्ट्रपति बना तो देश के शिक्षक अपने भविष्य को लेकर ऐसी उम्मीदों से भर गए थे, जो लगता था कि कभी खत्म ही नहीं होंगी। लेकिन आज? उनका दुर्भाग्य कि वे ‘अपने राष्ट्रपति’ की तरह इसको देश के लोकतंत्र का कमाल भी नहीं बता सकते। उनको सिर्फ राष्ट्रपति को यह कहते हुए सुनने की सहूलियत हासिल है कि देश में आजादी के बाद बहुत विकास हुआ है और हम सबका दायित्व है कि किसी तरह के आवेश में आए यानी शिकायती हुए बिना विकास में सहयोग करते रहें। खुद राष्ट्रपति भले ही विशाल राष्ट्रपति भवन में रहने और सबसे ज्यादा वेतन व सुविधाएं पाने के बावजूद शिकायत करने लगें कि उन्हें जो पांच लाख रुपये मिलते हैं, उनमें से पौने तीन लाख टैक्स में चले जाते हैं और उनसे कहीं ज्यादा अधिकारियों को मिलते हैं-शिक्षकों को तो सबसे ज्यादा।

काश, यहां हम दो सवाल पूछ सकते। पहला यह कि राष्ट्रपति के अपने वेतन से पौने तीन लाख रुपये टैक्स अदा करने के बारे में सच कौन बोल रहा है? खुद राष्ट्रपति या यह दावा करने वाली सरकार कि राष्ट्रपति का वेतन करमुक्त है? दूसरा सवाल यह कि क्या राष्ट्रपति का गांव ‘किसी और दुनिया’ में है कि उसमें दूसरे गांवों जैसे व्यवस्था के मारे ऐसे शिक्षक नहीं पाए जाते हैं जो निजी स्कूलों में दो तीन हजार रुपये में महीने पर खटने को अभिशप्त हैं? अगर उनका गांव हमारी ही दुनिया में है तो कहना होगा कि उसकी माटी को माथे लगाने का दिखावा करने से कहीं ज्यादा जरूरी यह है कि वे उसके इस दूसरे पहलू पर भी गौर फरमाएं। यकीनन, ऐसा करके वे देश और देशवासियों की कहीं ज्यादा सेवा करेंगे।


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