- एक अप्रैल से शुरू होने जा रहा नया सत्र
- सरकारी विद्यालयों में कम होगी छात्रों की संख्या
जनवाणी संवाददाता |
मेरठ: सरकारी स्कूलों से हर साल बच्चों और उनके पालकों का मोहभंग हो रहा है। यहीं कारण है कि हर बच्चे को प्रारंभिक शिक्षा से जोड़ने के लिए शासन द्वारा चलाई जा रही कई योजनाओं और सुविधाओं के नाम पर गांव-गांव में स्कूल खोलने के बावजूद इनमें पढ़ने वालों बच्चों की संख्या लगातार कम हो रही है। सरकारी स्कूलों में शिक्षा का स्तर कब सुधरेगा।
आखिर यह सुधरेगा भी या नहीं। कम से कम जो हाल है उसमें तो उसके सुधरने की उम्मीद दूर-दूर तक कहीं दिख नहीं रही है। इन स्थितियों से अभिभावक बेहद चिंतित हैं। सरकारी स्कूलों में घटती बच्चों की संख्या इसी का नतीजा भी है। यूं तो सरकारी स्कूलों की दयनीय दशा और गिरती शिक्षा से सभी वाकिफ हैं।
कहने को शिक्षा का स्तर सुधारने की दिशा में भले ही सरकार गंभीर है, लेकिन वास्तविकता के धरातल पर स्थिति भिन्न है, उलट है। तमाम प्रयास किए गए कि बच्चों का शिक्षा के प्रति लगाव बढ़े। इसको दृष्टिगत रखते हुए विद्यालयों में आकर्षक छात्रवृत्ति, मध्यान्ह भोजन, नि:शुल्क पुस्तकें, स्कूल यूनिफार्म जैसी कई योजनाएं संचालित की जा रही हैं।
यही नहीं, बल्कि विद्यालयों में कुशल शिक्षकों की तैनाती की गई है ताकि नौनिहालों को बेहतर शिक्षा दी जा सके। बावजूद इसके शिक्षा का स्तर ऊपर उठने को कौन कहे और गिरता जा रहा है। यही कारण है कि लोगों का सरकारी शिक्षा व्यवस्था से मोह भंग हो चुका है। लोग अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों में भेजना ही नहीं चाहते। इस बाबत अभिभावकों का कहना है कि सरकारी स्कूलों में दाखिला कराने का मतलब बच्चों का भविष्य बरबाद करना है।
एक अप्रैल सभी विद्यालयों में नया सत्र शुरू होने जा रहा है, लेकिन इस बार सरकारी विद्यालयों में बड़ी संख्या में छात्र कम होने की संभावना है। कारण यह कि कोरोना काल में निजी स्कूलों द्वारा फीस की मांग करने बाद छात्रों के अभिभावकों ने सरकारी विद्यालयों का रूख किया गया था, लेकिन अब कोरोना संक्रमण काफी कम हो गया है तो छात्र भी फिर से निजी विद्यालायों का रूख करेगे।
फरवरी 2020 में कोरोना ने देश में अपने पैर पसारने शुरू किए थे जिसके बाद इसका प्रकोप लगातार बढ़ता गया। मार्च 2021 में दूसरी लहर आई, जिसका असर स्कूलों पर भी पड़ा। स्कूलों में अवकाश घोषित किया जाने लगा और छात्रों को आॅनलाइन शिक्षा दी गई। इसी बीच निजी स्कूलों ने अभिभावकों से फीस की मांग की तो अधिकतर छात्रों के परिजनों ने सरकारी विद्यालयों का रूख कर लिया।
इस वजह से सरकारी विद्यालयों में छात्रों की संख्या बढ़ गई थी, लेकिन अब कोरोना नियमों के समाप्त होने के बाद बड़ी संख्या में छात्रों का रूख निजी विद्यालयों की ओर होने की संभावना है।
सरकारी विद्यालयों में पढ़ने वाले छात्रों को मिलता है पैसा
कोरोना काल में सरकारी विद्यालयों में अपने बच्चों को पढ़ानें के लिए परिजनों ने इसलिए भी मन बनाया था क्योंकि यहां पर बच्चों को भोजन से लेकर किताबें मुफ्त व यूनिफार्म के लिए पैसे मिलते है। साथ ही फीस का भी कोेई दबाव नहीं है, यही कारण रहा जो कोरोना के दौरान छात्रों की संख्या सरकारी विद्यालयों में बढ़ी।
बड़ी संख्या में गरीब परिवारों के बच्चों ने काम करना शुरू किया
कोरोना काल में बड़ी संख्या में छात्रों को उनके परिजनों ने काम पर लगा दिया था। क्योंकि इस दौर में काफी परिवारों के सामने रोजी-रोटी का संकट पैदा हो गया था। सरकारी विद्यालायों में 2021-22 के सैशन के दौरान छात्रों का पंजिकरण तो हुआ लेकिन उनकी उपस्थिति स्कूलों में कम रही। इस सेशन में शिक्षकों द्वारा छात्रों को विद्यालय लाने के लिए घर से बुलाया गया लेकिन परिजनों की उदासीनता के कारण छात्र विद्यालयों में काफी कम पहुंचे हैं।
कई छात्रों का दो विद्यालयों में रजिस्ट्रेशन
सरकारी विद्यालयों के कई छात्रों का दो विद्यालयों में पंजिकरण होनें की बात भी सामने आई है। कसेरूखेड़ा के एक विद्यालय में ऐसे दो छात्रों को चिन्हित भी किया गया है, इनकी संख्या बढ़ भी सकती है। इसके पीछे वजह यह सामने आ रही है कि सरकार द्वारा चलाई जा रही विभिन्न योजनाओं का लाभ लेने के लिए परिजनों द्वारा अपने बच्चों का दो जगह दाखिला करा दिया गया।
मार्च अंत तक आएगा रिजल्ट
बेसिक शिक्षा विभाग के सभी विद्यालयों में परिक्षाएं समाप्त हो चुकी है, अब मार्च के अंत तक रिजल्ट आएगा। रिजल्ट आने के बाद छात्रों की संख्या कम होने की संभावना लगातार बनी हुई है। हालांकि विभाग द्वारा छात्रों को सरकारी विद्यालायों में ही पढ़ानें के लिए लगातार कोशिशें की जा रही है, लेकिन अंतिम फैसला अभिभावकों को ही लेना है कि वह अपने बच्चों को सरकारी विद्यालयों में शिक्षा दिलाते है या निजी स्कूलों का रूख करते है।

